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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 815, कुल 878 में से

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पृष्ठ 815

७८८ * अग्निपुराण *


तीन सौ एकसठवाँ अध्याय

अव्यय-वर्ग

**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठजी ! ‘आङ्’ अव्यय ईषत् (स्वल्प), अभिव्याप्ति तथा मर्यादा (सीमा) अर्थमें प्रयुक्त होता है। साथ ही धातुसे उसका संयोग होनेपर जो विभिन्न अर्थ प्रकाशित होते हैं, उन सभी अर्थोंमें उसका प्रयोग समझना चाहिये। ‘आ’ प्रगृह्यसंज्ञक अव्यय है। इसका वाक्य और स्मरण अर्थमें प्रयोग होता है। ‘आः’ अव्यय कोप और पीड़ाका भाव द्योतित करनेके लिये प्रयुक्त होता है। ‘कु’ पाप, कुत्सा (घृणा) और ईषत् अर्थमें तथा ‘धिक्’ फटकार और निन्दाके अर्थमें आता है। ‘च’ अव्ययका प्रयोग समुच्चय$^१$, समाहार$^२$ अर्थमें होता है। अन्वाचय$^३$, इतरेतरयोग$^४$ और ‘स्वस्ति’ आशीर्वाद, क्षेम और पुण्य आदिके अर्थमें तथा ‘अति’ अधिकता एवं उल्लङ्घनके अर्थमें आता है। ‘स्वित्’ प्रश्न और वितर्कका भाव व्यक्त करनेमें तथा ‘तु’ भेद और निश्चयके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘सकृत्’का एक ही साथ और एक बारके अर्थमें तथा ‘आरात्’का दूर और समीपके अर्थमें प्रयोग होता है। ‘पश्चात्’ अव्यय पश्चिम दिशा और पीछेके अर्थमें तथा ‘उत’ शब्द ‘अपि’के अर्थ (समुच्चय और प्रश्न)-में एवं विकल्प अर्थमें आता है। ‘शश्वत्’ पुनः और सदाके अर्थमें तथा ‘साक्षात्’ प्रत्यक्ष एवं तुल्यके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘बत’ अव्ययका प्रयोग खेद, दया, संतोष, विस्मय और सम्बोधनका भाव व्यक्त करनेमें होता है। ‘हन्त’ पद हर्ष, अनुकम्पा, वाक्यके आरम्भ और विषादके अर्थमें आता है। ‘प्रति’ का प्रतिनिधि, वीप्सा एवं लक्षण आदिके अर्थमें प्रयोग किया जाता है। ‘इति’ शब्द हेतु, प्रकरण, प्रकाश आदि और समाप्तिके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘पुरस्तात्’ पद पूर्व दिशा, प्रथम और पुरा (पूर्वकाल)-के अर्थमें आता है। ‘अग्रतः’ (आगे)-के अर्थमें भी इसका प्रयोग होता है। ‘यावत्’ और ‘तावत्’ पद समग्र, अवधि (सीमा), माप और अवधारणके अर्थमें आते हैं। ‘अथो’ एवं ‘अथ’ शब्दका प्रयोग मङ्गल, अनन्तर, आरम्भ, प्रश्न और समग्रताके अर्थमें होता है। ‘वृथा’ शब्द निरर्थक और अविधि अर्थका द्योतक है। ‘नाना’ शब्द अनेक और उभय अर्थमें आता है। ‘नु’ प्रश्न और विकल्पमें तथा ‘अनु’ पश्चात् एवं सादृश्यके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘ननु’ शब्द प्रश्न, निश्चय, अनुज्ञा, अनुनय और सम्बोधनमें तथा ‘अपि’ शब्द निन्दा, समुच्चय, प्रश्न, शङ्का तथा सम्भावनामें प्रयुक्त होता है। ‘वा’ शब्द उपमा और विकल्पमें तथा ‘सामि’ पद आधे एवं निन्दाके अर्थमें आता है। ‘अमा’ शब्द साथ एवं समीपका तथा ‘कम्’ जल और मस्तकका बोध करानेवाला है। ‘एवम्’ पद इव और इत्थंके अर्थमें तथा ‘नूनम्’ तर्क तथा वस्तुके निश्चय करनेमें प्रयुक्त होता है। ‘जोषम्’का अर्थ है मौन और सुख। ‘किम्’ अव्यय प्रश्न और निन्दाके अर्थमें आता है। ‘नाम’ पद प्राकाश्य


१. आपसमें अनपेक्षित अनेक शब्दोंका एक क्रियामें अन्वय होना ‘समुच्चय’ कहलाता है। जैसे ‘ईश्वरं’ ‘गुरुं च भजस्व’। (ईश्वर और गुरुको भजो) यहाँ ‘ईश्वरम्’ और ‘गुरुम्’—इन दो पदोंका एक ही भजन-क्रियामें अन्वय है। २. समूहको ‘समाहार’ कहते हैं। जैसे ‘संज्ञापरिभाषम्’ (संज्ञा और परिभाषाओंका समूह)। ३. एक प्रधान कार्यके साथ-साथ दूसरे अप्रधान कार्यका भी साधन करना ‘अन्वाचय’ है। जैसे किसीसे कहा जाय—‘भिक्षामट गां चानय’ (भिक्षा माँगने जाओ, गाय भी लेते आना)। यहाँ मुख्य कार्य है—भिक्षा माँगना; उसके साथ गाय लानेका कार्य गौण है। ४. परस्पर अपेक्षा रखनेवाले अनेक पदोंका एक क्रियामें अन्वय ‘इतरेतर-योग’ कहलाता है। जैसे—‘धवखदिरौ छिन्धि’ (धव और खदिरको काटो)। यहाँ धव और खदिर—दोनोंका साहचर्य अपेक्षित है।