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भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

४४८ * अग्निपुराण *

हों, उनको युद्धभूमिसे दूर हटाना, युद्धके भीतर जाकर हाथियोंको पानी पिलाना तथा हथियार पहुँचाना—ये सब पैदल सिपाहियोंके कार्य हैं। अपनी सेनाका भेदन करनेकी इच्छा रखनेवाले शत्रुओंसे उसकी रक्षा करना और संगठित होकर युद्ध करनेवाले शत्रु-वीरोंका व्यूह तोड़ डालना—यह ढाल लेकर युद्ध करनेवाले योद्धाओंका कार्य बताया गया है। युद्धमें विपक्षी योद्धाओंको मार भगाना धनुर्धर वीरोंका काम है। अत्यन्त घायल हुए योद्धाको युद्धभूमिसे दूर ले जाना, फिर युद्धमें आना तथा शत्रुके सेनामें त्रास उत्पन्न करना—यह सब रथी वीरोंका कार्य बतलाया जाता है। संगठित व्यूहको तोड़ना, टूटे हुएको जोड़ना तथा चहारदीवारी, तोरण (सदर दरवाजा), अट्टालिका और वृक्षोंको भग्न कर डालना—यह अच्छे हाथीका पराक्रम है। ऊँची-नीची भूमिको पैदल सेनाके लिये उपयोगी जानना चाहिये, रथ और घोड़ोंके लिये समतल भूमि उत्तम है तथा कीचड़से भरी हुई युद्धभूमि हाथियोंके लिये उपयोगी बतायी गयी है॥ ४४-४९$\frac{१}{२}$॥

इस प्रकार व्यूह-रचना करके जब सूर्य पीठकी ओर हों तथा शुक्र, शनैश्चर और दिक्पाल अपने अनुकूल हों, सामनेसे मन्द-मन्द हवा आ रही हो, उस समय उत्साहपूर्वक युद्ध करे तथा नाम एवं गोत्रकी प्रशंसा करते हुए सम्पूर्ण योद्धाओंमें उत्तेजना भरता रहे। साथ ही यह बात भी बताये कि 'युद्धमें विजय होनेपर उत्तम-उत्तम भोगोंकी प्राप्ति होगी और मृत्यु हो जानेपर स्वर्गका सुख मिलेगा।' वीर पुरुष शत्रुओंको जीतकर मनोवाञ्छित भोग प्राप्त करता है और युद्धमें प्राणत्याग करनेपर उसे परमगति मिलती है। इसके सिवा वह जो स्वामीका अन्न खाये रहता है, उसके ऋणसे छुटकारा पा जाता है; अतः युद्धके समान श्रेष्ठ गति दूसरी कोई नहीं है। शूरवीरोंके शरीरसे जब रक्त निकलता है, तब वे पापमुक्त हो जाते हैं। युद्धमें जो शस्त्र-प्रहार आदिका कष्ट सहना पड़ता है, वह बहुत बड़ी तपस्या है। रणमें प्राणत्याग करनेवाले शूरवीरके साथ हजारों सुन्दरी अप्सराएँ चलती हैं। जो सैनिक हतोत्साह होकर युद्धसे पीठ दिखाते हैं, उनका सारा पुण्य मालिकको मिल जाता है और स्वयं उन्हें पग-पगपर एक-एक ब्रह्महत्याके पापका फल प्राप्त होता है। जो अपने सहायकोंको छोड़कर चल देता है, देवता उसका विनाश कर डालते हैं। जो युद्धसे पीछे पैर नहीं हटाते, उन बहादुरोंके लिये अश्वमेध-यज्ञका फल बताया गया है॥ ५०-५६॥

यदि राजा धर्मपर दृढ़ रहे तो उसकी विजय होती है। योद्धाओंको अपने समान योद्धाओंके साथ ही युद्ध करना चाहिये। हाथीसवार आदि सैनिक हाथीसवार आदिके ही साथ युद्ध करें। भागनेवालोंको न मारें। जो लोग केवल युद्ध देखनेके लिये आये हों, अथवा युद्धमें सम्मिलित होनेपर भी जो शस्त्रहीन एवं भूमिपर गिरे हुए हों, उनको भी नहीं मारना चाहिये। जो योद्धा शान्त हो या थक गया हो, नींदमें पड़ा हो तथा नदी या जंगलके बीचमें उतरा हो, उसपर भी प्रहार न करे। दुर्दिनमें शत्रुके नाशके लिये कूटयुद्ध (कपटपूर्ण संग्राम) करे। दोनों बाहें ऊपर उठाकर जोर-जोरसे पुकारकर कहे—'यह देखो, हमारे शत्रु भाग चले, भाग चले। इधर हमारी ओर मित्रोंकी बहुत बड़ी सेना आ पहुँची; शत्रुओंकी सेनाका संचालन करनेवाला मार गिराया गया। यह सेनापति भी मौतके घाट उतर गया। साथ ही शत्रुपक्षके राजाने भी प्राणत्याग कर दिया'॥ ५७-६०॥

भागते हुए विपक्षी योद्धाओंको अनायास ही मारा जा सकता है। धर्मके जाननेवाले परशुरामजी! शत्रुओंको मोहित करनेके लिये कृत्रिम धूपकी

* अध्याय २३७ * ४४९


सुगन्ध भी फैलानी चाहिये। विजयकी पताकाएँ दिखानी चाहिये, बाजोंका भयंकर समारोह करना चाहिये। इस प्रकार जब युद्धमें विजय प्राप्त हो जाय तो देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। अमात्यके द्वारा किये हुए युद्धमें जो रत्न आदि उपलब्ध हों, वे राजाको ही अर्पण करने चाहिये। शत्रुंकी स्त्रियोंपर किसीका भी अधिकार नहीं होता। स्त्री शत्रुंकी हो तो भी उसकी रक्षा ही करनी चाहिये। संग्राममें सहायकोंसे रहित शत्रुको पाकर उसका पुत्रकी भाँति पालन करना चाहिये। उसके साथ पुनः युद्ध करना उचित नहीं है। उसके प्रति देशोचित आचारादिका पालन करना कर्तव्य है॥ ६१-६४॥

युद्धमें विजय पानेके पश्चात् अपने नगरमें जाकर 'ध्रुव' संज्ञक नक्षत्र (तीनों उत्तरा और रोहिणी)-में राजमहलके भीतर प्रवेश करे। इसके बाद देवताओंका पूजन और सैनिकोंके परिवारके भरण-पोषणका प्रबन्ध करना चाहिये। शत्रुके यहाँसे मिले हुए धनका कुछ भाग भृत्योंको भी बाँट दे। इस प्रकार यह रणकी दीक्षा बतायी गयी है; इसके अनुसार कार्य करनेसे राजाको निश्चय ही विजयकी प्राप्ति होती है॥ ६५-६६॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'रणदीक्षा-वर्णन' नामक दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३६॥


दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय

लक्ष्मीस्तोत्र और उसका फल

पुष्कर कहते हैं— परशुरामजी ! पूर्वकालमें इन्द्रने राज्यलक्ष्मीकी स्थिरताके लिये जिस प्रकार भगवती लक्ष्मीकी स्तुति की थी, उसी प्रकार राजा भी अपनी विजयके लिये उनका स्तवन करे॥ १॥

