अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
भगवान् श्रीकृष्ण
1362
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गीताप्रेस, गोरखपुर ५-११-१९९९
भगवान्—मत्स्यावतार
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A colorful painting of Lord Shiva in the Narsingha Avatar, depicted as a lion with a large red mane, holding a small child (Ganesha) on his lap. He has four arms, one holding a trident, one holding a snake, and one holding a small cup. He is wearing yellow and red robes. In the foreground, a man lies on the ground, appearing to be in a state of distress or death, with blood on his chest. The background is dark with decorative elements.
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान्—नृसिंहावतार
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गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान्—वामन-अवतार
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गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान्—परशुराम-अवतार
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गीताप्रेस, गोरखपुर Gita Press, Gorakhpur
श्रीराम-विवाह
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श्रीमद्भगवद्गीता, गोरखपुर
श्रीराम-राज्याभिषेक
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भगवान् कल्कि
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- अध्याय १० * १७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
श्रीरामने रावणको युद्धमें अपने बाणोंकी मारसे जर्जरित कर डाला। इससे दुः खित होकर रावणने कुम्भकर्णको सोतेसे जगाया। जागनेपर कुम्भकर्णने हजार घड़े मदिरा पीकर कितने ही भैंस आदि पशुओंका भक्षण किया। फिर रावणसे कुम्भकर्ण बोला—'सीताका हरण करके तुमने पाप किया है। तुम मेरे बड़े भाई हो, इसीलिये तुम्हारे कहनेसे युद्ध करने जाता हूँ। मैं वानरोंसहित रामको मार डालूँगा' ॥ ९—१२॥
ऐसा कहकर कुम्भकर्णने समस्त वानरोंको कुचलना आरम्भ किया। एक बार उसने सुग्रीवको पकड़ लिया, तब सुग्रीवने उसकी नाक और कान काट लिये। नाक और कानसे रहित होकर वह वानरोंका भक्षण करने लगा। यह देख श्रीरामचन्द्रजीने अपने बाणोंसे कुम्भकर्णकी दोनों भुजाएँ काट डालीं। इसके बाद उसके दोनों पैर तथा मस्तक काटकर उसे पृथ्वीपर गिरा दिया। तदनन्तर कुम्भ, निकुम्भ, राक्षस मकराक्ष, महोदर, महापार्श्व, मत्त, राक्षसश्रेष्ठ उन्मत्त, प्रघस, भासकर्ण, विरूपाक्ष, देवान्तक, नरान्तक, त्रिशिरा और अतिकाय युद्धमें कूद पड़े। तब इनको तथा और भी बहुत-से युद्धपरायण राक्षसोंको श्रीराम, लक्ष्मण, विभीषण एवं वानरोंने पृथ्वीपर सुला दिया। तत्पश्चात् इन्द्रजित् (मेघनाद)-ने मायासे युद्ध करते हुए वरदानमें प्राप्त हुए नागपाशद्वारा श्रीराम और लक्ष्मणको बाँध लिया। उस समय हनुमान्जीके द्वारा लाये हुए पर्वतपर उगी हुई 'विशल्या' नामकी ओषधिसे श्रीराम और लक्ष्मणके घाव अच्छे हुए। उनके शरीरसे बाण निकाल दिये गये। हनुमान्जी पर्वतको जहाँसे लाये थे, वहीं उसे पुनः रख आये। इधर मेघनाद निकुम्भिलादेवीके मन्दिरमें होम आदि करने लगा। उस समय लक्ष्मणने अपने बाणोंसे इन्द्रको भी परास्त कर देनेवाले उस वीरको युद्धमें मार गिराया। पुत्रकी मृत्युका समाचार पाकर रावण शोकसे संतप्त हो उठा और सीताको मार डालनेके लिये उद्यत हो उठा; किंतु अविन्ध्यके मना करनेसे वह मान गया और रथपर बैठकर सेनासहित युद्धभूमिमें गया। तब इन्द्रके आदेशसे मातलिने आकर श्रीरघुनाथजीको भी देवराज इन्द्रके रथपर बिठाया ॥ १३—२२ ॥
श्रीराम और रावणका युद्ध श्रीराम और रावणके युद्धके ही समान था—उसकी कहीं भी दूसरी कोई उपमा नहीं थी। रावण वानरोंपर प्रहार करता था और हनुमान् आदि वानर रावणको चोट पहुँचाते थे। जैसे मेघ पानी बरसाता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजीने रावणके ऊपर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। उन्होंने रावणके रथ, ध्वज, अश्व, सारथि, धनुष, बाहु और मस्तक काट डाले। काटे हुए मस्तकोंके स्थानपर दूसरे नये मस्तक उत्पन्न हो जाते थे। यह देखकर श्रीरामचन्द्रजीने ब्रह्मास्त्रके द्वारा रावणका वक्षःस्थल विदीर्ण करके उसे रणभूमिमें गिरा दिया। उस समय [मरनेसे बचे हुए सब] राक्षसोंके साथ रावणकी अनाथा स्त्रियाँ विलाप करने लगीं। तब श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे विभीषणने उन सबको सान्त्वना दे, रावणके शवका दाह-संस्कार किया। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने हनुमान्जीके द्वारा सीताजीको बुलवाया। यद्यपि वे स्वरूपसे ही नित्य शुद्ध थीं, तो भी उन्होंने अग्निमें प्रवेश करके अपनी विशुद्धताका परिचय दिया। तत्पश्चात् रघुनाथजीने उन्हें स्वीकार किया। इसके बाद इन्द्रादि देवताओंने उनका स्तवन किया। फिर ब्रह्माजी तथा स्वर्गवासी महाराज दशरथने आकर स्तुति करते हुए कहा—'श्रीराम ! तुम राक्षसोंका संहार करनेवाले साक्षात् श्रीविष्णु हो।' फिर
१८ * अग्निपुराण *
श्रीरामके अनुरोधसे इन्द्रने अमृत बरसाकर मरे हुए वानरोंको जीवित कर दिया। समस्त देवता युद्ध देखकर, श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा पूजित हो, स्वर्गलोकमें चले गये। श्रीरामचन्द्रजीने लङ्काका राज्य विभीषणको दे दिया और वानरोंका विशेष सम्मान किया॥ २३—२९॥
