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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 726, कुल 878 में से

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पृष्ठ 726

* अध्याय ३३७ * ६९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

अपने बच्चोंको दाढ़ोंसे पकड़कर एक स्थानसे दूसरे स्थानपर ले जाती है, किंतु उन्हें पीड़ा नहीं देती, वर्णोंका ठीक इसी तरह प्रयोग करे, जिससे वे वर्ण न तो अव्यक्त (अस्पष्ट) हों और न पीड़ित ही हों। वर्णोंके सम्यक् प्रयोगसे मानव ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। 'स्वर' तीन प्रकारके माने गये हैं—उदात्त, अनुदात्त और स्वरित। इनके उच्चारणकालके भी तीन नियम हैं—ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत। अकार एवं हकार कण्ठस्थानीय हैं। इकार, चवर्ग, यकार एवं शकार—ये तालुस्थानसे उच्चरित होते हैं। उकार और पवर्ग—ये दोनों ओष्ठस्थानसे उच्चरित होनेवाले हैं। ऋकार, टवर्ग, रेफ एवं षकार—ये मूर्धन्य तथा ॡकार, तवर्ग, लकार और सकार—ये दन्तस्थानीय होते हैं। कवर्गका स्थान जिह्वामूल है। वकारको विद्वज्जन दन्त और ओष्ठसे उच्चरित होनेवाला बताते हैं। एकार और ऐकार कण्ठ-तालव्य तथा ओकार एवं औकार कण्ठोष्ठज माने गये हैं। एकार, ऐकार तथा ओकार और औकारमें कण्ठस्थानीय वर्ण अकारकी आधी मात्रा या एक मात्रा होती है। 'अयोगवाह'१ आश्रयस्थानके भागी होते हैं, ऐसा जानना चाहिये। अच् (अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ)—ये स्वर स्पर्शाभावरूप 'विवृत' प्रयत्नवाले हैं। यण् (य, व, र, ल)' 'ईषत्स्पृष्ट' एवं शल् (श, ष, स, ह) 'अर्धस्पृष्ट' अर्थात् 'ईषद्विवृत' प्रयत्नवाले हैं। शेष 'हल्' अर्थात् क से लेकर म तकके अक्षर 'स्पृष्ट प्रयत्नवाले' माने गये हैं। इनमें बाह्य प्रयत्नके कारण वर्णभेद जानना चाहिये 'ञम्' प्रत्याहारमें स्थित वर्ण (ञ, म, ङ, ण, न) अनुनासिक होते हैं। हकार और रेफ अनुनासिक नहीं होते। 'हकार, झकार तथा षकार' के 'संवार', 'घोष' और 'नाद' प्रयत्न हैं। 'यण्' और 'जश्'—इनके 'ईषन्नाद' अर्थात् 'अल्पप्राण' प्रयत्न हैं। ख, फ आदिका 'विवार', 'अघोष' और 'श्वास' प्रयत्न हैं। चर् (च, ट, त, क, प, श, ष, स)-का 'ईषच्छ्वास' प्रयत्न जानना चाहिये। यह व्याकरणशास्त्र वाणीका धाम कहा जाता है॥ १-२२॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शिक्षानिरूपण' नामक तीन सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३६ ॥


तीन सौ सैंतीसवाँ अध्याय

काव्य आदिके लक्षण

**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! अब मैं 'काव्य' और 'नाटक' आदिके स्वरूप तथा 'अलंकारों'का वर्णन करता हूँ। ध्वनि, वर्ण, पद और वाक्य—यही सम्पूर्ण वाङ्मय माना गया है२। शास्त्र, इतिहास तथा काव्य—इन तीनोंकी समाप्ति इसी वाङ्मयमें होती है। वेदादि शास्त्रोंमें शब्दकी प्रधानता है और इतिहास-पुराणोंमें अर्थकी। इन दोनोंमें 'अभिधा-शक्ति' (वाच्यार्थ)-की ही मुख्यता होती है; अतः 'काव्य' इन दोनोंसे भिन्न है। [क्योंकि उसमें व्यङ्ग्य अर्थको प्रधानता दी जाती है३।]


१. अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय और यम—ये 'अयोगवाह' कहलाते हैं। वे जिस स्वरपर आश्रित होते हैं, उसीका स्थान उनका स्थान होता है। जैसे—'रामः'का विसर्ग कण्ठस्थानीय है और 'हरिः'का विसर्ग तालुस्थानीय। २. 'सरस्वती-कण्ठाभरण'के रचयिता महाराजाधिराज भोजदेवने अपने ग्रन्थके मङ्गलाचरणमें 'ध्वनिर्वर्णाः पदं वाक्यम्' (१।१) अग्निपुराणकी इस आनुपूर्वीको अविकलरूपसे उद्धृत किया है। ३. शब्दप्रधान वेदादिकी आज्ञाको भामह आदि आचार्योंने 'प्रभुसम्मित' और अर्थप्रधान इतिहास-पुराणोंकी आज्ञाको 'सुहृत्सम्मित' नाम दिया है। इसी तरह शब्द और अर्थको गौण करके जहाँ व्यङ्ग्यार्थको प्रधानता दी गयी है, उस काव्यके उपदेशको 'कान्तासम्मित' कहा है। यथा—