इन्द्र बोले— जो सम्पूर्ण लोकोंकी जननी हैं, समुद्रसे जिनका आविर्भाव हुआ है, जिनके नेत्र खिले हुए कमलके समान शोभायमान हैं तथा जो भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें विराजमान हैं, उन लक्ष्मीदेवीको मैं प्रणाम करता हूँ। जगत्को पवित्र करनेवाली देवि! तुम्हीं सिद्धि हो और तुम्हीं स्वधा, स्वाहा, सुधा, संध्या, रात्रि, प्रभा, भूति, मेधा, श्रद्धा और सरस्वती हो। शोभामयी देवि! तुम्हीं यज्ञविद्या, महाविद्या, गुह्यविद्या तथा मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाली आत्मविद्या हो। आन्वीक्षिकी (दर्शनशास्त्र), त्रयी (ऋक्, साम, यजु), वार्ता (जीविका-प्रधान कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य कर्म) तथा दण्डनीति भी तुम्हीं हो। देवि! तुम स्वयं सौम्यस्वरूपवाली (सुन्दरी) हो; अतः तुमसे व्याप्त होनेके कारण इस जगत्का रूप भी सौम्य-मनोहर दिखायी देता है। भगवति! तुम्हारे सिवा दूसरी कौन स्त्री है, जो कौमोदकी गदा धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् विष्णुके अखिल यज्ञमय विग्रहको, जिसका योगीलोग चिन्तन करते हैं, अपना निवासस्थान बना सके। देवि! तुम्हारे त्याग देनेसे समस्त त्रिलोकी नष्टप्राय हो गयी थी; किंतु इस समय पुनः तुम्हारा ही सहारा पाकर यह समृद्धिपूर्ण दिखायी देती है। महाभागे ! तुम्हारी कृपादृष्टिसे ही मनुष्योंको सदा स्त्री, पुत्र, गृह, मित्र और धन-धान्य आदिकी प्राप्ति होती है। देवि! जिन पुरुषोंपर आपकी दयादृष्टि पड़ जाती है, उन्हें शरीरकी नीरोगता, ऐश्वर्य, शत्रुपक्षकी हानि और सब प्रकारके सुख—कुछ भी दुर्लभ नहीं हैं। मातः! तुम सम्पूर्ण भूतोंकी जननी और देवाधिदेव विष्णु सबके पिता हैं। तुमने और भगवान् विष्णुने इस चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है। सबको पवित्र करनेवाली देवि! तुम मेरी मान-प्रतिष्ठा, खजाना, अन्न-भण्डार, गृह,

४५० * अग्निपुराण *


साज-सामान, शरीर और स्त्री—किसीका भी त्याग न करो। भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें वास करनेवाली लक्ष्मी ! मेरे पुत्र, मित्रवर्ग, पशु तथा आभूषणोंको भी न त्यागो। विमलस्वरूपा देवि! जिन मनुष्योंको तुम त्याग देती हो, उन्हें सत्य, समता, शौच तथा शील आदि सद्गुण भी तत्काल ही छोड़ देते हैं। तुम्हारी कृपादृष्टि पड़नेपर गुणहीन मनुष्य भी तुरंत ही शील आदि सम्पूर्ण उत्तम गुणों तथा पीढ़ियोंतक बने रहनेवाले ऐश्वर्यसे युक्त हो जाते हैं। देवि ! जिसको तुमने अपनी दयादृष्टिसे एक बार देख लिया, वही श्लाघ्य (प्रशंसनीय), गुणवान्, धन्यवादका पात्र, कुलीन, बुद्धिमान्, शूर और पराक्रमी हो जाता है। विष्णुप्रिये ! तुम जगत्की माता हो। जिसकी ओरसे तुम मुँह फेर लेती हो, उसके शील आदि सभी गुण तत्काल दुर्गुणके रूपमें बदल जाते हैं। कमलके समान नेत्रोंवाली देवि! ब्रह्माजीकी जिह्वा भी तुम्हारे गुणोंका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हो सकती। मुझपर प्रसन्न हो जाओ तथा कभी भी मेरा परित्याग न करो ॥ २-१७॥

पुष्कर कहते हैं— इन्द्रके इस प्रकार स्तवन करनेपर भगवती लक्ष्मीने उन्हें राज्यकी स्थिरता और संग्राममें विजय आदिका अभीष्ट वरदान दिया। साथ ही अपने स्तोत्रका पाठ या श्रवण करनेवाले पुरुषोंके लिये भी उन्होंने भोग तथा मोक्ष मिलनेके लिये वर प्रदान किया। अतः मनुष्यको चाहिये कि सदा ही लक्ष्मीके इस स्तोत्रका पाठ और श्रवण करे* ॥ १८-१९ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'श्रीस्तोत्रका वर्णन' नामक दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३७ ॥


* पुष्कर उवाच— राज्यलक्ष्मीस्थिरत्वाय यथेन्द्रेण पुरा श्रियः। स्तुतिः कृता तथा राजा जयार्थं स्तुतिमाचरेत्॥ इन्द्र उवाच— नमस्ये सर्वलोकानां जननीमब्धिसम्भवाम्। श्रियमन्निद्रपद्माक्षीं विष्णोर्वक्षःस्थलस्थिताम्॥ त्वं सिद्धिरस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनि। संध्या रात्रिः प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती॥ यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभने। आत्मविद्या च देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी॥ आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्त्वमेव च। सौम्या सौम्यं जगद्रूपं त्वयैतद्देवि पूरितम्॥ का त्वन्या त्वामृते देवि सर्वयज्ञमयं वपुः। अध्यास्ते देवदेवस्य योगिचिन्त्यं गदाभृतः॥ त्वया देवि परित्यक्तं सकलं भुवनत्रयम्। विनष्टप्रायमभवत् त्वयेदानीं समेधितम्॥ दाराः पुत्रास्तथागारं सुहृद्धान्यधनादिकम्। भवत्येतन्महाभागे नित्यं त्वद्वीक्षणान्नृणाम्॥ शरीरारोग्यमैश्वर्यमरिपक्षक्षयः सुखम्। देवि त्वद्दृष्टिदृष्टानां पुरुषाणां न दुर्लभम्॥ त्वमम्बा सर्वभूतानां देवदेवो हरिः पिता। त्वयैतद् विष्णुना चाम्ब जगद् व्याप्तं चराचरम्॥ मानं कोषं तथा कोष्ठं मा गृहं मा परिच्छदम्। मा शरीरं कलत्रं च त्यजेथाः सर्वपावनि॥ मा पुत्रान् मा सुहृद्वर्गान् मा पशून् मा विभूषणम्। त्यजेथा मम देवस्य विष्णोर्वक्षःस्थलालये॥ सत्येन समशौचाभ्यां तथा शीलादिभिर्गुणैः। त्यज्यन्ते ते नराः सद्यः संत्यक्ता ये त्वयामले॥ त्वयावलोकिताः सद्यः शीलाद्यैरखिलैर्गुणैः। कुलैश्वर्यैश्च युज्यन्ते पुरुषा निर्गुणा अपि॥ स श्लाघ्यः स गुणी धन्यः स कुलीनः स बुद्धिमान्। स शूरः स च विक्रान्तो यस्त्वया देवि वीक्षितः॥ सद्यो वैगुण्यमायान्ति शीलाद्याः सकला गुणाः। पराङ्मुखी जगद्धात्री यस्य त्वं विष्णुवल्लभे॥ न ते वर्णयितुं शक्ता गुणान् जिह्वापि वेधसः। प्रसीद देवि पद्माक्षि मास्मांस्त्याक्षीः कदाचन॥ पुष्कर उवाच एवं स्तुता ददौ श्रीश्च वरमिन्द्राय चेप्सितम्। सुस्थिरत्वं च राज्यस्य संग्रामविजयादिकम्॥ स्वस्तोत्रपाठश्रवणकर्तॄणां भुक्तिमुक्तिदम्। श्रीस्तोत्रं सततं तस्मात् पठेच्च शृणुयान्नरः॥ (अग्निपुराण २३७। १—१९)