फिर सबको साथ ले, सीतासहित पुष्पक विमानपर बैठकर श्रीराम जिस मार्गसे आये थे, उसीसे लौट चले। मार्गमें वे सीताको प्रसन्नचित्त होकर वनों और दुर्गम स्थानोंको दिखाते जा रहे थे। प्रयागमें महर्षि भरद्वाजको प्रणाम करके वे अयोध्याके पास नन्दिग्राममें आये। वहाँ भरतने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर वे अयोध्यामें आकर वहीं रहने लगे। सबसे पहले उन्होंने महर्षि वसिष्ठ आदिको नमस्कार करके क्रमशः कौसल्या, कैकेयी और सुमित्राके चरणोंमें मस्तक झुकाया। फिर राज्य-ग्रहण करके ब्राह्मणों आदिका पूजन किया। अश्वमेध-यज्ञ करके उन्होंने अपने आत्मस्वरूप श्रीवासुदेवका यजन किया, सब प्रकारके दान दिये और प्रजाजनोंका पुत्रवत् पालन करने लगे। उन्होंने धर्म और कामादिका भी सेवन किया तथा वे दुष्टोंको सदा दण्ड देते रहे। उनके राज्यमें सब लोग धर्मपरायण थे तथा पृथ्वीपर सब प्रकारकी खेती फली-फूली रहती थी। श्रीरघुनाथजीके शासनकालमें किसीकी अकालमृत्यु भी नहीं होती थी॥ ३०—३५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'रामायण-कथाके अन्तर्गत युद्धकाण्डकी कथाका वर्णन' नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०॥
ग्यारहवाँ अध्याय
उत्तरकाण्डकी संक्षिप्त कथा
नारदजी कहते हैं—जब रघुनाथजी अयोध्याके राजसिंहासनपर आसीन हो गये, तब अगस्त्य आदि महर्षि उनका दर्शन करनेके लिये गये। वहाँ उनका भलीभाँति स्वागत-सत्कार हुआ। तदनन्तर उन ऋषियोंने कहा—'भगवन्! आप धन्य हैं, जो लङ्कामें विजयी हुए और इन्द्रजित्-जैसे राक्षसको मार गिराया। [अब हम उनकी उत्पत्ति-कथा बतलाते हैं, सुनिये—] ब्रह्माजीके पुत्र मुनिवर पुलस्त्य हुए और पुलस्त्यसे महर्षि विश्रवाका जन्म हुआ। उनकी दो पत्नियाँ थीं—पुण्योत्कटा और कैकसी। उनमें पुण्योत्कटा ज्येष्ठ थी। उसके गर्भसे धनाध्यक्ष कुबेरका जन्म हुआ। कैकसीके गर्भसे पहले रावणका जन्म हुआ, जिसके दस मुख और बीस भुजाएँ थीं। रावणने तपस्या की और ब्रह्माजीने उसे वरदान दिया, जिससे उसने समस्त देवताओंको जीत लिया। कैकसीके दूसरे पुत्रका नाम कुम्भकर्ण और तीसरेका विभीषण था। कुम्भकर्ण सदा नींदमें ही पड़ा रहता था; किंतु विभीषण बड़े धर्मात्मा हुए। इन तीनोंकी बहन शूर्पणखा हुई। रावणसे मेघनादका जन्म हुआ। उसने इन्द्रको जीत लिया था, इसलिये 'इन्द्रजित्'के नामसे उसकी प्रसिद्धि हुई। वह रावणसे भी अधिक बलवान् था। परंतु देवताओं आदिके कल्याणकी इच्छा रखनेवाले आपने लक्ष्मणके द्वारा उसका वध करा दिया।' ऐसा कहकर वे अगस्त्य आदि ब्रह्मर्षि श्रीरघुनाथजीके द्वारा अभिनन्दित हो अपने-अपने आश्रमको चले गये। तदनन्तर देवताओंकी प्रार्थनासे प्रभावित श्रीरामचन्द्रजीके आदेशसे शत्रुघ्नने लवणासुरको मारकर एक पुरी बसायी, जो 'मथुरा' नामसे
- अध्याय १२ * १९
प्रसिद्ध हुई। तत्पश्चात् भरतने श्रीरामकी आज्ञा पाकर सिन्धु-तीर-निवासी शैलूष नामक बलोन्मत्त गन्धर्वका तथा उसके तीन करोड़ वंशजोंका अपने तीखे बाणोंसे संहार किया। फिर उस देशके [गान्धार और मद्र] दो विभाग करके, उनमें अपने पुत्र तक्ष और पुष्करको स्थापित कर दिया॥ १-९॥
इसके बाद भरत और शत्रुघ्न अयोध्यामें चले आये और वहाँ श्रीरघुनाथजीकी आराधना करते हुए रहने लगे। श्रीरामचन्द्रजीने दुष्ट पुरुषोंका युद्धमें संहार किया और शिष्ट पुरुषोंका दान आदिके द्वारा भलीभाँति पालन किया। उन्होंने लोकापवादके भयसे अपनी धर्मपत्नी सीताको वनमें छोड़ दिया था। वहाँ वाल्मीकि मुनिके आश्रममें उनके गर्भसे दो श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम कुश और लव थे। उनके उत्तम चरित्रोंको सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको भलीभाँति निश्चय हो गया कि ये मेरे ही पुत्र हैं। तत्पश्चात् उन दोनोंको कोसलके दो राज्योंपर अभिषिक्त करके, 'मैं ब्रह्म हूँ' इसकी भावनापूर्वक ध्यान-योगमें स्थित होकर उन्होंने देवताओंकी प्रार्थनासे भाइयों और पुरवासियोंसहित अपने परमधाममें प्रवेश किया। अयोध्यामें ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य करके वे अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान कर चुके थे। उनके बाद सीताके पुत्र कोसल जनपदके राजा हुए॥ १०-१३॥
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठजी! देवर्षि नारदसे यह कथा सुनकर महर्षि वाल्मीकिने विस्तारपूर्वक रामायण नामक महाकाव्यकी रचना की। जो इस प्रसङ्गको सुनता है, वह स्वर्गलोकको जाता है॥ १४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'रामायण-कथाके अन्तर्गत उत्तरकाण्डकी कथाका वर्णन' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११॥
बारहवाँ अध्याय
हरिवंशका वर्णन एवं श्रीकृष्णकावतारकी संक्षिप्त कथा
