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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 724, कुल 878 में से

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पृष्ठ 724

* अध्याय ३३६ * | ६१७


वर्णमेरु

एकाक्षर प्रस्तार
द्व्यक्षर प्रस्तार
त्र्यक्षर प्रस्तार
चतुरक्षर प्रस्तार१६
पञ्चाक्षर प्रस्तार१०१०३२
षडक्षर प्रस्तार१५२०१५६४
सप्ताक्षर ,,२१३५३५२११२८
अष्टाक्षर ,,२८५६७०५६२८२५६

इसमें चौथी पङ्क्तिमें १ सर्वगुरु, ३ एक लघु, तीन दो लघु और १ सर्वलघु अक्षर है। इसी प्रकार अन्य पङ्क्तियोंमें भी जानना चाहिये। इस प्रकार इसके द्वारा छन्दके लघु-गुरु अक्षरोंकी तथा एकाक्षरादि छन्दोंकी वृत्त-संख्या जानी जाती है। मेरु-प्रस्तारमें नीचेसे ऊपरकी ओर आधा-आधा अंगुल विस्तार कम होता जाता है। छन्दकी संख्याको दूनी करके एक-एक घटा दिया जाय तो उतने ही अङ्गुलका उसका अध्वा (प्रस्तारदेश) होता है। इस प्रकार यहाँ छन्दःशास्त्रका सार बताया गया॥ ४-५ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रस्तार-निरूपण' नामक तीन सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३५ ॥


तीन सौ छत्तीसवाँ अध्याय

शिक्षानिरूपण

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! अब मैं 'शिक्षा'का वर्णन करता हूँ। वर्णोंकी संख्या तिरसठ अथवा चौंसठ भी मानी गयी है। इनमें इक्कीस स्वर$^१$, पचीस स्पर्श$^२$, आठ यादि$^३$ एवं चार यम$^४$ माने गये हैं। अनुस्वार, विसर्ग, दो पराश्रित$^५$ वर्ण—जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय ( ≍ क और ≍ प) और दुःस्पृष्ट लकार—ये तिरसठ$^६$ वर्ण हैं। इनमें प्लुत लृकारको और गिन लिया जाय तो वर्णोंकी संख्या चौंसठ हो जाती है। रङ्ग$^७$ (अनुनासिक)-का उच्चारण 'खे अराँ'की तरह बताया गया है। हकार 'ङ' आदि पञ्चमाक्षरों और य, र, ल, व—इन अन्तःस्थ वर्णोंसे संयुक्त होनेपर 'उरस्य' हो जाता है। इनसे संयुक्त न होनेपर वह 'कण्ठस्थानीय' ही रहता है। आत्मा (अन्तः-करणावच्छिन्न चैतन्य) संस्काररूपसे अपने भीतर विद्यमान घट-पटादि पदार्थोंको अपनी


$^१$. अ, इ, उ, ऋ—इन चारों अक्षरोंके ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत भेद मिलाकर बारह स्वर होते हैं। ए, ओ, ऐ, औ—इनके दीर्घ और प्लुत भेद मिलकर आठ होते हैं। ये सब मिलकर बीस हुए तथा एक दुःस्पृष्ट 'ल' मिलानेसे कुल इक्कीस स्वर हुए। दो स्वरोंके मध्यवर्ती 'ल'को 'दुःस्पृष्ट' कहते हैं।
$^२$. कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग तथा पवर्गके पचीस वर्णोंको 'स्पर्श' कहते हैं।
$^३$. य, र, ल, व, श, ष, स, ह—ये आठ अक्षर 'यादि' कहे गये हैं।
$^४$. वर्गोंमें पञ्चम वर्णके परे रहते आदिके चार वर्णों तथा पञ्चमके मध्यमें जो उन्हींके सदृश वर्ण उच्चारित होते हैं, उनको 'यम' कहते हैं। जैसा कि—भट्टोजिदीक्षित लिखते हैं—'वर्गेष्वाद्यानां चतुर्णां पञ्चमे परे मध्ये यमो नाम पूर्वसदृशो वर्णः प्रातिशाख्ये प्रसिद्धः।' यथा—पलिक्र्कनी, चख्खनतुः इत्यादि।
$^५$. क, ख तथा प, फ परे रहनेपर विसर्गके स्थानमें क्रमशः ≍ क ≍ ख तथा ≍ प ≍ फ आदेश होते हैं, अतः ये दोनों 'पराश्रित' हैं। इन्हींको क्रमशः 'जिह्वामूलीय' और 'उपध्मानीय' कहते हैं।
$^६$. 'लॄ' का 'ॠ' में ही अन्तर्भाव माननेपर उसकी पृथक् गणना न होनेसे वर्णसंख्या ६३ तक हो जाती है।
$^७$. नकारके स्थानमें 'रु' होनेपर 'अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा।'—इस सूत्रसे जो अनुनासिक किया जाता है, उसीका नाम 'रङ्ग' है।