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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 835, कुल 878 में से

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पृष्ठ 835

८०८ * अग्निपुराण *


और अधिप—ये स्वामीके वाचक हैं। लक्ष्मीवान्, लक्ष्मण तथा श्रील—ये शोभा और श्रीसे सम्पन्न पुरुषके अर्थमें आते हैं। स्वतन्त्र, स्वैरी और अपावृत शब्द स्वाधीन अर्थके बोधक हैं। खलपू और बहुकर—खलिहान या मैदान साफ करनेवाले पुरुषके अर्थमें आते हैं। दीर्घसूत्र और चिरक्रिय—ये आलसी तथा बहुत विलम्बसे काम पूरा करनेवाले पुरुषके बोधक हैं। बिना विचारे काम करनेवालेको जाल्म और असमीक्ष्यकारी कहते हैं। जो कार्य करनेमें ढीला हो, वह कुण्ठ कहलाता है। कर्मशूर और कर्मठ—ये उत्साहपूर्वक कर्म करनेवालेके वाचक हैं। खानेवालेको भक्षक, घस्मर और अद्मर कहते हैं। लोलुप, गर्धन और गृध्नु—ये लोभीके पर्याय हैं। विनीत और प्रश्रित—ये विनययुक्त पुरुषका बोध करानेवाले हैं। धृष्णु और वियात—ये धृष्टके लिये प्रयुक्त होते हैं। प्रतिभाशाली पुरुषके अर्थमें निभृत और प्रगल्भ शब्दका प्रयोग होता है। भीरुक और भीरु—डरपोकके, बन्दारु और अभिवादक प्रणाम करनेवालेके, भूष्णु, भविष्णु और भविता होनेवालेके तथा ज्ञाता, विदुर और विन्दुक—ये जानकारके वाचक हैं। मत्त, शौण्ड, उत्कट और क्षीब—ये मतवालेके अर्थमें आते हैं (क्षीब शब्द नान्त भी होता है, इसके क्षीबा, क्षीबाणौ, क्षीबाणः इत्यादि रूप होते हैं)। चण्ड और अत्यन्त कोपन—ये अधिक क्रोध करनेवाले पुरुषके बोधक हैं। देवताओंका अनुसरण करनेवालेको देवद्र्यङ् और सब ओर जानेवालेको विष्वग्द्र्यङ् कहते हैं। इसी प्रकार साथ चलनेवाला सध्र्यङ् और तिरछा चलनेवाला तिर्यङ् कहलाता है। वाचोयुक्ति पटु, वाग्मी और वावदूक—ये कुशल वक्ताके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। बहुत अनाप-शनाप बकनेवालेको जल्पाक, वाचाल, वाचाट और बहुगर्ह्यवाक् कहते हैं। अपध्वस्त और धिक्कृत—ये धिक्कारे हुए पुरुषके वाचक हैं। कीलित और संयत शब्द बद्ध (बँधे हुए)-का बोध करानेवाले हैं॥ १—१०॥

रवण और शब्दन—ये आवाज करनेवालेके अर्थमें आते हैं। (नाटक आदिके आरम्भमें जो मङ्गलके लिये आशीर्वादयुक्त स्तुतिका पाठ किया जाता है, उसका नाम नान्दी है।) नान्दीपाठ करनेवालेको नान्दीवादी और नान्दीकर कहते हैं। व्यसनार्त और उपरक्त—ये पीड़ितके अर्थमें आते हैं। विहस्त और व्याकुल—ये शोकाकुल पुरुषका बोध करानेवाले हैं। नृशंस, क्रूर, घातक और पाप—ये दूसरोंसे द्रोह करनेवाले निर्दय मनुष्यके वाचक हैं। ठगको धूर्त और वञ्चक कहते हैं। वैदेह (वैधेय) और वालिश—ये मूर्खके वाचक हैं। कृपण और क्षुद्र—ये कदर्य (कंजूस)-के अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। मार्गण, याचक और अर्थी—ये याचना करनेवालेके अर्थमें आते हैं। अहंकारीको अहंकारवान् और अहंयु तथा शुभके भागीको शुभान्वित और शुभंयु कहते हैं। कान्त, मनोरम और रुच्य—ये सुन्दर अर्थके वाचक हैं। हृद्य, अभीष्ट और अभीप्सित—ये प्रियके समानार्थक शब्द हैं। असार, फल्गु तथा शून्य—ये निस्सार अर्थका बोध करानेवाले हैं। मुख्य, वर्य, वरेण्यक, श्रेयान्, श्रेष्ठ और पुष्कल—ये श्रेष्ठके वाचक हैं। प्राग्र्य, अग्र्य, अग्रीय तथा अग्रिय शब्द भी इसी अर्थमें आते हैं। वड्र, उरु और विपुल—ये विशाल अर्थके बोधक हैं। पीन, पीवन्, स्थूल और पीवर—ये स्थूल या मोटे अर्थका बोध करानेवाले हैं। स्तोक, अल्प, क्षुल्लक, सूक्ष्म, श्लक्ष्ण, दभ्र, कृश, तनु, मात्रा, त्रुटि, लव और कण—ये स्वल्प या सूक्ष्म अर्थके वाचक हैं। भूयिष्ठ, पुरुह और पुरु—ये अधिक अर्थके बोधक हैं। अखण्ड, पूर्ण और सकल—ये