  • अध्याय २३८ * ४५१

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दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय

श्रीरामके द्वारा उपदिष्ट राजनीति

अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ! मैंने तुमसे पुष्करकी कही हुई नीतिका वर्णन किया है। अब तुम लक्ष्मणके प्रति श्रीरामचन्द्रद्वारा कही गयी विजयदायिनी नीतिका निरूपण सुनो। यह धर्म आदिको बढ़ानेवाली है ॥ १ ॥

श्रीराम कहते हैं— लक्ष्मण! न्याय (धान्यका छठा भाग लेने आदि)-के द्वारा धनका अर्जन करना, अर्जित किये हुए धनको व्यापार आदि द्वारा बढ़ाना, उसकी स्वजनों और परजनोंसे रक्षा करना तथा उसका सत्पात्रमें नियोजन करना (यज्ञादिमें तथा प्रजापालनमें लगाना एवं गुणवान् पुत्रको सौंपना)—ये राजाके चार प्रकारके व्यवहार बताये गये हैं। (राजा नय और पराक्रमसे सम्पन्न एवं भलीभाँति उद्योगशील होकर स्वमण्डल एवं परमण्डलकी लक्ष्मीका चिन्तन करे।) नयका मूल है विनय और विनयकी प्राप्ति होती है, शास्त्रके निश्चयसे। इन्द्रिय-जयका ही नाम विनय है जो उस विनयसे युक्त होता है, वही शास्त्रोंको प्राप्त करता है। (जो शास्त्रमें निष्ठा रखता है, उसीके हृदयमें शास्त्रके अर्थ (तत्त्व) स्पष्टतया प्रकाशित होते हैं। ऐसा होनेसे स्वमण्डल और परमण्डलकी 'श्री' प्रसन्न (निष्कण्टकरूपसे प्राप्त) होती है—उसके लिये लक्ष्मी अपना द्वार खोल देती हैं) ॥ २-३॥

शास्त्रज्ञान, आठ$^१$ गुणोंसे युक्त बुद्धि, धृति (उद्वेगका अभाव), दक्षता (आलस्यका अभाव), प्रगल्भता (सभामें बोलने या कार्य करनेमें भय अथवा संकोचका न होना), धारणशीलता (जानी-सुनी बातको भूलने न देना), उत्साह (शौर्यादि गुण$^२$), प्रवचन-शक्ति, दृढ़ता (आपत्कालमें क्लेश सहन करनेकी क्षमता), प्रभाव (प्रभु-शक्ति), शुचिता (विविध उपायोंद्वारा परीक्षा लेनेसे सिद्ध हुई आचार-विचारकी शुद्धि), मैत्री (दूसरोंको अपने प्रति आकृष्ट कर लेनेका गुण), त्याग (सत्पात्रको दान देना), सत्य (प्रतिज्ञापालन), कृतज्ञता (उपकारको न भूलना), कुल (कुलीनता), शील (अच्छा स्वभाव) और दम (इन्द्रियनिग्रह तथा क्लेशसहनकी क्षमता)—ये सम्पत्तिके हेतुभूत गुण हैं$^३$ ॥ ४-५ ॥

विस्तृत विषयरूपी वनमें दौड़ते हुए तथा निरङ्कुश होनेके कारण विप्रमाथी (विनाशकारी) इन्द्रियरूपी हाथीको ज्ञानमय अङ्कुशसे वशमें करे। काम, क्रोध, लोभ, हर्ष, मान और मद—ये 'षड्वर्ग' कहे गये हैं। राजा इनका सर्वथा त्याग कर दे। इन सबका त्याग हो जानेपर वह सुखी होता है ॥ ६-७ ॥

राजाको चाहिये कि वह विनय-गुणसे सम्पन्न हो आन्वीक्षिकी (आत्मविद्या एवं तर्कविद्या), वेदत्रयी, वार्ता (कृषि, वाणिज्य और पशुपालन) तथा दण्डनीति—इन चार विद्याओंका उनके विद्वानों तथा उन विद्याओंके अनुसार अनुष्ठान करनेवाले कर्मठ पुरुषोंके साथ बैठकर चिन्तन करे (जिससे लोकमें इनका सम्यक् प्रचार और प्रसार हो)।


१. बुद्धिके आठ गुण ये हैं—सुननेकी इच्छा, सुनना, ग्रहण करना, धारण करना (याद रखना), अर्थ-विज्ञान (विविध साध्य-साधनोंके स्वरूपका विवेक), ऊह (वितर्क), अपोह (अयुक्त-युक्तिका त्याग) तथा तत्त्वज्ञान (वस्तुके स्वभावका निर्णय)। जैसा कि कौटिल्यने कहा है— 'शुश्रूषाश्रवणग्रहणधारणविज्ञानापोहतत्त्वाभिनिवेशाः प्रज्ञागुणाः' (कौटि० अर्थ० ६। १। ९६)
२. उत्साहके सूचक चार गुण हैं—दक्षता (आलस्यका अभाव), शीघ्रकारिता, अमर्ष (अपमानको न सह सकना) तथा शौर्य।
३. यहाँ धारणशीलता बुद्धिसे और दक्षता उत्साहसे सम्बन्ध रखनेवाले गुण हैं; अतः इनका वहीं अन्तर्भाव हो सकता था; तथापि इनका जो पृथक् उपादान हुआ है, वह इन गुणोंकी प्रधानता सूचित करनेके लिये है।

४५२ * अग्निपुराण *


‘आन्वीक्षिकी’ से आत्मज्ञान एवं वस्तुके यथार्थ स्वभावका बोध होता है। धर्म और अधर्मका ज्ञान ‘वेदत्रयी’ पर अवलम्बित है, अर्थ और अनर्थ ‘वार्ता’ के सम्यक् उपयोगपर निर्भर हैं तथा न्याय और अन्याय ‘दण्डनीति’ के समुचित प्रयोग और अप्रयोगपर आधारित हैं॥ ८-९॥

किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना—कष्ट न पहुँचाना, मधुर वचन बोलना, सत्यभाषण करना, बाहर और भीतरसे पवित्र रहना एवं शौचाचारका पालन करना, दीनोंके प्रति दयाभाव रखना तथा क्षमा (निन्दा आदिको सह लेना)—ये चारों वर्णों तथा आश्रमोंके सामान्य धर्म कहे गये हैं। राजाको चाहिये कि वह प्रजापर अनुग्रह करे और सदाचारके पालनमें संलग्न रहे। मधुर वाणी, दीनोंपर दया, देश-कालकी अपेक्षासे सत्पात्रको दान, दीनों और शरणागतोंकी रक्षा* तथा सत्पुरुषोंका सङ्ग—ये सत्पुरुषोंके आचार हैं। यह आचार प्रजासंग्रहका उपाय है, जो लोकमें प्रशंसित होनेके कारण श्रेष्ठ है तथा भविष्यमें भी अभ्युदयरूप फल देनेवाला होनेके कारण हितकारक है। यह शरीर मानसिक चिन्ताओं तथा रोगोंसे घिरा हुआ है। आज या कल इसका विनाश निश्चित है। ऐसी दशामें इसके लिये कौन राजा धर्मके विपरीत आचरण करेगा?॥ १०-१२$\frac{१}{२}$॥

