सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 813, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 813

७८६ * अग्निपुराण *


और पत्तोंसे जो आवाज होती है, उसे मर्मर कहते हैं। आभूषणोंकी ध्वनिका नाम शिञ्जित है। वीणाके स्वरको निक्वण और क्वाण कहते हैं तथा पक्षियोंके कलरवका नाम वाशित है। एक समूहकी आवाजको कोलाहल और कलकल कहते हैं। गीत और गान—ये दोनों समान अर्थके बोधक हैं। प्रतिश्रुत् और प्रतिध्वान—ये प्रतिध्वनिके वाचक हैं। इनमें पहला स्त्रीलिङ्ग (और दूसरा नपुंसकलिङ्ग) है। वीणाके कण्ठसे निषाद आदि स्वर प्रकट होते हैं॥ ५७–६९॥

मधुर एवं अस्फुट ध्वनिको ‘कल’ कहते हैं और सूक्ष्म कलका नाम काकली है। गम्भीर स्वरको ‘मन्द्र’ तथा बहुत ऊँची आवाजको ‘तार’ कहते हैं। कल, मन्द्र और तार—इन तीनों शब्दोंका तीनों ही लिङ्गोंमें प्रयोग होता है। गाने और बजानेकी मिली हुई लयको एकताल कहते हैं। वीणाके तीन नाम हैं—वीणा, वल्लकी और विपञ्ची। सात तारोंसे बजनेवाली वीणाका (जिसे हिंदीमें सतार या सितार कहते हैं) परिवादिनी नाम है। (बाजोंके चार भेद हैं—तत, आनद्ध, सुषिर और घन। इनमें) वीणा आदि बाजेको तत, ढोल और मृदङ्ग आदिको आनद्ध, बाँसुरी आदिको सुषिर और काँसकी झाँझ आदिको घन कहते हैं। इन चारों प्रकारके बाजोंका नाम वाद्य, वादित्र और आतोद्य है। ढोलके दो नाम हैं—मृदङ्ग और मुरज। उसके तीन भेद हैं—अङ्क्य, आलिङ्ग्य और ऊर्ध्व। सुयशका ढिंढोरा पीटनेके लिये जो डंका होता है, उसे यशःपटह और ढक्का कहते हैं। भेरीके अर्थमें आनक और दुन्दुभि शब्दोंका प्रयोग होता है। आनक और पटह—ये दोनों पर्यायवाची शब्द हैं। झर्झरी (झाँझ) और डिण्डिम (ढिंढोरा) आदि बाजोंके भेद हैं। मर्दल और पणव—ये दोनों समानार्थक हैं (इन्हें भी एक प्रकारका बाजा ही समझना चाहिये)।

जिससे गाने-बजानेकी क्रिया और कालका विवेक हो, उस गतिका नाम ‘ताल’ है। गीत और वाद्य आदिका समान अवस्थामें होना ‘लय’ कहलाता है। ताण्डव, नाट्य, लास्य और नर्तन—ये सब ‘नृत्य’ के वाचक हैं। नृत्य, गान और वाद्य—इन तीनोंको ‘तौर्यत्रिक’ एवं ‘नाट्य’ कहते हैं। नाटकमें राजाको भट्टारक और देव कहा जाता है तथा उनके साथ जिसका अभिषेक हुआ हो, उस महारानीको देवी कहते हैं। शृङ्गार, वीर, करुण, अद्भुत, हास्य, भयानक, बीभत्स तथा रौद्र—ये आठ रस हैं। इनमें शृङ्गार-रसके तीन नाम हैं—शृङ्गार, शुचि और उज्ज्वल। वीर-रसके दो नाम हैं—उत्साहवर्धन और वीर। करुणका बोध करानेवाले सात शब्द हैं—कारुण्य, करुणा, घृणा, कृपा, दया, अनुकम्पा तथा अनुक्रोश। हस, हास और हास्य—ये हास्यरसके तथा बीभत्स और विकृत शब्द बीभत्स-रसके वाचक हैं। ये दोनों शब्द तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं। अद्भुतका बोध करानेवाले चार शब्द हैं—विस्मय, अद्भुत, आश्चर्य और चित्र। भैरव, दारुण, भीष्म, घोर, भीम, भयानक, भयंकर और प्रतिभय—ये भयानक अर्थका बोध करानेवाले हैं। रौद्रका पर्याय है—उग्र। ये अद्भुत आदि चौदह शब्द तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं।

दर, त्रास, भीति, भी, साध्वस और भय—ये भयके वाचक हैं। रति आदि मानसिक विकारोंको भाव कहते हैं। भावको व्यक्त करनेवाले रोमाञ्च आदि कार्योंका नाम अनुभाव है। गर्व, अभिमान और अहंकार—ये घमंडके नाम हैं। ‘मेरे समान दूसरा कोई नहीं है’ ऐसी भावनाको मान और चित्तसमुन्नति कहते हैं। अनादर, परिभव, परिभाव और तिरस्क्रिया—ये अपमानके वाचक हैं। व्रीडा, लज्जा, त्रपा और ह्री—ये लाजका बोध करानेवाले हैं। दूसरेके धनको लेनेकी इच्छाका नाम अभिध्यान