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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 751, कुल 878 में से

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पृष्ठ 751

७२४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

वस्तु-धर्मका कीर्तन **‘अतिशयालंकार’**¹ कहलाता है। यह ‘सम्भव’ और **‘असम्भव’**के भेदसे दो प्रकारका माना जाता है। जिसमें विशेषदर्शनके लिये गुण, जाति एवं क्रियादिकी विकलताका प्रदर्शन—अनपेक्षताका प्रकाशन हो, उसको **‘विशेषोक्ति’**² कहा जाता है। जिसमें प्रसिद्ध हेतुकी व्यावृत्तिपूर्वक (अर्थात् उसका अभाव दिखाते हुए) अन्य किसी कारणकी उद्भावना की जाय अथवा स्वाभाविकता स्वीकार की जाय अर्थात् बिना किसी कारणके ही स्वाभाविक रूपसे कार्यकी उत्पत्ति मानी जाय, उसे विभावना³ कहते हैं। परस्पर असंगत पदार्थोंका जहाँ युक्तिके द्वारा विरोधपूर्वक संगतिकरण किया जाय, वह **‘विरोधालंकार’**⁴ होता है। जिसकी


अतद्रूपस्यान्यथाध्यवसानमतिशयार्थमुत्प्रेक्षा ॥ (का० सू० ४।३।९)

दण्डीका लक्षण इस प्रकार है— अन्यथैव स्थिता वृत्तिश्चेतनस्येतरस्य वा। अन्यथोत्प्रेक्ष्यते यत्र तामुत्प्रेक्षां विदुर्यथा॥ (२।२२१) यही लक्षण अग्निपुराणमें भी है। दण्डीने उसे ज्यों-का-त्यों ले लिया है। अन्तर केवल इतना ही है कि अग्निपुराणमें 'मन्यते' क्रियाका प्रयोग है और काव्यादर्शमें 'उत्प्रेक्ष्यते' क्रियाका। आचार्य मम्मटने थोड़े-से शब्दोंमें ही उत्प्रेक्षाका सर्वसम्मत रूप रख दिया है। यथा— 'सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्।' (का० प्र० १०।९२) अर्थात्—"प्रकृत (वर्ण्य उपमेय)-की सम (उपमान)-के साथ सम्भावना 'उत्प्रेक्षा' कहलाती है।"

१. यह अतिशय ही आगे चलकर 'अतिशयोक्ति' के नामसे प्रसिद्ध हुआ है। अग्निपुराणके इस सूक्ष्म लक्षणको आचार्य भामहने विशद करते हुए कहा है कि—किसी "कारणवश लोकोत्तर अर्थका बोधक जो वचन है, उसे 'अतिशयोक्ति' अलंकार मानते हैं। वामनने इसके असम्भव-पक्षको नहीं लिया है। वे सम्भाव्य धर्म तथा उसके उत्कर्षकी कल्पनाको ही 'अतिशयोक्ति' मानते हैं (४।३।१०)। लोकसीमातीत होनेपर ही वस्तुधर्ममें उत्कर्ष सिद्ध होता है। आचार्य दण्डीने अग्निपुराणोक्त लक्षणके केवल भावकी ही नहीं, शब्दकी भी छाया ली है। यथा— विवक्षा या विशेषस्य लोकसीमातिवर्त्तिनी। असावतिशयोक्तिः स्यादालंकारोत्तमा यथा॥ (काव्यादर्श २।२१४) आचार्य मम्मटके द्वारा 'अतिशयोक्ति' का विकसित स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है। उपमानके द्वारा उपमेयका निगरण करके जो कल्पित अभेद-कथनरूप अध्यवसान करना है, वह एक प्रकारकी 'अतिशयोक्ति' है। प्रस्तुत अर्थका अन्यरूपसे वर्णन द्वितीय प्रकारकी, 'यदि' के समानार्थक शब्दको लगाकर की गयी कल्पना तृतीय प्रकारकी और कार्य-कारणके पौर्वापर्यका विपर्यय चतुर्थ प्रकारकी 'अतिशयोक्ति' है। (का० प्र० १०।१००-१०१)

२. दण्डीके 'काव्यादर्श'में अग्निपुराणकी ही शब्दावलीमें 'विशेषोक्ति' लक्षित करायी गयी है। भामहने भी अग्निपुराणके ही भाव तथा शब्दकी छाया ली है। यथा— एकदेशस्य विगमे या गुणान्तरसंस्थितिः। विशेषप्रथनायासौ विशेषोक्तिर्मता यथा॥ (३।२३) वामनने भी 'एकगुणहानिकल्पनायां साम्यदार्थं विशेषोक्तिः।'-इस सूत्रमें ऐसा ही भाव व्यक्त किया है। अर्वाचीन आलंकारिकोंने "कारण प्राप्त होनेपर भी जो कार्यका न होना बताया जाय, उसे 'विशेषोक्ति' कहा है।" जैसा कि आचार्य मम्मटका कथन है— 'विशेषोक्तिरखण्डेषु कारणेषु फलावचः॥' (१०।१०८)

३. काव्यादर्शकार दण्डीने अग्निपुराणमें दिये गये लक्षणकी आनुपूर्वीको ही अपने ग्रन्थमें उद्धृत किया है। भामहने कारणभूत क्रियाका निषेध होनेपर भी उसके फलकी 'उद्भावना' को 'विभावना' माना है। इसी भावको वामनने भी अपने सूत्रमें अभिव्यक्त किया है। यथा— 'क्रियाप्रतिपेधे प्रसिद्धतत्फलव्यक्तिर्विभावना॥' (काव्यालंकार, सू० ४।३।१३) आचार्य मम्मटने अपनी कारिकामें उक्त सूत्रका ही भाव ग्रहण किया है— 'क्रियायाः प्रतिषेधेऽपि फलव्यक्तिर्विभावना।' 'सरस्वतीकण्ठाभरण' के रचयिता राजा भोजने 'विभावना' के अपने लक्षणमें अग्निपुराणकी शब्दावलीको ही अविकलरूपसे ले लिया है।

४. भामहने 'विरोध' का लक्षण इस प्रकार बताया है—"विशेषता बतानेके लिये किसी गुण या क्रियाके विरुद्ध अन्य क्रियाका वर्णन हो, तो उसे विद्वान् 'विरोध' कहते हैं"— गुणस्य वा क्रियाया वा विरुद्धान्यक्रियाभिधा। या विशेषाभिधानाय विरोधं तं विदुर्बुधाः॥ (३।२५)