राजाको चाहिये कि वह अपने लिये सुखकी इच्छा रखकर दीन-दुखी लोगोंको पीड़ा न दे; क्योंकि सताया जानेवाला दीन-दुखी मनुष्य दुःखजनित क्रोधके द्वारा अत्याचारी राजाका विनाश कर डालता है। अपने पूजनीय पुरुषको जिस तरह सादर हाथ जोड़ा जाता है, कल्याणकामी राजा दुष्टजनको उससे भी अधिक आदर देते हुए हाथ जोड़े। (तात्पर्य यह है कि दुष्टको सामनीतिसे ही वशमें किया जा सकता है।) साधु सुहृदों तथा दुष्ट शत्रुओंके प्रति भी सदा प्रिय वचन ही बोलना चाहिये। प्रियवादी ‘देवता’ कहे गये हैं और कटुवादी ‘पशु’॥ १३-१५$\frac{१}{२}$॥

बाहर और भीतरसे शुद्ध रहकर राजा आस्तिकता (ईश्वर तथा परलोकपर विश्वास)-द्वारा अन्तःकरणको पवित्र बनाये और सदा देवताओंका पूजन करे। गुरुजनोंका देवताओंके समान ही सम्मान करे तथा सुहृदोंको अपने तुल्य मानकर उनका भलीभाँति सत्कार करे। वह अपने ऐश्वर्यकी रक्षा एवं वृद्धिके लिये गुरुजनोंको प्रतिदिन प्रणामद्वारा अनुकूल बनाये। अनूचान (साङ्गवेदके अध्येता) की-सी चेष्टाओंद्वारा विद्यावृद्ध सत्पुरुषोंका साम्मुख्य प्राप्त करे। सुकृतकर्म (यज्ञादि पुण्यकर्म तथा गन्ध-पुष्पादि-समर्पण)-द्वारा देवताओंको अपने अनुकूल करे। सद्भाव (विश्वास)-द्वारा मित्रका हृदय जीते, सम्भ्रम (विशेष आदर)-से बान्धवों (पिता और माताके कुलोंके बड़े-बूढ़ों)-को अनुकूल बनाये। स्त्रीको प्रेमसे तथा भृत्यवर्गको दानसे वशमें करे। इनके अतिरिक्त जो बाहरी लोग हैं, उनके प्रति अनुकूलता दिखाकर उनका हृदय जीते॥ १६-१८$\frac{१}{२}$॥

दूसरे लोगोंके कृत्योंकी निन्दा या आलोचना न करना, अपने वर्ण तथा आश्रमके अनुरूप धर्मका निरन्तर पालन, दीनोंके प्रति दया, सभी लोक-व्यवहारोंमें सबके प्रति मीठे वचन बोलना, अपने अनन्य मित्रका प्राण देकर भी उपकार करनेके लिये उद्यत रहना, घरपर आये हुए मित्र या अन्य सज्जनोंको भी हृदयसे लगाना—उनके प्रति अत्यन्त स्नेह एवं आदर प्रकट करना, आवश्यकता हो तो उनके लिये यथाशक्ति धन देना, लोगोंके कटु व्यवहार एवं कठोर वचनको


* यहाँ यह प्रश्न होता है कि ‘शरणागतोंकी रक्षा तो दयाका ही कार्य है, अतः दयासे ही वह सिद्ध है, फिर उसका अलग कथन क्यों किया गया?’ इसके उत्तरमें निवेदन है कि दयाके दो भेद हैं—‘उत्कृष्टा’ और ‘अनुत्कृष्टा’। इनमें जो उत्कृष्टा दया है, उसके द्वारा दीनोंका उद्धार होता है और अनुत्कृष्टा दयासे उपगत या शरणागतकी रक्षा की जाती है—यही सूचित करनेके लिये उसका अलग प्रतिपादन किया गया है।

  • अध्याय २३९ * ४५३

भी सहन करना, अपनी समृद्धिके अवसरोंपर निर्विकार रहना (हर्ष या दर्पके वशीभूत न होना), दूसरोंके अभ्युदयपर मनमें ईर्ष्या या जलन न होना, दूसरोंको ताप देनेवाली बात न बोलना, मौनव्रतका आचरण (अधिक वाचाल न होना), बन्धुजनोंके साथ अटूट सम्बन्ध बनाये रखना, सज्जनोंके प्रति चतुरश्रता (अवक्र—सरलभावसे उनका समाराधन), उनकी हार्दिक सम्मतिके अनुसार कार्य करना—ये महात्माओंके आचार हैं॥ १९–२२॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'रामोक्तनीतिका वर्णन' नामक दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३८॥

दो सौ उनतालीसवाँ अध्याय

श्रीरामकी राजनीति

श्रीराम कहते हैं— लक्ष्मण! स्वामी (राजा), अमात्य (मन्त्री), राष्ट्र (जनपद), दुर्ग (किला), कोष (खजाना), बल (सेना) और सुहृत् (मित्रादि)—ये राज्यके परस्पर उपकार करनेवाले सात अङ्ग कहे गये हैं। राज्यके अङ्गोंमें राजा और मन्त्रीके बाद राष्ट्र प्रधान एवं अर्थका साधन है, अतः उसका सदा पालन करना चाहिये। (इन अङ्गोंमें पूर्व-पूर्व अङ्ग परकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं।)॥ १$\frac{१}{२}$॥

कुलीनता, सत्त्व (व्यसन और अभ्युदयमें भी निर्विकार रहना), युवावस्था, शील (अच्छा स्वभाव), दाक्षिण्य (सबके अनुकूल रहना या उदारता), शीघ्रकारिता (दीर्घसूत्रताका अभाव), अविसंवादिता (वाक्छलका आश्रय लेकर परस्पर विरोधी बातें न करना), सत्य (मिथ्याभाषण न करना), वृद्धसेवा (विद्यावृद्धोंकी सेवामें रहना और उनकी बातोंको मानना), कृतज्ञता (किसीके उपकारको न भुलाकर प्रत्युपकारके लिये उद्यत रहना), दैवसम्पन्नता (प्रबल पुरुषार्थसे दैवको भी अनुकूल बना लेना), बुद्धि (शुश्रूषा आदि आठ गुणोंसे युक्त प्रज्ञा), अक्षुद्रपरिवारता (दुष्ट परिजनोंसे युक्त न होना), शक्यसामन्तता (आसपासके माण्डलिक राजाओंको वशमें किये रहना), दृढ़भक्तित्ता (सुदृढ़ अनुराग), दीर्घदर्शिता (दीर्घकालमें घटित होनेवाली बातोंका अनुमान कर लेना), उत्साह, शुद्धचित्तता, स्थूललक्षता (अत्यन्त मनस्वी होना), विनीतता (जितेन्द्रियता) और धार्मिकता—ये अच्छे आभिगामिक$^१$ गुण हैं॥ २–४$\frac{१}{२}$॥

जो सुप्रसिद्ध कुलमें उत्पन्न, क्रूरतारहित, गुणवान् पुरुषोंका संग्रह करनेवाले तथा पवित्र (शुद्ध) हों, ऐसे लोगोंको आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाला राजा अपना परिवार बनाये॥ ५$\frac{१}{२}$॥

वाग्मी (उत्तम वक्ता—ललित, मधुर एवं अल्पाक्षरोंद्वारा ही बहुत-से अर्थोंका प्रतिपादन करनेवाला), प्रगल्भ (सभामें सबको निगृहीत करके निर्भय बोलनेवाला), स्मृतिमान्$^२$ (स्वभावतः किसी बातको न भूलनेवाला), उदग्र (ऊँचे कदवाला), बलवान् (शारीरिक बलसे सम्पन्न एवं युद्ध आदिमें समर्थ), वशी (जितेन्द्रिय), दण्डनेता (चतुरङ्गिणी सेनाका समुचित रीतिसे संचालन करनेमें समर्थ), निपुण (व्यवहारकुशल), कृतविद्य (शास्त्रीयविद्यासे सम्पन्न), स्ववग्रह (प्रमादसे अनुचित कर्ममें प्रवृत्त होनेपर वहाँसे


