अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 817, कुल 878 में से
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अन्तरा शब्द भीतरके अर्थमें आता है। अन्तरेण पद भी मध्य अर्थका वाचक है। प्रसह्य शब्द हठका बोध करानेवाला है। साम्प्रतम् और स्थाने शब्द उचितके अर्थमें तथा ‘अभीक्ष्णम्’ और शश्वत् पद सर्वदा—निरन्तरके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। नहि, अ, नो और न—ये अभाव अर्थके बोधक हैं। मास्म, मा और अलम्—इनका निषेधके अर्थमें प्रयोग होता है। चेत् और यदि पद दूसरा पद उपस्थित करनेके लिये प्रयुक्त होते हैं तथा अद्धा और अञ्जसा—ये दोनों पद वास्तवके अर्थमें आते हैं। प्रादुस् और आविर्—इनका अर्थ है प्रकट होना। ओम्, एवम् और परमम्—ये शब्द स्वीकृति या अनुमति देनेके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। समन्ततः, परितः, सर्वतः और विष्वक्—इनका अर्थ है चारों ओर। ‘कामम्’ शब्द अकाम अनुमतिके अर्थमें आता है। ‘अस्तु’ पद असूया (दोषदृष्टि) तथा स्वीकृतिका भाव सूचित करनेवाला है। किसी बातके विरोधमें कुछ कहना हो तो वहाँ ‘ननु’ का प्रयोग होता है। ‘कच्चित्’ शब्द किसीकी अभीष्ट वस्तुकी जिज्ञासाके लिये प्रश्न करनेके अवसरपर प्रयुक्त होता है। निःषमम् और दुःषमम्—ये दोनों पद निन्द्य अर्थका बोध कराते हैं। यथास्वम् और यथायथम् पद यथायोग्य अर्थके वाचक हैं। मृषा एवं मिथ्या शब्द असत्यके और यथातथम् पद सत्यके अर्थमें आता है। एवम्, तु, पुनः, वै और वा—ये निश्चय अर्थके वाचक हैं। ‘प्राक्’ शब्द बीती बातका बोध करानेवाला है। नूनम् और अवश्यम्—ये दो अव्यय निश्चयके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। ‘संवत्’ शब्द वर्षका, ‘अर्वाक्’ शब्द पश्चात् कालका, आम् और एवम् शब्द हामी भरनेका तथा स्वयम् पद अपनेसे—इस अर्थका बोध करानेवाला है। ‘नीचैस्’ अल्प अर्थमें, ‘उच्चैस्’ महान् अर्थमें, ‘प्रायस्’ बाहुल्य अर्थमें तथा ‘शनैस्’ मन्द अर्थमें आता है। ‘सना’ शब्द नित्यका, ‘बहिस्’ शब्द बाह्यका, ‘स्म’ शब्द भूतकालका, ‘अस्तम्’ शब्द अदृश्य होनेका, ‘अस्ति’ शब्द सत्ताका, ‘ऊ’ क्रोधभरी उक्तिका तथा ‘अपि’ शब्द प्रश्न तथा अनुनयका बोधक है। ‘उम्’ तर्कका, ‘उषा’ रात्रिके अन्तका, ‘नमस्’ प्रणामका, ‘अङ्ग’ पुन-अर्थका, ‘दुष्ठु’ निन्दाका तथा ‘सुष्ठु’ शब्द प्रशंसाका वाचक है। ‘सायम्’ शब्द संध्याकालका, ‘प्रगे’ और ‘प्रातर्’ शब्द प्रभातकालका, ‘निकषा’ पद समीपका, ‘ऐषमः’ शब्द वर्तमान वर्षका, ‘परुत्’ शब्द गतवर्षका और ‘परारि’ शब्द उसके भी पहलेके गतवर्षका बोध करानेवाला है। ‘आजके दिन’ इस अर्थमें ‘अद्य’का प्रयोग देखा जाता है। पूर्व, उत्तर, अपर, अधर, अन्य, अन्यतर और इतर शब्दसे ‘पूर्वेऽह्नि’ (पहले दिन) आदिके$^१$ अर्थमें ‘पूर्वेद्युः’ आदि$^२$ अव्ययपद निष्पन्न होते हैं। ‘उभयद्युः’ और ‘उभयेद्युः’—ये ‘दोनों दिन’के अर्थमें आते हैं। ‘परस्मिन्नहनि’ (दूसरे दिन)—के अर्थमें ‘परेद्यवि’का प्रयोग होता है। ‘ह्यस्’ बीते हुए दिनके अर्थमें, ‘श्वस्’ आगामी दिनके अर्थमें तथा ‘परश्वस्’ शब्द उसके बाद आनेवाले दिनके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘तदा’ ‘तदानीम्’ शब्द ‘तस्मिन् काले’ (उस समय)—के अर्थमें आते हैं। ‘युगपत्’ और ‘एकदा’का अर्थ है—एक ही समयमें।
१. यहाँ ‘आदि’ शब्दसे उत्तर आदि शब्दोंका ग्रहण होता है—जैसे उत्तरस्मिन्नह्नि, अपरस्मिन्नह्नि, अन्यस्मिन्नहनि, अन्यतरस्मिन्नहनि तथा इतरस्मिन्नहनि।
२. ‘आदि’ शब्दसे ‘उत्तरेद्युः’, ‘अपरेद्युः’, ‘अवेद्युः’, ‘अन्येद्युः’, ‘अन्यतरेद्युः’ तथा ‘इतरेद्युः’—इन अव्यय-पदोंका ग्रहण करना चाहिये।