अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 801, कुल 878 में से
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ये प्रयोग बनते हैं। ‘चीर’ शब्द गायके थन, वस्त्रविशेष तथा वल्कलके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘भी’ धातुसे ‘भियः क्रुकन्’—(१९९) इस सूत्रसे ‘क्रुकन्’ प्रत्यय करनेपर ‘भीरुकः’—इस पदकी सिद्धि होती है। इसके पर्यायवाची शब्द हैं—‘भीरु’ और ‘कातर’। ‘उच समवाये’—इस धातुसे ‘रन्’ प्रत्यय करनेपर ‘उग्रः’ पदकी सिद्धि होती है। ‘उग्रः’ का अर्थ है—प्रचण्ड। ‘वहियूभ्यां षित्।’—इस सूत्रके अनुसार ‘षित् असच्’ प्रत्यय करनेपर ‘वाहसः’, ‘यावसः’—ये दो रूप सिद्ध होते हैं। ‘वाहसः’ का अर्थ है—अजगर और ‘यावसः’ का अर्थ है—तृणसमूह। ‘वर्तमाने पृषद्वृहन्महज्जगच्छत्रिवच्च।’—इस सूत्रके अनुसार ‘गम्’ धातुसे ‘अत्’ प्रत्ययका निपातन हुआ। ‘गम्’ के स्थानमें ‘जग’ आदेश हुआ। इस प्रकार ‘जगत्’ शब्दकी सिद्धि हुई। ‘जगत्’ का अर्थ है—भूलोक। ‘ऋतन्यञ्जिवन्यञ्ज्यर्षि०’ इत्यादि (४५०) सूत्रके अनुसार ‘कृश’ धातुसे ‘आनुक्’ प्रत्यय करनेपर ‘कृशानुः’—इस पदकी सिद्धि होती है। ‘कृशानुः’ का अर्थ है—अग्नि। द्योतते इति ज्योतिः। ‘द्युतेरिसिन्नादेशश्च जः।’ (२७५)—इस सूत्रके अनुसार ‘द्युत्’, धातुसे ‘इसिन्’ प्रत्यय, द्यकारका जकारादेश तथा गुण होनेपर ‘ज्योतिः’ इस पदकी सिद्धि होती है। ‘ज्योतिः’ का अर्थ है—अग्नि और सूर्य। ‘अर्च’ धातुसे ‘कृदाधाराचिकलिभ्यः।’ (३२७)—इस सूत्रके अनुसार ‘क’ प्रत्यय होनेपर ‘अर्कः’ पदकी सिद्धि होती है। ‘अर्क एवं अर्ककः’। स्वार्थे कः। ‘अर्कः’ पद सूर्यका वाचक है। ‘कृगृशृवृञ्जतिभ्यः ष्वरच्।’ (२८६)—इस सूत्रके अनुसार वरणार्थक ‘वृ’ धातुसे तथा याचनार्थक ‘चते’ धातुसे ‘ष्वरच्’ प्रत्यय करनेपर क्रमशः ‘वर्वरः’, ‘चत्वरम्’—इन दो पदोंकी सिद्धि होती है। ‘वर्वर’ का अर्थ है—प्राकृत जन अथवा कुटिल मनुष्य। ‘हसिमृग्रिण्वार्डमिदमिपूपूधूर्विभ्यस्तन्।’ (३७३) —इस सूत्रके अनुसार हिंसार्थक ‘धूर्वि’ धातुसे ‘तन्’ प्रत्यय करनेपर ‘धूर्त्तः’—इस पदकी सिद्धि होती है। ‘धूर्त्त’ शब्दका अर्थ है—शठ। ‘चत्वरम्’का अर्थ है—चौराहा। ‘लित्वरचत्वरधीवर’ इत्यादि औणादिक सूत्रसे ‘चीवरम्’ इस पदका निपातन हुआ है। ‘चीवरम्’ का अर्थ है—चिथड़ा अथवा भिक्षुकका वस्त्र। स्नेहार्थक ‘ञिमिदा’ अथवा ‘मिद्’ धातुसे ‘अमिचिमिदिशसिभ्यः क्त्रः।’ (६१३)—इस सूत्रके अनुसार ‘क्त्र’ प्रत्यय हुआ। ककारका इत्यसंज्ञालोप हुआ—‘मिद्+त्र=मित्र। विभक्ति-कार्य करनेपर ‘मित्रः’—इस पदकी सिद्धि हुई। ‘मित्र’ का अर्थ है—सूर्य। नपुंसकलिङ्गमें इसका अर्थ—सुहृद् होता है। ‘कुवोह्रस्वश्च।’ इस सूत्रके अनुसार ‘पुनातीति’ इस लौकिक विग्रहमें ‘पू’ धातुसे ‘क्त्र’ प्रत्यय और दीर्घके स्थानमें ह्रस्व होनेपर ‘पुत्र’ शब्दकी सिद्धि होती है। ‘पुत्र’ का अर्थ है—बेटा। ‘सुवः कित्।’ (३२८)—इस सूत्रके अनुसार प्राणिप्रसवार्थक ‘षूङ्’ धातुसे ‘नु’ प्रत्यय होता है और वह ‘कित्’ माना जाता है। धातुके आदि षकारको सकारादेश हो जाता है। इस प्रकार ‘सूनु’ शब्दकी सिद्धि होती है। विभक्तिकार्य होनेपर ‘सूनुः’ पद बनता है। ‘विश्वकोश’के अनुसार इसका अर्थ पुत्र और सूर्य है। ‘नप्तृनेष्टृत्वष्टृहोतृ०’ (२६०) इत्यादि सूत्रके अनुसार ‘पितृ’ शब्द निपातित होता है। ‘पातीति पिता’। ‘पा’ धातुसे ‘तृच्’ होकर आकारके स्थानमें इकार हो जाता है। पिता, पितरौ, पितरः इत्यादि इसके रूप हैं। जन्मदाता या बापको ‘पिता’ कहते हैं। विस्तारार्थक ‘तन्’ धातुसे ‘वृतनिभ्यां दीर्घश्च।’—इस सूत्रके अनुसार ‘तन्’ प्रत्यय तथा ह्रस्वके स्थानमें दीर्घ होनेपर ‘तात’ शब्दकी सिद्धि होती है। यहाँ अनुनासिक लोप हुआ है। ‘तात’