१. इन गुणोंसे युक्त राजा सबके लिये अभिगम्य—मिलने योग्य होता है। २. स्मृति बुद्धिका गुण है, जिसकी गणना आभिगामिक गुणोंमें हो चुकी है। उसका पुनः यहाँ ग्रहण उसकी श्रेष्ठता और अनिवार्यता सूचित करनेके लिये है।

४५४ * अग्निपुराण *

सुखपूर्वक निवृत्त किये जाने योग्य), पराभियोगप्रसह (शत्रुओं द्वारा छेड़े गये युद्धादिके कष्टको दृढ़तापूर्वक सहन करनेमें समर्थ—सहसा आत्मसमर्पण न करनेवाला), सर्वदृष्टप्रतिक्रिय (सब प्रकारके संकटोंके निवारणके अमोघ उपायको तत्काल जान लेनेवाला), परच्छिद्रान्ववेक्षी (गुप्तचर आदिके द्वारा शत्रुओंके छिद्रोंके अन्वेषणमें प्रयत्नशील), संधिविग्रहत्तत्ववित् (अपनी तथा शत्रु की अवस्थाके बलाबल-भेदको जानकर संधि-विग्रह आदि छहों गुणोंके प्रयोगके ढंग और अवसरको ठीक-ठीक जाननेवाला), गूढमन्त्रप्रचार (मन्त्रणा और उसके प्रयोगको सर्वथा गुप्त रखनेवाला), देशकालविभागवित् (किस प्रकारकी सेना किस देश और किस कालमें विजयिनी होगी—इत्यादि बातोंको विभागपूर्वक जाननेवाला), आदाता सम्यगर्थानाम् (प्रजा आदिसे न्यायपूर्वक धन लेनेवाला), विनियोक्ता (धनको उचित एवं उत्तम कार्यमें लगानेवाला), पात्रवित् (सत्पात्रका ज्ञान रखनेवाला), क्रोध, लोभ, भय, द्रोह, स्तम्भ (मान) और चपलता (बिना विचारे कार्य कर बैठना)—इन दोषोंसे दूर रहनेवाला, परोपताप (दूसरोंको पीड़ा देना), पैशुन्य (चुगली करके मित्रोंमें परस्पर फूट डालना), मात्सर्य (डाह), ईर्ष्या (दूसरोंके उत्कर्षको न सह सकना) और अनृत¹ (असत्यभाषण)—इन दुर्गुणोंको लाँघ जानेवाला, वृद्धजनोंके उपदेशको मानकर चलनेवाला, श्लक्ष्ण (मधुरभाषी), मधुरदर्शन (आकृतिसे सुन्दर एवं सौम्य दिखायी देनेवाला), गुणानुरागी (गुणवानोंके गुणोंपर रीझनेवाला) तथा मितभाषी (नपी-तुली बात कहनेवाला) राजा श्रेष्ठ है। इस प्रकार यहाँ राजाके आत्मसम्पत्ति-सम्बन्धी गुण (उसके स्वरूपके उपपादक गुण) बताये गये हैं॥ ६-१० $\frac{\text{१}}{\text{३}}$ ॥

उत्तम कुलमें उत्पन्न, बाहर-भीतरसे शुद्ध, शौर्य-सम्पन्न, आन्वीक्षिकी आदि विद्याओंको जाननेवाले, स्वामिभक्त तथा दण्डनीतिका समुचित प्रयोग जाननेवाले लोग राजाके सचिव (अमात्य²) होने चाहिये ॥ ११ $\frac{\text{१}}{\text{३}}$ ॥

जिसे अन्यायसे हटाना कठिन न हो, जिसका जन्म उसी जनपदमें हुआ हो, जो कुलीन (ब्राह्मण आदि), सुशील, शारीरिक बलसे सम्पन्न, उत्तम वक्ता, सभामें निर्भीक होकर बोलनेवाला, शास्त्ररूपी नेत्रसे युक्त, उत्साहवान् (उत्साहसम्बन्धी त्रिविध³ गुण—शौर्य, अमर्ष एवं दक्षतासे सम्पन्न), प्रतिपत्तिमान् (प्रतिभाशाली, भय आदिके अवसरोंपर उनका तत्काल प्रतिकार करनेवाला), स्तब्धता (मान) और चपलतासे रहित, मैत्र (मित्रोंके अर्जन एवं संग्रहमें कुशल), शीत-उष्ण आदि क्लेशोंको सहन करनेमें समर्थ, शुचि (उपधाद्वारा परीक्षासे प्रमाणित हुई शुद्धिसे सम्पन्न), सत्य (झूठ न बोलना), सत्त्व (व्यसन और अभ्युदयमें भी निर्विकार रहना), धैर्य, स्थिरता, प्रभाव तथा आरोग्य आदि गुणोंसे सम्पन्न, कृतशिल्प (सम्पूर्ण कलाओंके अभ्याससे सम्पन्न), दक्ष (शीघ्रतापूर्वक कार्यसम्पादनमें कुशल), प्रज्ञावान् (बुद्धिमान्), धारणान्वित (अविस्मरणशील), दृढ़भक्ति (स्वामीके प्रति अविचल अनुराग रखनेवाला) तथा किसीसे वैर न रखनेवाला और दूसरोंद्वारा किये गये विरोधको शान्त कर देनेवाला पुरुष राजाका बुद्धिसचिव एवं कर्मसचिव होना चाहिये ॥ १२-१४ $\frac{\text{१}}{\text{३}}$ ॥

स्मृति (अनेक वर्षोंकी बीती बातोंको भी न भूलना), अर्थ-तत्परता (दुर्गादिकी रक्षा एवं संधि


१. आभिगामिक गुणोंमें 'सत्य' आ चुका है, यहाँ भी अनृत-त्याग कहकर जो पुनः उसका ग्रहण किया गया है, यह दोनों जगह उसकी अङ्गता प्रदर्शित करनेके लिये है। २. कौटिल्यने भी ऐसा ही कहा है—'अभिजनप्रज्ञाशौचशौर्यानुरोगयुक्तान् अमात्यान् कुर्वीत।' (कौटि० अर्थ० १।८।४) ३. कौटिल्यने भी ऐसा ही कहा है—'शौर्यममर्षो दाक्ष्यं चोत्साहगुणाः।' (कौटि० अर्थ० ६।१।९६)

  • अध्याय २३९ * ४५५

आदिमें सदैव तत्पर रहना), वितर्क (विचार), ज्ञाननिश्चय (यह ऐसा ही है, अन्यथा नहीं है—इस प्रकारका निश्चय), दृढ़ता तथा मन्त्रगुप्ति (कार्यसिद्धि होनेतक मन्त्रणाको अत्यन्त गुप्त रखना)—ये 'मन्त्रिसम्पत्' के गुण कहे गये हैं॥ १५$\frac{१}{२}$॥

पुरोहितको तीनों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद) तथा दण्डनीतिके ज्ञानमें भी कुशल होना चाहिये; वह सदा अथर्ववेदोक्त विधिसे राजाके लिये शान्तिकर्म एवं पुष्टिकर्मका सम्पादन करे$^१$॥ १६$\frac{१}{२}$॥

बुद्धिमान् राजा तत्तद् विद्याके विद्वानोंद्वारा उन अमात्योंके शास्त्रज्ञान तथा शिल्पकर्म—इन दो गुणोंकी परीक्षा करे$^२$। यह परोक्ष या आगम प्रमाणद्वारा परीक्षण है॥ १७$\frac{१}{२}$॥

