भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 878 में से

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पृष्ठ 72
  • अध्याय २५ * ४५

पचीसवाँ अध्याय

वासुदेव, संकर्षण आदिके मन्त्रोंका निर्देश तथा एक व्यूहसे लेकर द्वादश व्यूहतकके व्यूहोंका एवं पञ्चविंश और षड्विंश व्यूहका वर्णन

नारदजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं वासुदेव आदिके आराधनीय मन्त्रोंका लक्षण बता रहा हूँ। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार व्यूह-मूर्तियोंके नामके आदिमें ॐ, फिर क्रमशः 'अ आ अं अः' ये चार बीज तथा 'नमो भगवते' पद जोड़ने चाहिये और अन्तमें 'नमः' पदको जोड़ देना चाहिये। ऐसा करनेसे इनके पृथक्-पृथक् चार मन्त्र बन जाते हैं।* इसके बाद नारायण-मन्त्र है, जिसका स्वरूप है—'ॐ नमो नारायणाय।', 'ॐ तत्सद् ब्रह्मणे ॐ नमः।'—यह ब्रह्ममन्त्र है। 'ॐ विष्णवे नमः।'—यह विष्णुमन्त्र है। 'ॐ क्षौं ॐ नमो भगवते नरसिंहाय नमः।'—यह नरसिंहमन्त्र है। 'ॐ भूर्नमो भगवते वराहाय।'—यह भगवान् वराहका मन्त्र है। ये सभी मन्त्रराज हैं। उपर्युक्त नौ मन्त्रोंके वासुदेव आदि नौ नायक हैं, जो उपासकोंके वल्लभ (इष्टदेवता) हैं। इनकी अङ्ग-कान्ति क्रमशः जवाकुसुमके सदृश अरुण, हल्दीके समान पीली, नीली, श्यामल, लोहित, मेघ-सदृश, अग्नितुल्य तथा मधुके समान पिङ्गल है। तन्त्रवेत्ता पुरुषोंको स्वरके बीजोंद्वारा क्रमशः पृथक्-पृथक् 'हृदय' आदि अङ्गोंकी कल्पना करनी चाहिये। उन बीजोंके अन्तमें अङ्गोंके नाम रहने चाहिये—(यथा—'ॐ आं हृदयाय नमः। ॐ ईं शिरसे स्वाहा। ॐ ऊं शिखायै वषट्।' इत्यादि) ॥ १—५$\frac{१}{२}$ ॥

जिनके आदिमें व्यञ्जन अक्षर होते हैं, उनके लक्षण अन्य प्रकारके हैं। दीर्घ स्वरोंके संयोगसे उनके भिन्न-भिन्न रूप होते हैं। उनके अन्तमें अङ्गोंके नाम होते हैं और उन अङ्ग-नामोंके अन्तमें 'नमः' आदि पद जुड़े होते हैं। (यथा—'क्लां हृदयाय नमः। क्लीं शिरसे स्वाहा।' इत्यादि।) ह्रस्व स्वरोंसे युक्त बीजवाले अङ्ग 'उपाङ्ग' कहलाते हैं। देवताके नाम-सम्बन्धी अक्षरोंको पृथक्-पृथक् करके, उनमेंसे प्रत्येकके अन्तमें बिन्द्वात्मक बीजका योग करके उनसे अङ्गन्यास करना भी उत्तम माना गया है। अथवा नामके आदि अक्षरको दीर्घ स्वरों एवं ह्रस्व स्वरोंसे युक्त करके अङ्ग-उपाङ्गकी कल्पना करे और उनके द्वारा क्रमशः न्यास करे। हृदय आदि अङ्गोंकी कल्पनाके लिये व्यञ्जनोंका यही क्रम है। देवताके मन्त्रका जो अपना स्वर-बीज है, उसके अन्तमें उसका अपना नाम देकर अङ्ग-सम्बन्धी नामोंद्वारा पृथक्-पृथक् वाक्यरचना करके उससे युक्त हृदयादि द्वादश अङ्गोंकी कल्पना करे। पाँचसे लेकर बारह अङ्गोंतकके न्यास-वाक्यकी कल्पना करके सिद्धिके अनुरूप उनका जप करे। हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र—ये छह अङ्ग हैं। मूलमन्त्रके बीजोंका इन अङ्गोंमें न्यास करना चाहिये। बारह अङ्ग ये हैं—हृदय, सिर, शिखा, हाथ, नेत्र, उदर, पीठ, बाहु, ऊरु, जानु, जङ्घा और पैर। इनमें क्रमशः न्यास करना चाहिये। 'कं टं पं शं वैनतेयाय नमः।'—यह गरुडसम्बन्धी बीजमन्त्र है। 'खं ठं फं षं गदायै नमः।'—यह गदा-मन्त्र है। 'गं डं वं सं पुष्ट्यै नमः।'—यह पुष्टिदेवी-सम्बन्धी मन्त्र है। 'घं ढं भं हं श्रियै नमः।'—यह श्रीमन्त्र है। 'चं णं मं क्षं'—यह पाञ्चजन्य (शङ्ख)-का मन्त्र है। 'छं तं पं कौस्तुभाय नमः।'—यह कौस्तुभ-मन्त्र


* ॐ अं नमो भगवते वासुदेवाय नमः। ॐ आं नमो भगवते संकर्षणाय नमः। ॐ अं नमो भगवते प्रद्युम्नाय नमः। ॐ अः नमो भगवते अनिरुद्धाय नमः।

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