अग्निदेव कहते हैं—अब मैं हरिवंशका वर्णन करूँगा। श्रीविष्णुके नाभि-कमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ। ब्रह्माजीसे अत्रि, अत्रिसे सोम, सोमसे [बुध एवं बुधसे] पुरूरवा उत्पन्न हुए। पुरूरवासे आयु, आयुसे नहुष तथा नहुषसे ययातिका जन्म हुआ। ययातिकी पहली पत्नी देवयानीने यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया। उनकी दूसरी पत्नी शर्मिष्ठाके गर्भसे, जो वृषपर्वाकी पुत्री थी, द्रुह्यु, अनु और पूरु—ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए। यदुके वंशमें 'यादव' नामसे प्रसिद्ध क्षत्रिय हुए। उन सबमें भगवान् वासुदेव सर्वश्रेष्ठ थे। परम पुरुष भगवान् विष्णु ही इस पृथ्वीका भार उतारनेके लिये वसुदेव और देवकीके पुत्ररूपमें प्रकट हुए थे। भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे योग-निद्राने क्रमशः छः गर्भ, जो पूर्वजन्ममें हिरण्यकशिपुके पुत्र थे, देवकीके उदरमें स्थापित किये। देवकीके उदरसे सातवें गर्भके रूपमें बलभद्रजी प्रकट हुए थे। ये देवकीसे रोहिणीके गर्भमें खींचकर लाये गये थे, इसलिये [संकर्षण तथा] रौहिणेय कहलाये। तदनन्तर श्रावण मासके*
* शुक्ल पक्षकी प्रतिपदासे लेकर कृष्णपक्षकी अमावस्यातक एक मास होता है। इस मान्यताके अनुसार गणना करनेपर आजकी गणनाके अनुसार जो भाद्रपद कृष्ण अष्टमी है, वही श्रावण कृष्ण अष्टमी सिद्ध होती है। गुजरात, महाराष्ट्रमें अब भी ऐसा ही मानते हैं।
२० * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
कृष्णपक्षकी अष्टमीको आधी रातके समय चार भुजाधारी भगवान् श्रीहरि प्रकट हुए। उस समय देवकी और वसुदेवने उनका स्तवन किया। फिर वे दो बाँहोंवाले नन्हें-से बालक बन गये। वसुदेवने कंसके भयसे अपने शिशुको यशोदाकी शय्यापर पहुँचा दिया और यशोदाकी नवजात बालिकाको देवकीकी शय्यापर लाकर सुला दिया। बच्चेके रोनेकी आवाज सुनकर कंस आ पहुँचा और देवकीके मना करनेपर भी उसने उस बालिकाको उठाकर शिलापर पटक दिया। उसने आकाशवाणीसे सुन रखा था कि देवकीके आठवें गर्भसे मेरी मृत्यु होगी। इसीलिये उसने देवकीके उत्पन्न हुए सभी शिशुओंको मार डाला था ॥ १-९ ॥
कंसके द्वारा शिलापर पटकी हुई वह बालिका आकाशमें उड़ गयी और वहींसे इस प्रकार बोली—'कंस! मुझे पटकनेसे तुम्हारा क्या लाभ हुआ? जिनके हाथसे तुम्हारा वध होगा वे देवताओंके सर्वस्वभूत भगवान् तो इस पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अवतार ले चुके' ॥ १०-११॥
ऐसा कहकर वह चली गयी। उसीने देवताओंकी प्रार्थनासे शुम्भ आदि दैत्योंका वध किया। तब इन्द्रने इस प्रकार स्तुति की—'जो आर्या, दुर्गा, वेदगर्भा, अम्बिका, भद्रकाली, भद्रा, क्षेम्या, क्षेमकरी तथा नैकबाहु$^१$ आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं, उन जगदम्बाको मैं नमस्कार करता हूँ।' जो तीनों समय इन नामोंका पाठ करता है, उसकी सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं।$^२$ उधर कंसने भी (बालिकाकी बात सुनकर) नवजात शिशुओंका वध करनेके लिये पूतना आदिको सब ओर भेजा। कंस
आदिसे डरे हुए वसुदेवने अपने दोनों पुत्रोंकी रक्षाके लिये उन्हें गोकुलमें यशोदापति नन्दजीको सौंप दिया था। वहाँ बलराम और श्रीकृष्ण— दोनों भाई गौओं तथा ग्वालबालोंके साथ विचरा करते थे। यद्यपि वे सम्पूर्ण जगत्के पालक थे, तो भी ब्रजमें गोपालक बनकर रहे। एक बार श्रीकृष्णके ऊधमसे तंग आकर मैया यशोदाने उन्हें रस्सीसे ऊखलमें बाँध दिया। वे ऊखल घसीटते हुए दो अर्जुन-वृक्षोंके बीचसे निकले। इससे वे दोनों वृक्ष टूटकर गिर पड़े। एक दिन श्रीकृष्ण एक छकड़ेके नीचे सो रहे थे। वे माताका स्तनपान करनेकी इच्छासे अपने पैर फेंक-फेंककर रोने लगे। उनके पैरका हलका-सा आघात लगते ही छकड़ा उलट गया ॥ १२-१७॥
पूतना अपना स्तन पिलाकर श्रीकृष्णको मारनेके लिये उद्यत थी; किंतु श्रीकृष्णने ही उसका काम तमाम कर दिया। उन्होंने वृन्दावनमें जानेके पश्चात् कालियनागको परास्त किया और उसे यमुनाके कुण्डसे निकालकर समुद्रमें भेज दिया। बलरामजीके साथ जा, गदहेका रूप धारण करनेवाले धेनुकासुरको मारकर, उन्होंने तालवनको क्षेमयुक्त स्थान बना दिया तथा वृषभरूपधारी अरिष्टासुर और अश्वरूपधारी केशीको मार डाला। फिर श्रीकृष्णने इन्द्रयागके उत्सवको बंद कराया और उसके स्थानमें गिरिराज गोवर्धनकी पूजा प्रचलित की। इससे कुपित हो इन्द्रने जो वर्षा आरम्भ की, उसका निवारण श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वतको धारण करके किया। अन्तमें महेन्द्रने आकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और उन्हें 'गोविन्द' की पदवी दी। फिर अपने पुत्र अर्जुनको
१. नैकबाहुका अर्थ है—अनेक बाँहोंवाली। इससे द्विभुजा, चतुर्भुजा, अष्टभुजा तथा अष्टादशभुजा आदि सभी देवियोंका ग्रहण हो जाता है। २. आर्या दुर्गा वेद गर्भा अम्बिका भद्रकाल्यपि। भद्रा क्षेम्या क्षेमकरी नैकबाहुर्नमामि ताम् ॥ त्रिसंध्यं यः पठेन्नाम सर्वान् कामान् स चाप्नुयात् ॥ (अग्नि० १२। १२-१३)
* अध्याय १२ * २१
उन्हें सौंपा। इससे संतुष्ट होकर श्रीकृष्णने पुनः इन्द्रयागका भी उत्सव कराया। तदनन्तर एक दिन वे दोनों भाई कंसका संदेश लेकर आये हुए अक्रूरके साथ रथपर बैठकर मथुरा चले गये। जाते समय श्रीकृष्णमें अनुराग रखनेवाली गोपियाँ, जिनके साथ वे भाँति-भाँतिकी मधुर लीलाएँ कर चुके थे, उन्हें बहुत देरतक निहारती रहीं। मार्गमें अक्रूरने उनकी स्तुति की। मथुरामें एक रजक (धोबी) को, जो बहुत बढ़-बढ़कर बातें बना रहा था, मारकर श्रीकृष्णने उससे सारे वस्त्र ले लिये॥ १८—२३॥
एक मालीके द्वारपर उन्होंने बलरामजीके साथ फूलकी मालाएँ धारण कीं और मालीको उत्तम वर दिया। कंसकी दासी कुब्जाने उनके शरीरमें चन्दनका लेप कर दिया, इससे प्रसन्न होकर उन्होंने उसका कुबड़ापन दूर कर दिया—उसे सुडौल एवं सुन्दरी बना दिया। आगे जानेपर रङ्गशालाके द्वारपर खड़े हुए कुवलयापीड नामक मतवाले हाथीको मारा और रङ्गभूमिमें प्रवेश करके श्रीकृष्णने मञ्चपर बैठे हुए कंस आदि राजाओंके समक्ष चाणूर नामक मल्लके साथ [उसके ललकारनेपर] कुश्ती लड़ी और बलरामने मुष्टिक नामवाले पहलवानके साथ दंगल शुरू किया। उन दोनों भाइयोंने चाणूर, मुष्टिक तथा अन्य पहलवानोंको भी [बात-की-बातमें] मार गिराया। तत्पश्चात् श्रीहरिने मथुराधिपति कंसको मारकर उसके पिता उग्रसेनको यदुवंशियोंका राजा बनाया। कंसके दो रानियाँ थीं—अस्ति और प्राप्ति। वे दोनों जरासन्धकी पुत्रियाँ थीं। उनकी प्रेरणासे जरासन्धने मथुरापुरीपर घेरा डाल दिया और यदुवंशियोंके साथ बाणोंसे युद्ध करने लगा। बलराम और श्रीकृष्ण जरासन्धको परास्त करके मथुरा छोड़कर गोमन्त पर्वतपर चले आये और द्वारका नगरीका निर्माण करके वहीं यदुवंशियोंके साथ रहने लगे। उन्होंने युद्धमें वासुदेव नाम धारण करनेवाले पौण्ड्रकको भी मारा तथा भूमिपुत्र नरकासुरका वध करके उसके द्वारा हरकर लायी हुई देवता, गन्धर्व तथा यक्षोंकी कन्याओंके साथ विवाह किया। श्रीकृष्णके सोलह हजार आठ रानियाँ थीं, उनमें रुक्मिणी आदि प्रधान थीं॥ २४—३१॥
इसके बाद नरकासुरका दमन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण सत्यभामाके साथ गरुडपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकमें गये। वहाँसे इन्द्रको परास्त करके रत्नोंसहित मणिपर्वत तथा पारिजात वृक्ष उठा लाये और उन्हें सत्यभामाके भवनमें स्थापित कर दिया। श्रीकृष्णने सान्दीपनि मुनिसे अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा ग्रहण की थी। शिक्षा पानेके अनन्तर उन्होंने गुरुदक्षिणाके रूपमें गुरुके मरे हुए बालकको लाकर दिया था। इसके लिये उन्हें 'पञ्चजन' नामक दैत्यको परास्त करके यमराजके लोकमें भी जाना पड़ा था। वहाँ यमराजने उनकी बड़ी पूजा की थी। उन्होंने राजा मुचुकुन्दके द्वारा कालयवनका वध करवा दिया। उस समय मुचुकुन्दने भी भगवान्की पूजा की। भगवान् श्रीकृष्ण वसुदेव, देवकी तथा भगवद्भक्त ब्राह्मणोंका बड़ा आदर-सत्कार करते थे। बलभद्रजीके द्वारा रेवतीके गर्भसे निशठ और उल्मुक नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। श्रीकृष्णद्वारा जाम्बवतीके गर्भसे साम्बका जन्म हुआ। इसी प्रकार अन्य रानियोंसे अन्यान्य पुत्र उत्पन्न हुए। रुक्मिणीके गर्भसे प्रद्युम्नका जन्म हुआ था। वे अभी छः दिनके थे, तभी शम्बरासुर उन्हें मायाबलसे हर ले गया। उसने बालकको समुद्रमें फेंक दिया। समुद्रमें एक मत्स्य उसे निगल गया। उस मत्स्यको एक मल्लाहने पकड़ा और शम्बरासुरको भेंट किया।
२२ * अग्निपुराण *
फिर शम्बरासुरने उस मत्स्यको मायावतीके हवाले कर दिया। मायावतीने मत्स्यके पेटमें अपने पतिको देखकर बड़े आदरसे उसका पालन-पोषण किया। बड़े हो जानेपर मायावतीने प्रद्युम्नसे कहा—'नाथ! मैं आपकी पत्नी रति हूँ और आप मेरे पति कामदेव हैं। पूर्वकालमें भगवान् शङ्करने आपको अनङ्ग (शरीररहित) कर दिया था। आपके न रहनेसे शम्बरासुर मुझे हर लाया है। मैंने उसकी पत्नी होना स्वीकार नहीं किया है। आप मायाके ज्ञाता हैं, अतः शम्बरासुरको मार डालिये' ॥ ३२-३९॥
यह सुनकर प्रद्युम्नने शम्बरासुरका वध किया और अपनी भार्या मायावतीके साथ वे श्रीकृष्णके पास चले गये। उनके आगमनसे श्रीकृष्ण और रुक्मिणीको बड़ी प्रसन्नता हुई। प्रद्युम्नसे उदारबुद्धि अनिरुद्धका जन्म हुआ। बड़े होनेपर वे उषाके स्वामी हुए। राजा बलिके बाण नामक पुत्र था। उषा उसीकी पुत्री थी। उसका निवासस्थान शोणितपुरमें था। बाणने बड़ी भारी तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान् शिवने उसको अपना पुत्र मान लिया था। एक दिन शिवजीने बलोन्मत्त बाणासुरकी युद्धविषयक इच्छासे संतुष्ट होकर उससे कहा—'बाण! जिस दिन तुम्हारे महलका मयूरध्वज अपने-आप टूटकर गिर जाय, उस दिन यह समझना कि तुम्हें युद्ध प्राप्त होगा।' एक दिन कैलास पर्वतपर भगवती पार्वती भगवान् शङ्करके साथ क्रीडा कर रही थीं। उन्हें देखकर उषाके मनमें भी पतिकी अभिलाषा जाग्रत् हुई। पार्वतीजीने उसके मनोभावको समझकर कहा—'वैशाख मासकी द्वादशी तिथिको रातके समय स्वप्नमें जिस पुरुषका तुम्हें दर्शन होगा, वही तुम्हारा पति होगा।' पार्वतीजीकी यह बात सुनकर उषा बहुत प्रसन्न हुई। उक्त तिथिको जब वह अपने घरमें सो गयी, तो उसे वैसा ही स्वप्न दिखायी दिया। उषाकी एक सखी चित्रलेखा थी। वह बाणासुरके मन्त्री कुम्भाण्डकी कन्या थी। उसके बनाये हुए चित्रपटसे उषाने अनिरुद्धको पहचाना कि वे ही स्वप्नमें उससे मिले थे। उसने चित्रलेखाके ही द्वारा श्रीकृष्ण-पौत्र अनिरुद्धको द्वारकासे अपने यहाँ बुला मँगाया। अनिरुद्ध आये और उषाके साथ विहार करते हुए रहने लगे। इसी समय मयूरध्वजके रक्षकोंने बाणासुरको ध्वजके गिरनेकी सूचना दी। फिर तो अनिरुद्ध और बाणासुरमें भयंकर युद्ध हुआ॥ ४०-४७॥
नारदजीके मुखसे अनिरुद्धके शोणितपुर पहुँचनेका समाचार सुनकर, भगवान् श्रीकृष्ण प्रद्युम्न और बलभद्रको साथ ले, गरुडपर बैठकर वहाँ गये और अग्नि एवं माहेश्वर ज्वरको जीतकर शङ्करजीके साथ युद्ध करने लगे। श्रीकृष्ण और शङ्करमें परस्पर बाणोंके आघात-प्रत्याघातसे युक्त भीषण युद्ध होने लगा। नन्दी, गणेश और कार्तिकेय आदि प्रमुख वीरोंको गरुड आदिने तत्काल परास्त कर दिया। श्रीकृष्णने जृम्भणास्त्रका प्रयोग किया, जिससे भगवान् शङ्कर जँभाई लेते हुए सो गये। इसी बीचमें श्रीकृष्णने बाणासुरकी हजार भुजाएँ काट डालीं। जृम्भणास्त्रका प्रभाव कम होनेपर शिवजीने बाणासुरके लिये अभयदान माँगा, तब श्रीकृष्णने दो भुजाओंके साथ बाणासुरको जीवित छोड़ दिया और शङ्करजीसे कहा—॥ ४८-५१॥
श्रीकृष्ण बोले— भगवन्! आपने जब बाणासुरको अभयदान दिया है, तो मैंने भी दे दिया। हम दोनोंमें कोई भेद नहीं है। जो भेद मानता है, वह नरकमें पड़ता है* ॥ ५२॥
* श्रीकृष्ण उवाच— त्वया यदभयं दत्तं बाणस्यास्य मयापि तत्। आवयोर्नास्ति भेदो वै भेदी नरकमाप्नुयात् ॥ (अग्नि० १२।५२)
* अध्याय १३ * २३
अग्निदेव कहते हैं— तदनन्तर शिव आदिने श्रीकृष्णका पूजन किया। वे अनिरुद्ध और उषा आदिके साथ द्वारकामें जाकर उग्रसेन आदि यादवोंके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे॥ ५३॥
अनिरुद्धके वज्र नामक पुत्र हुआ। उसने मार्कण्डेय मुनिसे सब विद्याओंका ज्ञान प्राप्त किया। बलभद्रजीने प्रलम्बासुरको मारा, यमुनाकी धाराको खींचकर फेर दिया, द्विविद नामक वानरका संहार किया तथा अपने हलके अग्रभागसे हस्तिनापुरको गङ्गामें झुकाकर कौरवोंके घमंडको चूर-चूर कर दिया। भगवान् श्रीकृष्ण अनेक रूप धारण करके अपनी रुक्मिणी आदि रानियोंके साथ विहार करते रहे। उन्होंने असंख्य पुत्रोंको जन्म दिया। [अन्तमें यादवोंका उपसंहार करके वे परमधामको पधारे।] जो इस हरिवंशका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त करके अन्तमें श्रीहरिके समीप जाता है॥ ५४—५६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'हरिवंशका वर्णन' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२॥
तेरहवाँ अध्याय
महाभारतकी संक्षिप्त कथा
अग्निदेव कहते हैं— अब मैं श्रीकृष्णकी महिमाको लक्षित करानेवाला महाभारतका उपाख्यान सुनाता हूँ, जिसमें श्रीहरिने पाण्डवोंको निमित्त बनाकर इस पृथ्वीका भार उतारा था। भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। ब्रह्माजीसे अत्रि, अत्रिसे चन्द्रमा, चन्द्रमासे बुध और बुधसे इलानन्दन पुरूरवाका जन्म हुआ। पुरूरवासे आयु, आयुसे राजा नहुष और नहुषसे ययाति उत्पन्न हुए। ययातिसे पूरु हुए। पूरुके वंशमें भरत और भरतके कुलमें राजा कुरु हुए। कुरुके वंशमें शान्तनुका जन्म हुआ। शान्तनुसे गङ्गानन्दन भीष्म उत्पन्न हुए। उनके दो छोटे भाई और थे—चित्राङ्गद और विचित्रवीर्य। ये शान्तनुसे सत्यवतीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। शान्तनुके स्वर्गलोक चले जानेपर भीष्मने अविवाहित रहकर अपने भाई विचित्रवीर्यके राज्यका पालन किया। चित्राङ्गद बाल्यावस्थामें ही चित्राङ्गद नामवाले गन्धर्वके द्वारा मारे गये। फिर भीष्म संग्राममें विपक्षीको परास्त करके काशिराजकी दो कन्याओं—अम्बिका और अम्बालिकाको हर लाये। वे दोनों विचित्रवीर्यकी भार्याएँ हुईं। कुछ कालके बाद राजा विचित्रवीर्य राजयक्ष्मासे ग्रस्त हो स्वर्गवासी हो गये। तब सत्यवतीकी अनुमतिसे व्यासजीके द्वारा अम्बिकाके गर्भसे राजा धृतराष्ट्र और अम्बालिकाके गर्भसे पाण्डु उत्पन्न हुए। धृतराष्ट्रने गान्धारीके गर्भसे सौ पुत्रोंको जन्म दिया, जिनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था॥ १—८॥
राजा पाण्डु वनमें रहते थे। वे एक ऋषिके शापवश शतशृङ्ग मुनिके आश्रमके पास स्त्री-समागमके कारण मृत्युको प्राप्त हुए। [पाण्डु शापके ही कारण स्त्री-सम्भोगसे दूर रहते थे,] इसलिये उनकी आज्ञाके अनुसार कुन्तीके गर्भसे धर्मके अंशसे युधिष्ठिरका जन्म हुआ। वायुसे भीम और इन्द्रसे अर्जुन उत्पन्न हुए। पाण्डुकी दूसरी पत्नी माद्रीके गर्भसे अश्विनीकुमारोंके अंशसे नकुल-सहदेवका जन्म हुआ। [शापवश] एक दिन माद्रीके साथ सम्भोग होनेसे पाण्डुकी मृत्यु हो गयी और माद्री भी उनके साथ सती हो गयी। जब कुन्तीका विवाह नहीं हुआ था, उसी समय [सूर्यके अंशसे] उनके गर्भसे कर्णका जन्म हुआ था। वह दुर्योधनके आश्रयमें रहता था। दैवयोगसे कौरवों और पाण्डवोंमें वैरकी आग
२४ * अग्निपुराण *
प्रज्वलित हो उठी। दुर्योधन बड़ी खोटी बुद्धिका मनुष्य था। उसने लाक्षाके बने हुए घरमें पाण्डवोंको रखकर आग लगाकर उन्हें जलानेका प्रयत्न किया; किंतु पाँचों पाण्डव अपनी माताके साथ उस जलते हुए घरसे बाहर निकल गये। वहाँसे एकचक्रा नगरीमें जाकर वे मुनिके वेशमें एक ब्राह्मणके घरमें निवास करने लगे। फिर बक नामक राक्षसका वध करके वे पाञ्चाल-राज्यमें, जहाँ द्रौपदीका स्वयंवर होनेवाला था, गये। वहाँ अर्जुनके बाहुबलसे मत्स्यभेद होनेपर पाँचों पाण्डवोंने द्रौपदीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया। तत्पश्चात् दुर्योधन आदिको उनके जीवित होनेका पता चलनेपर उन्होंने कौरवोंसे अपना आधा राज्य भी प्राप्त कर लिया। अर्जुनने अग्निदेवसे दिव्य गाण्डीव धनुष और उत्तम रथ प्राप्त किया था। उन्हें युद्धमें भगवान् कृष्ण-जैसे सारथि मिले थे तथा उन्होंने आचार्य द्रोणसे ब्रह्मास्त्र आदि दिव्य आयुध और कभी नष्ट न होनेवाले बाण प्राप्त किये थे। सभी पाण्डव सब प्रकारकी विद्याओंमें प्रवीण थे॥ ९-१६॥