कुलीनता, जन्मस्थान तथा अवग्रह (उसे नियन्त्रित रखनेवाले बन्धुजन)—इन तीन बातोंकी जानकारी उसके आत्मीयजनोंके द्वारा प्राप्त करे। (यहाँ भी आगम या परोक्ष प्रमाणका ही आश्रय लिया गया है।) परिकर्म (दुर्गादि-निर्माण)-में दक्षता (आलस्य न करना), विज्ञान (बुद्धिसे अपूर्व बातको जानकर बताना) और धारयिष्णुता (कौन कार्य हुआ और कौन-सा कर्म शेष रहा इत्यादि बातोंको सदा स्मरण रखना)—इन तीन गुणोंकी भी परीक्षा करे। प्रगल्भता (सभा आदिमें निर्भीकता), प्रतिभा (प्रत्युत्पन्नमतिता), वाग्मिता (प्रवचनकौशल) तथा सत्यवादिता—इन चार गुणोंको बातचीतके प्रसङ्गोंमें स्वयं अपने अनुभवसे जाने॥ १८-१९$\frac{१}{२}$॥

उत्साह (शौर्यादि), प्रभाव, क्लेश सहन करनेकी क्षमता, धैर्य, स्वामिविषयक अनुराग और स्थिरता—इन गुणोंकी परीक्षा आपत्तिकालमें करे। राजाके प्रति दृढ़भक्ति, मैत्री तथा आचार-विचारकी शुद्धि—इन गुणोंको व्यवहारसे जाने॥ २०-२१॥

आसपास एवं पड़ोसके लोगोंसे बल, सत्त्व (सम्पत्ति और विपत्तिमें भी निर्विकार रहनेका स्वभाव), आरोग्य, शील, अस्तब्धता (मान और दर्पका अभाव) तथा अचापल्य (चपलताका अभाव एवं गम्भीरता)—इन गुणोंको जाने। वैर न करनेका स्वभाव, भद्रता (भलमनसाहत) तथा क्षुद्रता (नीचता)-को प्रत्यक्ष देखकर जाने। जिनके गुण और बर्ताव प्रत्यक्ष नहीं हैं, उनके कार्योंसे सर्वत्र उनके गुणोंका अनुमान करना चाहिये॥ २२-२३॥

जहाँ खेतीकी उपज अधिक हो, विभिन्न वस्तुओंकी खानें हों, जहाँ विक्रयके योग्य तथा खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रामें उपलब्ध होते हों, जो गौओंके लिये हितकारिणी (घास आदिसे युक्त) हो, जहाँ पानीकी बहुतायत हो, जो पवित्र जनपदोंसे घिरी हुई हो, जो सुरम्य हो, जहाँके जंगलोंमें हाथी रहते हों, जहाँ जलमार्ग (पुल आदि) तथा स्थलमार्ग (सड़कें) हों, जहाँकी सिंचाई वर्षापर निर्भर न हो अर्थात् जहाँ सिंचाईके लिये प्रचुर मात्रामें जल उपलब्ध हो, ऐसी भूमि ऐश्वर्य-वृद्धिके लिये प्रशस्त मानी गयी है॥ २४-२५॥

('जो भूमि कँकरीली और पथरीली हो, जहाँ जंगल-ही-जंगल हों, जो सदा चोरों और लुटेरोंके भयसे आक्रान्त हो, जो रूक्ष (ऊसर) हो, जहाँके जंगलोंमें काँटेदार वृक्ष हों तथा जो हिंसक जन्तुओंसे भरी हो, वह भूमि नहींके बराबर है।')

(जहाँ सुखपूर्वक आजीविका चल सके, जो पूर्वोक्त उत्तम भूमिके गुणोंसे सम्पन्न हो) जहाँ जलकी अधिकता हो, जिसे किसी पर्वतका सहारा


१. यही अभिप्राय लेकर कौटिल्यने कहा है—
'पुरोहितम् उदितोदितकुलशीलं साङ्गेवेदे दैवे निमित्ते दण्डनीत्यां च अभिविनीतमापदां दैवमानुषीणाम् आथर्वाभिरुपायैः प्रतिकर्तारं कुर्वीत।' (कौटि० अर्थ० १।९।५०)
२. राजाओंके लिये तीन प्रमाण हैं—प्रत्यक्ष, परोक्ष और अनुमान। जैसा कि कौटिल्यका कथन है—
'प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया हि राजवृत्तिः।' इनमें स्वयं देखा हुआ 'प्रत्यक्ष', दूसरोंके द्वारा कथित 'परोक्ष' तथा किये गये कर्मसे अकृत कर्मका अवेक्षण 'अनुमान' है।

४५६ * अग्निपुराण *

प्राप्त हो, जहाँ शूद्रों, कारीगरों और वैश्योंकी बस्ती अधिक हो, जहाँके किसान विशेष उद्योगशील एवं बड़े-बड़े कार्योंका आयोजन करनेवाले हों, जो राजाके प्रति अनुरक्त, उनके शत्रुओंसे द्वेष रखनेवाला और पीड़ा तथा करका भार सहन करनेमें समर्थ हो, हृष्ट-पुष्ट एवं सुविस्तृत हो, जहाँ अनेक देशोंके लोग आकर रहते हों, जो धार्मिक, पशु-सम्पत्तिसे भरा-पूरा तथा धनी हो और जहाँके नायक (गाँवोंके मुखिया) मूर्ख और व्यसनग्रस्त हों, ऐसा जनपद राजाके लिये प्रशस्त कहा गया है। (मुखिया मूर्ख और व्यसनी हो तो वह राजाके विरुद्ध आन्दोलन नहीं कर सकता) ॥ २६-२७॥

जिसकी सीमा बहुत बड़ी एवं विस्तृत हो, जिसके चारों ओर विशाल खाइयाँ बनी हों, जिसके प्राकार (परकोटे) और गोपुर (फाटक) बहुत ऊँचे हों, जो पर्वत, नदी, मरुभूमि अथवा जंगलका आश्रय लेकर बना हो, ऐसे पुर (दुर्ग)-में राजाको निवास करना चाहिये। जहाँ जल, धान्य और धन प्रचुरमात्रामें विद्यमान हों, वह दुर्ग दीर्घकालतक शत्रुके आक्रमणका सामना करनेमें समर्थ होता है। जलमय, पर्वतमय, वृक्षमय, ऐरिण (उजाड़ या वीरान स्थानपर बना हुआ) तथा धान्वन (मरुभूमि या बालुकामय प्रदेशमें स्थित)—ये पाँच प्रकारके दुर्ग हैं। (दुर्गका विचार करनेवाले उत्तम बुद्धिमान् पुरुषोंने इन सभी दुर्गोंको प्रशस्त बतलाया है) ॥ २८-२९॥

[जिसमें आय अधिक हो और खर्च कम, अर्थात् जिसमें जमा अधिक होता हो और जिसमेंसे धनको कम निकाला जाता हो, जिसकी ख्याति खूब हो तथा जिसमें धनसम्बन्धी देवता (लक्ष्मी, कुबेर आदि)-का सदा पूजन किया जाता हो, जो मनोवाञ्छित द्रव्योंसे भरा-पूरा हो, मनोरम हो और] विश्वस्त जनोंकी देख-रेखमें हो, जिसका अर्जन धर्म एवं न्यायपूर्वक किया गया हो तथा जो महान् व्ययको भी सह लेनेमें समर्थ हो— ऐसा कोष श्रेष्ठ माना गया है। कोषका उपयोग धर्मादिकी वृद्धि तथा भृत्योंके भरण-पोषण आदिके लिये होना चाहिये ॥ ३० ॥

