अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 856, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३७७ * ८२९
पूर्ववत् व्यवहार करता; (आत्माके) 'अविकारी' आदि विशेषणोंके समान विशेषणसे युक्त निर्विकाररूपमें प्रतीत होता। नेत्र आदि इन्द्रियाँ भी आत्मा नहीं हैं; क्योंकि वे 'करण' हैं। यही हाल मन और बुद्धिका भी है। वे भी दीपककी भाँति प्रकाशके 'करण' हैं, अतः आत्मा नहीं हो सकते। 'प्राण' भी आत्मा नहीं है; क्योंकि सुषुप्तावस्थामें उसपर जडताका प्रभाव रहता है। जाग्रत् और स्वप्नावस्थामें प्राणके साथ चैतन्य मिला-सा रहता है, इसलिये उसका पृथक् बोध नहीं होता; परंतु सुषुप्तावस्थामें प्राण विज्ञानरहित है—यह बात स्पष्टरूपसे जानी जाती है। अतएव आत्मा इन्द्रिय आदि रूप नहीं है। इन्द्रिय आदि आत्माके करणमात्र हैं। अहंकार भी आत्मा नहीं है; क्योंकि देहकी भाँति वह भी आत्मासे पृथक् उपलब्ध होता है। पूर्वोक्त देह आदिसे भिन्न यह आत्मा सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित है। यह रातमें जलते हुए दीपककी भाँति सबका द्रष्टा और भोक्ता है॥ १—७॥
समाधिके आरम्भकालमें मुनिको इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये—'ब्रह्मसे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल, जलसे पृथ्वी तथा पृथ्वीसे सूक्ष्म शरीर प्रकट हुआ है।' अपञ्चीकृत भूतोंसे पञ्चीकृत भूतोंकी उत्पत्ति हुई है। फिर स्थूल शरीरका ध्यान करके ब्रह्ममें उसके लय होनेकी भावना करे। पञ्चीकृत भूत तथा उनके कार्योंको 'विराट्' कहते हैं। आत्माका वह स्थूल शरीर अज्ञानसे कल्पित है। इन्द्रियोंके द्वारा जो ज्ञान होता है, उसे धीर पुरुष 'जाग्रत्-अवस्था' मानते हैं। जाग्रत्के अभिमानी आत्माका नाम 'विश्व' है। ये (इन्द्रिय-विज्ञान, जाग्रत्-अवस्था और उसके अभिमानी देवता) तीनों प्रणवकी प्रथम मात्रा 'अकारस्वरूप' हैं। अपञ्चीकृत भूत और उनके कार्यको 'लिङ्ग' कहा गया है। सत्रह तत्त्वों (दस इन्द्रिय, पञ्चतन्मात्रा तथा मन और बुद्धि)—से युक्त जो आत्माका सूक्ष्म शरीर है, जिसे 'हिरण्यगर्भ' नाम दिया गया है, उसीको 'लिङ्ग' कहते हैं। जाग्रत्-अवस्थाके संस्कारसे उत्पन्न विषयोंकी प्रतीतिको 'स्वप्न' कहा गया है। उसका अभिमानी आत्मा 'तैजस' नामसे प्रसिद्ध है। वह जाग्रत्के प्रपञ्चसे पृथक् तथा प्रणवकी दूसरी मात्रा 'उकाररूप' है। स्थूल और सूक्ष्म—दोनों शरीरोंका एक ही कारण है—'आत्मा'। आभासयुक्त ज्ञानको 'अध्याहृत ज्ञान' कहते हैं। इन अवस्थाओंका साक्षी 'ब्रह्म' न सत् है, न असत् और न सदसद्रूप ही है। वह न तो अवयवयुक्त है और न अवयवसे रहित; न भिन्न है न अभिन्न; भिन्नाभिन्नरूप भी नहीं है। वह सर्वथा अनिर्वचनीय है। इस बन्धनभूत संसारकी सृष्टि करनेवाला भी वही है। ब्रह्म एक है और केवल ज्ञानसे प्राप्त होता है; कर्मोंद्वारा उसकी उपलब्धि नहीं हो सकती ॥ ८—१७॥
जब बाह्यज्ञानके साधनभूत इन्द्रियोंका सर्वथा लय हो जाता है, केवल बुद्धिकी ही स्थिति रहती है, उस अवस्थाको 'सुषुप्ति' कहते हैं। 'बुद्धि' और 'सुषुप्ति' दोनोंके अभिमानी आत्माका नाम 'प्राज्ञ' है। ये तीनों 'मकार' एवं प्रणवरूप माने गये हैं। यह प्राज्ञ ही अकार, उकार और मकारस्वरूप है। 'अहम्' पदका लक्ष्यार्थभूत चित्स्वरूप आत्मा इन जाग्रत् और स्वप्न आदि अवस्थाओंका साक्षी है। उसमें अज्ञान और उसके कार्यभूत संसारादिक बन्धन नहीं हैं। मैं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्य, आनन्द एवं अद्वैतस्वरूप ब्रह्म हूँ। मैं ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ।