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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 806, कुल 878 में से

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पृष्ठ 806

* अध्याय ३५९ * ७७९

में ‘भू’ धातुके रूप इस प्रकार जानने चाहिये— ‘भूयात्, भूयास्ताम्, भूयासुः। भूयाः, भूयास्तम्, भूयास्त। भूयासम्, भूयास्व, भूयास्म। वाक्यप्रयोग— ‘सुखं भूयात्।’ (सुख हो।) ‘हरिशङ्करौ भूयास्ताम्।’ (विष्णु और शिव हों।) ‘ते भूयासुः।’ (वे हों।) ‘त्वं भूयाः।’ (तुम होओ।) ‘युवाम् ईश्वरौ भूयास्तम्।’ (तुम दोनों ईश्वर—ऐश्वर्यशाली होओ।) ‘यूयं भूयास्त।’ (तुम सब होओ।) ‘अहं भूयासम्।’ (मैं होऊँ।) ‘वयं सर्वदा भूयास्म।’ ‘यक्ष्’ धातुके आत्मनेपदी आशिष्-लिङ् में इस प्रकार रूप होते हैं—‘यक्षीष्ट, यक्षीयास्ताम्, यक्षीरन्। यक्षीष्ठाः, यक्षीयास्थाम्, यक्षीध्वम्। यक्षीय, यक्षीवहि, यक्षीमहि।’ इसी प्रकार ‘एध्’ धातुके ‘आशीर्लिङ्’ में ये रूप जानने चाहिये—‘एधिषीष्ट, एधिषीयास्ताम्, एधिषीरन्। एधिषीष्ठाः, एधिषीयास्थाम्, एधिषीध्वम्। एधिषीय, एधिषीवहि, एधिषीमहि। ‘यक्ष्’ धातुके ‘लृङ्’ लकारमें ये रूप होते हैं—‘अयक्ष्यत, अयक्ष्येताम्, अयक्ष्यन्त। अयक्ष्यथाः, अयक्ष्येथाम्, अयक्ष्यध्वम्। अयक्ष्ये, अयक्ष्यावहि, अयक्ष्यामहि।’ ‘एध्’ धातुके ‘लृङ्’ लकारके रूप इस प्रकार हैं—‘ऐधिष्यत, ऐधिष्येताम्, ऐधिष्यन्त। ऐधिष्यथाः, ऐधिष्येथाम्, ऐधिष्यध्वम्। ऐधिष्ये, ऐधिष्यावहि, ऐधिष्यामहि।’ वाक्यप्रयोग—काचिद् बाधा नाभाविष्यच्चेद् वयम् अरेः ऐधिष्यामहि। (यदि कोई बाधा न पड़े तो हम अवश्य शत्रुसे बढ़ जायँ।) ‘भू’ धातुके ‘लृट्’ लकारमें ‘भविष्यति, भविष्यतः, भविष्यन्ति’— इत्यादि रूप होते हैं। ‘एध्’ धातुके ‘लृट्’ लकारमें— ‘एधिष्यते, एधिष्येते, एधिष्यन्ते। एधिष्यसे, एधिष्येथे, एधिष्यध्वे। एधिष्ये, एधिष्यावहे, एधिष्यामहे।’ ये रूप होते हैं॥ १६—२९॥

इसी प्रकार ‘णिजन्त’ वि-पूर्वक ‘भू’ धातुके ‘लृट्’ लकारमें—‘विभावयिष्यति, विभावयिष्यतः, विभावयिष्यन्ति’ इत्यादि रूप होते हैं। ‘यङ्लुगन्त’ ‘भू’ धातुके ‘लृट्’ लकारमें ‘बोभविष्यति’ इत्यादि रूप होते हैं। ‘नामधातु’ में घटं करोति, पटं करोति’ इत्यादि अर्थमें जिनके ‘घटयति, पटयति’ इत्यादि रूप कह आये हैं, उन्हींके ‘विधिलिङ्’ में ‘घटयेत्, पटयेत्’ इत्यादि रूप होते हैं। इसी तरह ‘पुत्रीयति’ और ‘पुत्रकाम्यति’ इत्यादि नामधातु-सम्बन्धिनी क्रियाओंके रूपोंकी ऊहा कर लेनी चाहिये॥ ३०॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘तिङ्-विभक्त्यन्त सिद्ध रूपोंका वर्णन’ नामक तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५८॥


तीन सौ उनसठवाँ अध्याय

कृदन्त शब्दोंके सिद्ध रूप

कुमार कार्तिकेय कहते हैं—कात्यायन! यह जानना चाहिये कि ‘कृत्’ प्रत्यय भाव, कर्म तथा कर्ता—तीनोंमें होते हैं। वे इस प्रकार हैं— ‘अच्’, ‘अप्’, ‘ल्युट्’, ‘क्तिन्’, भावार्थक ‘घञ्’ करणार्थक ‘घञ्,’, ‘युच्’, ‘अ’ तथा ‘तव्य’ आदि। ‘अच्’ प्रत्यय होनेपर ‘विनी+अच्’ (गुण, अयादेश और विभक्तिकार्य)=विनयः। (ऋदोरप्) उत्कृ+अप्=उत्करः। प्रकृ+अप्=प्रकरः। दिव+अच्=देवः। भद्र+अच्=भद्रः। श्रीकृ+अप्=श्रीकरः।’ इत्यादि रूप होते हैं। ‘ल्युट्’ प्रत्यय होनेपर शुभ+ल्युट् (लकार, टकारकी इत्संज्ञा, लघूपध गुण) ‘युवोरनाकौ।’ (७। १। १) से अनादेश=‘शोभनम्’—इस रूपकी सिद्धि होती है। ‘वृध्’ धातुसे ‘क्तिन्’ प्रत्यय करनेपर ‘वृध्+क्ति’