जो बाप-दादोंके समयसे ही सैनिक सेवा करते आ रहे हों, वशमें रहते (अनुशासन मानते) हों, संगठित हों, जिनका वेतन चुका दिया जाता हो—बाकी न रहता हो, जिनके पुरुषार्थकी प्रसिद्धि हो, जो राजाके अपने ही जनपदमें जन्मे हों, युद्धकुशल हों और कुशल सैनिकोंके साथ रहते हों, नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हों, जिन्हें नाना प्रकारके युद्धोंमें विशेष कुशलता प्राप्त हो तथा जिनके दलमें बहुत-से योद्धा भरे हों, जिन सैनिकोंद्वारा अपनी सेनाके घोड़े और हाथियोंकी आरती उतारी जाती हो, जो परदेश-निवास, युद्धसम्बन्धी आयास तथा नाना प्रकारके क्लेश सहन करनेके अभ्यासी हों तथा जिन्होंने युद्धमें बहुत श्रम किया हो, जिनके मनमें दुविधा न हो तथा जिनमें अधिकांश क्षत्रिय जातिके लोग हों, ऐसी सेना या सैनिक दण्डनीतिवेत्ताओंके मतमें श्रेष्ठ है ॥ ३१-३३॥

जो त्याग (अलोभ एवं दूसरोंके लिये सब कुछ उत्सर्ग करनेका स्वभाव), विज्ञान (सम्पूर्ण शास्त्रोंमें प्रवीणता) तथा सत्त्व (विकारशून्यता)—इन गुणोंसे सम्पन्न, महापक्ष (महान् आश्रय एवं बहुसंख्यक बन्धु आदिके वर्गसे सम्पन्न), प्रियंवद (मधुर एवं हितकर वचन बोलनेवाला), आयतिक्षम (सुस्थिर स्वभाव होनेके कारण भविष्यकालमें भी साथ देनेवाला), अद्वैध (दुविधामें न रहनेवाला) तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न हो—ऐसे पुरुषको अपना मित्र बनाये। मित्रके आनेपर दूरसे ही अगवानीमें जाना, स्पष्ट एवं प्रिय वचन बोलना तथा सत्कारपूर्वक मनोवाञ्छित वस्तु देना—ये मित्रसंग्रहके तीन प्रकार हैं। धर्म, काम और अर्थकी प्राप्ति—ये मित्रसे मिलनेवाले तीन प्रकारके फल हैं। चार प्रकारके मित्र जानने चाहिये—औरस (माता-पिताके सम्बन्धसे

* अध्याय २३९ * ४५७

युक्त), मित्रताके सम्बन्धसे बँधा हुआ, कुलक्रमागत तथा संकटसे बचाया हुआ। सत्यता (झूठ न बोलना), अनुराग और दुःख-सुखमें समानरूपसे भाग लेना — ये मित्रके गुण हैं॥ ३४-३७॥

अब मैं अनुजीवी (राजसेवक) जनोंके बर्तावका वर्णन करूँगा। सेवकोचित गुणोंसे सम्पन्न पुरुष राजाका सेवन करे। दक्षता (कौशल तथा शीघ्रकारिता), भद्रता (भलमनसाहत या लोकप्रियता), दृढ़ता (सुस्थिर स्नेह एवं कर्मोंमें दृढ़तापूर्वक लगे रहना), क्षमा (निन्दा आदिको सहन करना), क्लेशसहिष्णुता (भूख-प्यास आदिके क्लेशको सहन करनेकी क्षमता), संतोष, शील और उत्साह — ये गुण अनुजीवीको अलंकृत करते हैं॥ ३८$\frac{१}{२}$॥

सेवक यथासमय न्यायपूर्वक राजाकी सेवा करे; दूसरेके स्थानपर जाना, क्रूरता, उद्धण्डता या असभ्यता और ईर्ष्या — इन दोषोंको वह त्याग दे। जो पद या अधिकारमें अपनेसे बड़ा हो, उसका विरोध करके या उसकी बात काटकर राजसभामें न बोले। राजाके गुप्त कर्मों तथा मन्त्रणाको कहीं प्रकाशित न करे। सेवकको चाहिये कि वह अपने प्रति स्नेह रखनेवाले स्वामीसे ही जीविका प्राप्त करनेकी चेष्टा करे; जो राजा विरक्त हो — सेवकसे घृणा करता हो, उसे सेवक त्याग दे॥ ३९-४१॥

यदि राजा अनुचित कार्यमें प्रवृत्त हो तो उसे मना करना और यदि न्याययुक्त कर्ममें संलग्न हो तो उसमें उसका साथ देना — यह थोड़ेमें बन्धु, मित्र और सेवकोंका श्रेष्ठ आचार बताया गया है॥ ४२॥

राजा मेघकी भाँति समस्त प्राणियोंको आजीविका प्रदान करनेवाला हो। उसके यहाँ आयके जितने द्वार (साधन) हों, उन सबपर वह विश्वस्त एवं जाँचे-परखे हुए लोगोंको नियुक्त करे। (जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा पृथ्वीसे जल लेता है, उसी प्रकार राजा उन आयुक्त पुरुषोंद्वारा धन ग्रहण करे)॥ ४३॥

(जिन्हें उन-उन कर्मोंके करनेका अभ्यास तथा यथार्थ ज्ञान हो, जो उपधाद्वारा शुद्ध प्रमाणित हुए हों तथा जिनके ऊपर जाने-समझे हुए गणक आदि करणवर्गकी नियुक्ति कर दी गयी हो तथा) जो उद्योगसे सम्पन्न हों, ऐसे ही लोगोंको सम्पूर्ण कर्मोंमें अध्यक्ष बनाये। खेती, व्यापारियोंके उपयोगमें आनेवाले स्थल और जलके मार्ग, पर्वत आदि दुर्ग, सेतुबन्ध (नहर एवं बाँध आदि), कुञ्जरबन्धन (हाथी आदिके पकड़नेके स्थान), सोने-चाँदी आदिकी खानें, वनमें उत्पन्न सार-दारु आदि (साखू, शीशम आदि)—की निकासीके स्थान तथा शून्य स्थानोंको बसाना — आयके इन आठ द्वारोंको 'अष्टवर्ग' कहते हैं। अच्छे आचार-व्यवहारवाला राजा इस अष्टवर्गकी निरन्तर रक्षा करे॥ ४४-४५॥

आयुक्तक (रक्षाधिकारी राजकर्मचारी), चोर, शत्रु, राजाके प्रिय सम्बन्धी तथा राजाके लोभ — इन पाँचोंसे प्रजाजनोंको पाँच प्रकारका भय प्राप्त होता है। इस भयका निवारण करके राजा उचित समयपर प्रजासे कर ग्रहण करे। राज्यके दो भेद हैं — बाह्य और आभ्यन्तर। राजाका अपना शरीर ही 'आभ्यन्तर राज्य' है तथा राष्ट्र या जनपदको 'बाह्य राज्य' कहा गया है। राजा इन दोनोंकी रक्षा करे॥ ४६-४७॥

जो पापी राजाके प्रिय होनेपर भी राज्यको हानि पहुँचा रहे हों, वे दण्डनीय हैं। राजा उन सबको दण्ड दे तथा विष आदिसे अपनी रक्षा करे। स्त्रियोंपर, पुत्रोंपर तथा शत्रुओंपर कभी विश्वास न करे॥ ४८॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'राजधर्मकथन' नामक दो सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३९॥

