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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 734, कुल 878 में से

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पृष्ठ 734
  • अध्याय ३३९ * ७०७

है। युद्धमें बाधाओंके उपस्थित होनेसे स्थिर न रह पाना 'त्रास' माना गया है तथा चित्तके चमत्कृत होनेको 'वीप्सा' कहते हैं। क्रोधके शमन न होनेको 'अमर्ष' तथा चेतनताके उदयको 'प्रबोध' या 'जागरण' कहते हैं। चेष्टा और आकारसे प्रकट होनेवाले भावोंका गोपन 'अवहित्थ' कहलाता है। क्रोधसे गुरुजनोंपर कठोर वाग्दण्डका प्रयोग 'उग्रता' कहलाता है। चित्तके ऊहापोहको 'वितर्क' तथा मानस एवं शरीरकी प्रतिकूल परिस्थितिको 'व्याधि' कहते हैं। काम आदिके कारण असम्बद्ध प्रलाप करनेको 'उन्माद' कहा गया है। तत्त्वज्ञान होनेपर चित्तगत वासनाकी शान्तिको 'शम' कहते हैं। कविजनोंको काव्यादिमें रस एवं भावोंका निवेश करना चाहिये। जिसमें 'रति' आदि स्थायी भावोंकी विभावना हो, अथवा जिसके द्वारा इनकी विभावना हो, वह 'विभाव' कहा गया है; यह 'आलम्बन' और 'उद्दीपन' के भेदसे दो प्रकारका माना जाता है। 'रति' आदि भावसमूह जिसका आश्रय लेकर निष्पन्न होते हैं, वह 'आलम्बन' नामक विभाव है। यह नायक आदिका आलम्बन लेकर आविर्भूत होता है। धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित और धीरप्रशान्त—ये चार प्रकारके नायक माने गये हैं। ये धीरोदात्तादि नायक अनुकूल, दक्षिण, शठ एवं धृष्टके भेदसे सोलह प्रकारके कहे जाते हैं। पीठमर्द, विट और विदूषक—ये तीनों शृङ्गाररसमें नायकके नर्मसचिव—अनुनायक होते हैं। 'पीठमर्द' श्रीमान् एवं 'नायक' के समान बलशाली (सहायक) होता है। 'विट' (धूर्त) नायकके देशका कोई व्यक्ति होता है। 'विदूषक' प्रहसनसे नायकको प्रसन्न करनेवाला होता है। नायककी नायिकाएँ भी तीन प्रकारकी होती हैं—स्वकीया, परकीया एवं पुनर्भू। 'पुनर्भू' नायिका कौशिकाचार्यके मतसे है। कुछ 'पुनर्भू' नायिकाको न मानकर उसके स्थानपर 'सामान्य' की गणना करते हैं। इन्हीं नायिकाओंके अनेक भेद होते हैं। 'उद्दीपन विभाव' विविध संस्कारोंके रूपमें स्थित रहते हैं। ये 'आलम्बन विभाव' में भावोंको उद्दीप्त करते हैं॥ २६—४२॥

चौंसठ कलाएँ कर्मादि एवं गीतिकादिके भेदसे दो प्रकारकी होती हैं। 'कुहक' और 'स्मृति' प्रायः हासोपहारक हैं। आलम्बन विभावके उद्बुद्ध संस्कारयुक्त भावोंके द्वारा स्मृति, इच्छा, द्वेष और प्रयत्नके संयोगसे किये हुए मन, वाणी, बुद्धि तथा शरीरके कार्यको विद्वज्जन 'अनुभाव' मानते हैं—'स अत्र अनुभूयते उत अनुभवति।' (आलम्बनमें जो अनुभूयमान है, अथवा आलम्बनमें जो दर्शनके बाद प्रकट होता है)—इस प्रकार 'अनुभाव' शब्दकी निरुक्ति (व्युत्पत्ति)—की जाती है। मानसिक व्यापारकी बहुलतासे युक्त कार्य 'मनका कार्य' कहा जाता है। वह 'पौरुष' (पुरुष-सम्बन्धी) एवं 'स्त्रैण' (स्त्री-सम्बन्धी)—दो प्रकारका होता है। वह इस प्रकार भी प्रसिद्ध है— ॥ ४३—४६ ॥

शोभा, विलास, माधुर्य, स्थैर्य, गाम्भीर्य, ललित, औदार्य तथा तेज—ये आठ 'पौरुष कर्म' हैं। नीच जनोंकी निन्दा, उत्तम पुरुषोंसे स्पर्धा, शौर्य और चातुर्य—इनके कारण मानसिक कार्यके रूपमें शोभाका आविर्भाव होता है। जैसे—'भवनकी शोभा होती है' ॥ ४७-४८ ॥

भाव, हाव, हेला, शोभा, कान्ति, दीप्ति, माधुर्य, शौर्य, प्रगल्भता, उदारता, स्थिरता एवं गम्भीरता—ये बारह 'स्त्रियोंके विभाव' कहे गये हैं। विलास और हावको 'भाव' कहते हैं। यह 'भाव' किंचित् हर्षसे प्रादुर्भूत होता है। वाणीके योगको 'वागारम्भ' कहते हैं। उसके भी बारह भेद