पाण्डुकुमार अर्जुनने श्रीकृष्णके साथ खाण्डव-वनमें इन्द्रके द्वारा की हुई वृष्टिका अपने बाणोंकी [छत्राकार] बाँधसे निवारण करते हुए अग्निको तृप्त किया था। पाण्डवोंने सम्पूर्ण दिशाओंपर विजय पायी। युधिष्ठिर राज्य करने लगे। उन्होंने प्रचुर सुवर्णराशिसे परिपूर्ण राजसूय यज्ञका अनुष्ठान किया। उनका यह वैभव दुर्योधनके लिये असह्य हो उठा। उसने अपने भाई दुःशासन और वैभवप्राप्त सुहृद् कर्णके कहनेसे शकुनिको साथ ले, द्यूत-सभामें जूएमें प्रवृत्त होकर, युधिष्ठिर और उनके राज्यको कपट-द्यूतके द्वारा हँसते-हँसते जीत लिया। जूएमें परास्त होकर युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ वनमें चले गये। वहाँ उन्होंने अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार बारह वर्ष व्यतीत किये। वे वनमें भी पहलेहीकी भाँति प्रतिदिन बहुसंख्यक ब्राह्मणोंको भोजन कराते थे। [एक दिन उन्होंने] अठासी हजार द्विजोंसहित दुर्वासाको [श्रीकृष्ण-कृपासे] परितृप्त किया। वहाँ उनके साथ उनकी पत्नी द्रौपदी तथा पुरोहित धौम्यजी भी थे। बारहवाँ वर्ष बीतनेपर वे विराटनगरमें गये। वहाँ युधिष्ठिर सबसे अपरिचित रहकर 'कङ्क' नामक ब्राह्मणके रूपमें रहने लगे। भीमसेन रसोइया बने थे। अर्जुनने अपना नाम 'बृहन्नला' रखा था। पाण्डवपत्नी द्रौपदी रनिवासमें सैरन्ध्रीके रूपमें रहने लगी। इसी प्रकार नकुल-सहदेवने भी अपने नाम बदल लिये थे। भीमसेनने रात्रिकालमें द्रौपदीका सतीत्व-हरण करनेकी इच्छा रखनेवाले कीचकको मार डाला। तत्पश्चात् कौरव विराटकी गौओंको हरकर ले जाने लगे, तब उन्हें अर्जुनने परास्त किया। उस समय कौरवोंने पाण्डवोंको पहचान लिया। श्रीकृष्णकी बहिन सुभद्राने अर्जुनसे अभिमन्यु नामक पुत्रको उत्पन्न किया था। उसे राजा विराटने अपनी कन्या उत्तरा ब्याह दी॥ १७-२५॥
धर्मराज युधिष्ठिर सात अक्षौहिणी सेनाके स्वामी होकर कौरवोंके साथ युद्ध करनेको तैयार हुए। पहले भगवान् श्रीकृष्ण परम क्रोधी दुर्योधनके पास दूत बनकर गये। उन्होंने ग्यारह अक्षौहिणी सेनाके स्वामी राजा दुर्योधनसे कहा—'राजन्! तुम युधिष्ठिरको आधा राज्य दे दो या उन्हें पाँच ही गाँव अर्पित कर दो; नहीं तो उनके साथ युद्ध करो।' श्रीकृष्णकी बात सुनकर दुर्योधनने कहा—'मैं उन्हें सुईकी नोकके बराबर भूमि भी नहीं दूँगा; हाँ, उनसे युद्ध अवश्य करूँगा।' ऐसा कहकर वह भगवान् श्रीकृष्णको बंदी बनानेके लिये उद्यत हो गया। उस समय राजसभामें भगवान् श्रीकृष्णने अपने परम दुर्धर्ष विश्वरूपका दर्शन कराकर दुर्योधनको भयभीत कर दिया।
* अध्याय १४ * २५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
फिर विदुरने अपने घर ले जाकर भगवान्का पूजन और सत्कार किया। तदनन्तर वे युधिष्ठिरके पास लौट गये और बोले—'महाराज! आप दुर्योधनके साथ युद्ध कीजिये'॥ २६—२९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'आदिपर्वसे आरम्भ करके [उद्योगपर्व-पर्यन्त] महाभारतकथा संक्षिप्त वर्णन' नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३॥
चौदहवाँ अध्याय
कौरव और पाण्डवोंका युद्ध तथा उसका परिणाम
अग्निदेव कहते हैं— युधिष्ठिर और दुर्योधनकी सेनाएँ कुरुक्षेत्रके मैदानमें जा डटीं। अपने विपक्षमें पितामह भीष्म तथा आचार्य द्रोण आदि गुरुजनोंको देखकर अर्जुन युद्धसे विरत हो गये, तब भगवान् श्रीकृष्णने उनसे कहा—"पार्थ! भीष्म आदि गुरुजन शोकके योग्य नहीं हैं। मनुष्यका शरीर विनाशशील है; किंतु आत्माका कभी नाश नहीं होता। यह आत्मा ही परब्रह्म है। 'मैं ब्रह्म हूँ'—इस प्रकार तुम उस आत्माको समझो। कार्यकी सिद्धि और असिद्धिमें समानभावसे रहकर कर्मयोगका आश्रय ले क्षात्रधर्मका पालन करो।" श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर अर्जुन रथारूढ़ हो युद्धमें प्रवृत्त हुए। उन्होंने शङ्खध्वनि की। दुर्योधनकी सेनामें सबसे पहले पितामह भीष्म सेनापति हुए। पाण्डवोंके सेनापति शिखण्डी थे। इन दोनोंमें भारी युद्ध छिड़ गया। भीष्मसहित कौरवपक्षके योद्धा उस युद्धमें पाण्डव-पक्षके सैनिकोंपर प्रहार करने लगे और शिखण्डी आदि पाण्डव-पक्षके वीर कौरव-सैनिकोंको अपने बाणोंका निशाना बनाने लगे। कौरव और पाण्डव-सेनाका वह युद्ध, देवासुर-संग्रामके समान जान पड़ता था। आकाशमें खड़े होकर देखनेवाले देवताओंको वह युद्ध बड़ा आनन्ददायक प्रतीत हो रहा था। भीष्मने दस दिनोंतक युद्ध करके पाण्डवोंकी अधिकांश सेनाको अपने बाणोंसे मार गिराया॥ १—७॥
दसवें दिन अर्जुनने वीरवर भीष्मपर बाणोंकी बड़ी भारी वृष्टि की। इधर द्रुपदकी प्रेरणासे शिखण्डीने भी पानी बरसानेवाले मेघकी भाँति भीष्मपर बाणोंकी झड़ी लगा दी। दोनों ओरके हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल एक-दूसरेके बाणोंसे मारे गये। भीष्मकी मृत्यु उनकी इच्छाके अधीन थी। उन्होंने युद्धका मार्ग दिखाकर वसु-देवताके कहनेपर वसुलोकमें जानेकी तैयारी की और बाणशय्यापर सो रहे। वे उत्तरायणकी प्रतीक्षा में भगवान् विष्णुका ध्यान और स्तवन करते हुए समय व्यतीत करने लगे। भीष्मके बाण-शय्यापर गिर जानेके बाद जब दुर्योधन शोकसे व्याकुल हो उठा, तब आचार्य द्रोणने सेनापतित्वका भार ग्रहण किया। उधर हर्ष मनाती हुई पाण्डवोंकी सेनामें धृष्टद्युम्न सेनापति हुए। उन दोनोंमें बड़ा भयंकर युद्ध हुआ, जो यमलोककी आबादीको बढ़ानेवाला था। विराट और द्रुपद आदि राजा द्रोणरूपी समुद्रमें डूब गये। हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंसे युक्त दुर्योधनकी विशाल वाहिनी धृष्टद्युम्नके हाथसे मारी जाने लगी। उस समय द्रोण कालके समान जान पड़ते थे। इतनेहीमें उनके कानोंमें यह आवाज आयी कि 'अश्वत्थामा मारा गया'। इतना सुनते ही आचार्य द्रोणने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिये। ऐसे समयमें धृष्टद्युम्नके बाणोंसे आहत होकर वे पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ८—१४॥
