अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 701, कुल 878 में से
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हैं। वे भी ‘बृहती’ छन्दके ही अन्तर्गत हैं। [उदाहरणके लिये ऋग्वेदमें—‘तं त्वा वयं पितो वचोभिर्गावो न हव्या सुषूदिम। देवेभ्यस्त्वा सधमादमस्मभ्यं त्वा सधमादम् १॥’ (१।१८७।११)] जहाँ पहले दस अक्षरके दो चरण हों, फिर आठ अक्षरोंके दो चरण हों, उसे भी ‘बृहती’ छन्द कहते हैं। [जैसे सामवेदमें— ‘अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रं राधो अमर्त्य। आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाँ उषर्बुधः २॥’ (४०)] केवल ‘जगती’ छन्दके तीन चरण हों तो उसे ‘महाबृहती’ कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—‘अजीजनो अमृत मर्त्येष्वॉ, ऋतस्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः। सदासरो वाजमच्छसनिष्यदत्’ (९।११०।४)] ताण्डी नामक आचार्यके मतमें यही ‘सतो बृहती’ नामक छन्द है॥ ५-१०३/२॥
जहाँ दो पाद बारह-बारह अक्षरोंके और दो आठ-आठ अक्षरोंके हों, वहाँ ‘पङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। यदि विषम पाद अर्थात् प्रथम और तृतीय चरण पूर्वकथनानुसार बारह-बारह अक्षरोंके हों और शेष दोनों आठ-आठ अक्षरोंके तो उसे ‘सतःपङ्क्ति’ नामक छन्द कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—‘यं त्वा देवासो मनवे दधुरिह यजिष्ठं हव्यवाहन। यं कण्वो मेध्यातिथिर्धनस्पृतं यं वृषा यमुपस्तुतः॥’ (१।३६।१०)] यदि वे ही चरण विपरीत अवस्थामें हों, अर्थात् प्रथम-तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके और द्वितीय-चतुर्थ बारह- बारह अक्षरोंके तो भी वह छन्द ‘सतःपङ्क्ति’ ही कहलाता है। [जैसे ऋग्वेदमें—‘य ऋष्ये श्रावयत्सखा विश्वेत् स वेद जनिमा पुरुष्टुतः। तं विश्वे मानुषा युगे, इन्द्रं हवन्ते तविशं यतासुचः॥’ (८।४६।१२)] जब पहलेके दोनों चरण बारह-बारह अक्षरोंके हों और शेष दोनों आठ-आठ अक्षरोंके, तो उसे ‘प्रस्तारपङ्क्ति’ कहते हैं। [ग्यारहवें श्लोकमें बताये हुए ‘पङ्क्ति’ छन्दके लक्षणसे ही यह गतार्थ हो जाता है, तथापि विशेष संज्ञा देनेके लिये यहाँ पुनः उपादान किया गया है। मन्त्र-ब्राह्मणमें इसका उदाहरण इस प्रकार है—‘काम वेदते मदो नामासि समानया अमुं सुरा ते अभवत्। परम्त्र जन्मा अग्ने तपसा निर्मितोऽसि ४॥’] जब अन्तिम दो चरण बारह-बारह अक्षरोंके हों और आरम्भके दोनों आठ-आठ अक्षरोंके तो ‘आस्तारपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—भद्रं नो अपि वातय, मनो दक्षमृत क्रतुम्। अधा ते सख्य अन्धसो वि वो मदे रणन् गावो न यवसे विवक्षसे॥’ (१०।२५।१)] यदि बारह अक्षरोंवाले दो चरण बीचमें हों और प्रथम एवं चतुर्थ चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो उसे ‘विस्तारपङ्क्ति’ कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—‘अग्ने तव श्रवो वयो, महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो। बृहद्दानो शवसा वाजमुक्थ्यं दधासि दाशुषे कवे॥’ (१०।१४०।१)] यदि बारह अक्षरोंवाले दो चरण बारह हों, अर्थात् प्रथम एवं चतुर्थ चरणके रूपमें हों और बीचके द्वितीय-तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो वह ‘संस्तारपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—‘पितुभूतो न तन्तुमित् सुदानवः प्रतिदध्मो यजामसि। उषा अप स्वसुस्तमः संवर्तयति वर्तनि सुजातता॥’ (१०।१७२।३)] पाँच-पाँच अक्षरोंके चार पाद होनेपर ‘अक्षरपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—‘प्र शुक्रैतु ५ देवी मनीषा। अस्मत् सुतष्टो
१.-२-३. इन सबमें व्यूहकी रीतिसे या ‘निचृत्’ मानकर पादपूर्ति की जाती है।
४. यहाँ ‘नामा असि’, ‘निर्मितः असि’—इस प्रकार संधिव्यूहसे पादपूर्ति की जाती है। कात्यायनने इसे गायत्री छन्दमें गिना है। सायणाने इसे ‘द्विपदा’ कहा है।
५. यहाँ ‘निचृत्’ होनेसे एक अक्षरकी न्यूनता है।