द्रोण बड़े ही दुर्धर्ष थे। वे सम्पूर्ण क्षत्रियोंका
२६ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
विनाश करके पाँचवें दिन मारे गये। दुर्योधन पुनः शोकसे आतुर हो उठा। उस समय कर्ण उसकी सेनाका कर्णधार हुआ। पाण्डव-सेनाका आधिपत्य अर्जुनको मिला। कर्ण और अर्जुनमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्रोंकी मार-काटसे युक्त महाभयानक युद्ध हुआ, जो देवासुर-संग्रामको भी मात करनेवाला था। कर्ण और अर्जुनके संग्राममें कर्णने अपने बाणोंसे शत्रु-पक्षके बहुत-से वीरोंका संहार कर डाला; किंतु दूसरे दिन अर्जुनने उसे मार गिराया॥ १५-१७॥
तदनन्तर राजा शल्य कौरव-सेनाके सेनापति हुए; किंतु वे युद्धमें आधे दिनतक ही टिक सके। दोपहर होते-होते राजा युधिष्ठिरने उन्हें मार गिराया। दुर्योधनकी प्रायः सारी सेना युद्धमें मारी गयी थी। अन्ततोगत्वा उसका भीमसेनके साथ युद्ध हुआ। उसने पाण्डव-पक्षके पैदल आदि बहुत-से सैनिकोंका वध करके भीमसेनपर धावा किया। उस समय गदासे प्रहार करते हुए दुर्योधनको भीमसेनने मौतके घाट उतार दिया। दुर्योधनके अन्य छोटे भाई भी भीमसेनके ही हाथसे मारे गये थे। महाभारत-संग्रामके उस अठारहवें दिन रात्रिकालमें महाबली अश्वत्थामाने पाण्डवोंकी सोयी हुई एक अक्षौहिणी सेनाको सदाके लिये सुला दिया। उसने द्रौपदीके पाँचों पुत्रों, उसके पाञ्चालदेशीय बन्धुओं तथा धृष्टद्युम्नको भी जीवित नहीं छोड़ा। द्रौपदी पुत्रहीन होकर रोने-बिलखने लगी। तब अर्जुनने सींकके अस्त्रसे अश्वत्थामाको परास्त करके उसके मस्तककी मणि निकाल ली। [उसे मारा जाता देख द्रौपदीने ही अनुनय-विनय करके उसके प्राण बचाये।]॥ १८-२२॥
इतनेपर भी दुष्ट अश्वत्थामाने उत्तराके गर्भको नष्ट करनेके लिये उसपर अस्त्रका प्रयोग किया। वह गर्भ उसके अस्त्रसे प्रायः दग्ध हो गया था; किंतु भगवान् श्रीकृष्णने उसको पुनः जीवन-दान दिया। उत्तराका वही गर्भस्थ शिशु आगे चलकर राजा परीक्षित्के नामसे विख्यात हुआ। कृतवर्मा, कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा—ये तीन कौरवपक्षीय वीर उस संग्रामसे जीवित बचे। दूसरी ओर पाँच पाण्डव, सात्यकि तथा भगवान् श्रीकृष्ण—ये सात ही जीवित रह सके; दूसरे कोई नहीं बचे। उस समय सब ओर अनाथा स्त्रियोंका आर्तनाद व्याप्त हो रहा था। भीमसेन आदि भाइयोंके साथ जाकर युधिष्ठिरने उन्हें सान्त्वना दी तथा रणभूमिमें मारे गये सभी वीरोंका दाह-संस्कार करके उनके लिये जलाञ्जलि दे धन आदिका दान किया। तत्पश्चात् कुरुक्षेत्रमें शरशय्यापर आसीन शान्तनुनन्दन भीष्मके पास जाकर युधिष्ठिरने उनसे समस्त शान्तिदायक धर्म, राजधर्म (आपद्धर्म), मोक्षधर्म तथा दानधर्मकी बातें सुनीं। फिर वे राजसिंहासनपर आसीन हुए। इसके बाद उन शत्रुमर्दक राजाने अश्वमेध-यज्ञ करके उसमें ब्राह्मणोंको बहुत धन दान किया। तदनन्तर द्वारकासे लौटे हुए अर्जुनके मुखसे मूसलकाण्डके कारण प्राप्त हुए शापसे पारस्परिक युद्धद्वारा यादवोंके संहारका समाचार सुनकर युधिष्ठिरने परीक्षित्को राजासनपर बिठाया और स्वयं भाइयोंके साथ महाप्रस्थान कर स्वर्गलोकको चले गये॥ २३-२७॥*
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'भीष्मपर्वसे लेकर अन्ततककी महाभारत-कथाका संक्षेपसे वर्णन' नामक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४॥
* यद्यपि इस अध्यायके अन्ततक महाभारतकी पूरी कथा समाप्त हुई-सी जान पड़ती है, तथापि आश्रमवासिक पर्वसे लेकर स्वर्गारोहण पर्वतकका वृत्तान्त कुछ विस्तारसे कहना शेष रह गया है; इसलिये अगले (पंद्रहवें) अध्यायमें उसे पूरा किया गया है।
* अध्याय १५ * २७
पंद्रहवाँ अध्याय
यदुकुलका संहार और पाण्डवोंका स्वर्गगमन
**अग्निदेव कहते हैं—**ब्रह्मन्! जब युधिष्ठिर राजसिंहासनपर विराजमान हो गये, तब धृतराष्ट्र गृहस्थ-आश्रमसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रविष्ट हो वनमें चले गये। [अथवा ऋषियोंके एक आश्रमसे दूसरे आश्रमोंमें होते हुए वे वनको गये।] उनके साथ देवी गान्धारी और पृथा (कुन्ती) भी थीं। विदुरजी दावानलसे दग्ध हो स्वर्ग सिधारे। इस प्रकार भगवान् विष्णुने पृथ्वीका भार उतारा और धर्मकी स्थापना तथा अधर्मका नाश करनेके लिये पाण्डवोंको निमित्त बनाकर दानव-दैत्य आदिका संहार किया। तत्पश्चात् भूमिका भार बढ़ानेवाले यादवकुलका भी ब्राह्मणोंके शापके बहाने मूसलके द्वारा संहार कर डाला। अनिरुद्धके पुत्र वज्रको राजाके पदपर अभिषिक्त किया। तदनन्तर देवताओंके अनुरोधसे प्रभासक्षेत्रमें श्रीहरि स्वयं ही स्थूल शरीरकी लीलाका संवरण करके अपने धामको पधारे॥ १—४॥
वे इन्द्रलोक और ब्रह्मलोकमें स्वर्गवासी देवताओंद्वारा पूजित होते हैं। बलभद्रजी शेषनागके स्वरूप थे; अतः उन्होंने पातालरूपी स्वर्गका आश्रय लिया। अविनाशी भगवान् श्रीहरि ध्यानी पुरुषोंके ध्येय हैं। उनके अन्तर्धान हो जानेपर समुद्रने उनके निजी निवासस्थानको छोड़कर शेष द्वारकापुरीको अपने जलमें डुबा दिया। अर्जुनने मरे हुए यादवोंका दाह-संस्कार करके उनके लिये जलाञ्जलि दी और धन आदिका दान किया। भगवान् श्रीकृष्णकी रानियोंको, जो पहले अप्सराएँ थीं और अष्टावक्रके शापसे मानवीरूपमें प्रकट हुई थीं, लेकर हस्तिनापुरको चले। मार्गमें डंडे लिये हुए ग्वालोंने अर्जुनका तिरस्कार करके उन सबको छीन लिया। यह भी अष्टावक्रके शापसे ही सम्भव हुआ था। इससे अर्जुनके मनमें बड़ा शोक हुआ। फिर महर्षि व्यासके सान्त्वना देनेपर उन्हें यह निश्चय हुआ कि 'भगवान् श्रीकृष्णके समीप रहनेसे ही मुझमें बल था।' हस्तिनापुरमें आकर उन्होंने भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरसे, जो उस समय प्रजावर्गका पालन करते थे, यह सब समाचार निवेदन किया। वे बोले—'भैया! वही धनुष है, वे ही बाण हैं, वही रथ है और वे ही घोड़े हैं; किंतु भगवान् श्रीकृष्णके बिना सब कुछ उसी प्रकार नष्ट हो गया, जैसे अश्रोत्रियको दिया हुआ दान।' यह सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने राज्यपर परीक्षित्को स्थापित कर दिया॥ ५—११॥
इसके बाद बुद्धिमान् राजा संसारकी अनित्यताका विचार करके द्रौपदी तथा भाइयोंको साथ ले महाप्रस्थानके पथपर अग्रसर हुए। मार्गमें वे श्रीहरिके अष्टोत्तरशत नामोंका जप करते हुए यात्रा करते थे। उस महापथमें क्रमशः द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीमसेन एक-एक करके गिर पड़े। इससे राजा शोकमग्न हो गये। तदनन्तर वे इन्द्रके द्वारा लाये हुए रथपर आरूढ़ हो [दिव्यरूपधारी] भाइयोंसहित स्वर्गको चले गये। वहाँ उन्होंने दुर्योधन आदि सभी धृतराष्ट्रपुत्रोंको देखा। तदनन्तर [उनपर कृपा करनेके लिये अपने धामसे पधारे हुए] भगवान् वासुदेवका भी दर्शन किया। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। यह मैंने तुम्हें महाभारतका प्रसङ्ग सुनाया है। जो इसका पाठ करेगा, वह स्वर्गलोकमें सम्मानित होगा॥ १२—१५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'आश्रमवासिक पर्वसे लेकर स्वर्गारोहण-पर्यन्त महाभारत-कथाका संक्षिप्त वर्णन' नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५॥
२८ * अग्निपुराण *
सोलहवाँ अध्याय
बुद्ध और कल्कि-अवतारोंकी कथा
अग्निदेव कहते हैं— अब मैं बुद्धावतारका वर्णन करूँगा, जो पढ़ने और सुननेवालोंके मनोरथको सिद्ध करनेवाला है। पूर्वकालमें देवताओं और असुरोंमें घोर संग्राम हुआ। उसमें दैत्योंने देवताओंको परास्त कर दिया। तब देवतालोग ‘त्राहि-त्राहि’ पुकारते हुए भगवान्की शरणमें गये। भगवान् मायामोहमय रूपमें आकर राजा शुद्धोदनके पुत्र हुए। उन्होंने दैत्योंको मोहित किया और उनसे वैदिक धर्मका परित्याग करा दिया। वे बुद्धके अनुयायी दैत्य ‘बौद्ध’ कहलाये। फिर उन्होंने दूसरे लोगोंसे वेद-धर्मका त्याग करवाया। इसके बाद माया-मोह ही ‘आर्हत’ रूपसे प्रकट हुआ। उसने दूसरे लोगोंको भी ‘आर्हत’ बनाया। इस प्रकार उनके अनुयायी वेद-धर्मसे वञ्चित होकर पाखण्डी बन गये। उन्होंने नरकमें ले जानेवाले कर्म करना आरम्भ कर दिया। वे सब-के-सब कलियुगके अन्तमें वर्णसंकर होंगे और नीच पुरुषोंसे दान लेंगे। इतना ही नहीं, वे लोग डाकू और दुराचारी भी होंगे। वाजसनेय (बृहदारण्यक)-मात्र ही ‘वेद’ कहलायेगा। वेदकी दस-पाँच शाखाएँ ही प्रमाणभूत मानी जायेंगी। धर्मका चोला पहने हुए सब लोग अधर्ममें ही रुचि रखनेवाले होंगे। राजारूपधारी म्लेच्छ मनुष्योंका ही भक्षण करेंगे॥ १—७॥
तदनन्तर भगवान् कल्कि प्रकट होंगे। वे श्रीविष्णुयशाके पुत्ररूपसे अवतीर्ण हो याज्ञवल्क्यको अपना पुरोहित बनायेंगे। उन्हें अस्त्र-शस्त्र-विद्याका पूर्ण परिज्ञान होगा। वे हाथमें अस्त्र-शस्त्र लेकर म्लेच्छोंका संहार कर डालेंगे तथा चारों वर्णों और समस्त आश्रमोंमें शास्त्रीय मर्यादा स्थापित करेंगे। समस्त प्रजाको धर्मके उत्तम मार्गमें लगायेंगे। उसके बाद श्रीहरि कल्किरूपका परित्याग करके अपने धाममें चले जायँगे। फिर तो पूर्ववत् सत्ययुगका साम्राज्य होगा। साधुश्रेष्ठ! सभी वर्ण और आश्रमके लोग अपने-अपने धर्ममें दृढ़तापूर्वक लग जायँगे। इस प्रकार सम्पूर्ण कल्पों तथा मन्वन्तरोंमें श्रीहरिके अवतार होते हैं। उनमेंसे कुछ हो चुके हैं, कुछ आगे होनेवाले हैं; उन सबकी कोई नियत संख्या नहीं है। जो मनुष्य श्रीविष्णुके अंशावतार तथा पूर्णावतारसहित दस अवतारोंके चरित्रोंका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा निर्मलहृदय होकर परिवारसहित स्वर्गको जाता है। इस प्रकार अवतार लेकर श्रीहरि धर्मकी व्यवस्था और अधर्मका निराकरण करते हैं। वे ही जगत्की सृष्टि आदिके कारण हैं॥ ८—१४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'बुद्ध तथा कल्कि—इन दो अवतारोंका वर्णन' नामक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६॥
सत्रहवाँ अध्याय
जगत्की सृष्टिका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं जगत्की सृष्टि आदिका, जो श्रीहरिकी लीलामात्र है, वर्णन करूँगा; सुनो। श्रीहरि ही स्वर्ग आदिके रचयिता हैं। सृष्टि और प्रलय आदि उन्हींके स्वरूप हैं। सृष्टिके आदिकारण भी वे ही हैं। वे ही निर्गुण हैं और वे ही सगुण हैं। सबसे पहले सत्स्वरूप अव्यक्त ब्रह्म ही था; उस समय न तो आकाश था और न रात-दिन आदिका ही विभाग था।