४५८

  • अग्निपुराण *

दो सौ चालीसवाँ अध्याय

द्वादशराजमण्डल-चिन्तन *

श्रीराम कहते हैं— राजाको चाहिये कि वह मुख्य द्वादश राजमण्डलका चिन्तन करे। १. अरि, २. मित्र, ३. अरिमित्र, तत्पश्चात् ४. मित्रमित्र तथा ५. अरिमित्रमित्र—ये क्रमशः विजिगीषुके सामनेवाले राजा कहे गये हैं। विजिगीषुके पीछे क्रमशः चार राजा होते हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं— १. पार्ष्णिग्राह, उसके बाद २. आक्रन्द, तदनन्तर इन दोनोंके आसार अर्थात् ३. पार्ष्णिग्राहासार एवं ४. आक्रन्दासार। अरि और विजिगीषु—दोनोंके राज्यसे जिसकी सीमा मिलती है, वह राजा ‘मध्यम’ कहा गया है। अरि और विजिगीषु—ये दोनों यदि परस्पर मिले हों—संगठित हो गये हों तो मध्यम राजा कोष और सेना आदिकी सहायता देकर इन दोनोंपर अनुग्रह करनेमें समर्थ होता है और यदि ये परस्पर संगठित न हों तो वह मध्यम राजा पृथक्-पृथक् या बारी-बारीसे इन दोनोंका वध करनेमें समर्थ होता है। इन सबके मण्डलसे बाहर जो अधिक बलशाली या अधिक सैनिकशक्तिसे सम्पन्न राजा है, उसकी ‘उदासीन’ संज्ञा है। विजिगीषु, अरि और मध्यम—ये परस्पर संगठित हों तो उदासीन राजा इनपर अनुग्रहमात्र कर सकता है और यदि ये संगठित न होकर पृथक्-पृथक् हों तो वह ‘उदासीन’ इन सबका वध कर डालनेमें समर्थ हो जाता है॥ १—४$\frac{१}{२}$॥

लक्ष्मण! अब मैं तुम्हें संधि, विग्रह, यान और आसन आदिके विषयमें बता रहा हूँ। किसी बलवान् राजाके साथ युद्ध ठन जानेपर यदि


* यदि विजयकी इच्छा रखनेवाले राजाको नौ हजार योजनके क्षेत्रफलवाले चक्रवर्ति-क्षेत्रपर विजय प्राप्त करना हो, तो उसे अपने आगेके पाँच तथा पीछेके चार राजाओंकी ओर ध्यान देना होगा। इसी तरह अगल-बगलके उस राज्यपर भी विचार करना होगा, जिसकी सीमा अपने राज्यसे तथा शत्रुके राज्यसे भी मिलती होगी; ऐसे राज्यकी ‘मध्यम’ संज्ञा है। इस सम्पूर्ण मण्डलसे बाहर जो प्रबल राज्य या राजा है—उसकी संज्ञा ‘उदासीन’ है। विजिगीषुके सामनेके जो पाँच राज्य हैं, उनके नामोंका क्रमशः इस प्रकार व्यवहार होगा— (१) शत्रु-राज्य, (२) मित्र-राज्य, (३) शत्रुके मित्रका राज्य, (४) मित्रके मित्रका राज्य तथा (५) शत्रुके मित्रके मित्रका राज्य। विजिगीषुके पीछेके जो चार राज्य हैं, वे क्रमशः— १. पार्ष्णिग्राह, २. आक्रन्द, ३. पार्ष्णिग्राहासार, ४. आक्रन्दासार—इन नामोंसे व्यवहृत होंगे। विजिगीषूसहित इन सबकी संख्या बारह होती है। सम्भावनात्मक संख्या दी गयी है। यदि विजिगीषु इससे अधिकके क्षेत्रको अपनी विजयका लक्ष्य बनाता है तो इसी ढंगसे अन्य राज्य भी इसी मण्डलमें परिगणित होंगे और द्वादशकी जगह अधिक राजमण्डल भी हो सकते हैं। नीचे द्वादशात्मक राजमण्डलका एक परिचयात्मक क्रम दिया जाता है—

द्वादश राजमण्डल
अग्रदिशा

अरिमित्रमित्र ६<br>मित्रमित्र ५<br>अरिमित्र ४<br>मित्र ३<br>अरि २
उदासीन<br>१२मध्यम<br>११विजिगीषु १मध्यम<br>११उदासीन<br>१२
पार्ष्णिग्राह ७<br>आक्रन्द ८<br>पार्ष्णिग्राहासार ९<br>आक्रन्दासार १०
  • अध्याय २४० * ४५९

अपने पक्षकी अवस्था शोचनीय हो तो अपने कल्याणके लिये संधि कर लेनी चाहिये। १. कपाल, २. उपहार, ३. संतान, ४. संगत, ५. उपन्यास, ६. प्रतीकार, ७. संयोग, ८. पुरुषान्तर, ९. अदृष्टनर, १०. आदिष्ट, ११. आत्मामिष, १२. उपग्रह, १३. परिक्रय, १४. उच्छिन्न, १५. परदूषण तथा १६. स्कन्धोपनेय—ये संधिके सोलह भेद बतलाये गये हैं।* जिसके साथ संधि की जाती


* इन सोलह संधियोंका परिचय इस प्रकार है—

१. समान शक्ति तथा साधनवाले दो राजाओंमें जो बिना किसी शर्तके संधि की जाती है, उसे 'समसंधि' या 'कपालसंधि' कहते हैं। 'कपालसंधि' उसका नाम इसलिये हुआ कि वह दो कपालोंको जोड़नेके समान है। दो कपालोंके योगसे घड़ा बनता है। यदि एक कपाल फूट जाय और उसके स्थानपर दूसरा कपाल जोड़ा जाय तो वह बाहरसे जुड़ा हुआ दीखनेपर भी भीतरसे पूरा-पूरा नहीं जुड़ता। इसी तरह जो संधि समान शक्तिशाली पुरुषोंमें स्थापित होती है, वह कुछ कालके लिये कामचलाऊ ही होती है। हृदयका मेल न होनेके कारण वह टिक नहीं पाती।

२. संधेयकी इच्छाके अनुसार पहले ही द्रव्य आदिका उपहार देनेके बाद जो उसके साथ संधि की जाती है, वह उपहार-संधि कही गयी है।

३. कन्यादान देकर जो संधि की जाती है, वह संतानहेतुक होनेके कारण संतानसंधि कहलाती है।

४. चौथी संगतसंधि कही गयी है, जो सत्पुरुषोंके साथ मैत्रीपूर्वक स्थापित होती है। इसमें देने-लेनेकी कोई शर्त नहीं होती। उसमें दोनों पक्षोंके अर्थ (कोष) और प्रयोजन (कार्य) समान होते हैं। परस्पर अत्यन्त विश्वासके साथ दोनोंके हृदय एक हो जाते हैं। उस दशामें दोनों अपना खजाना एक-दूसरेके लिये खोल देते हैं और दोनों एक-दूसरेके प्रयोजनकी सिद्धिके लिये समानरूपसे प्रयत्नशील होते हैं। यह संधि जीवनपर्यन्त सुस्थिर रहती है। सब संधियोंमें इसीका स्थान ऊँचा है। जैसे टूटे हुए सुवर्णके टुकड़ोंको गलाकर जोड़ा जाय तो वे पूर्णरूपसे जुड़ जाते हैं, उसी तरह संगतसंधिमें दोनों पक्षोंकी संगति अटूट हो जाती है। इसीलिये इसे सुवर्णसंधि या काञ्चनसंधि भी कहते हैं। यह सम्पत्ति और विपत्तिमें भी, कैसे ही कारण क्यों न हों, उनके द्वारा अभेद्य रहती है।

५. भविष्यमें कल्याण करनेवाली एकार्थसिद्धिके उद्देश्यसे जो संधि की जाय, अर्थात् अमुक शत्रु हम दोनोंको हानि पहुँचानेवाला है, अतः हम दोनों मिलकर उसका उच्छेद करें, इससे हम दोनोंको समानरूपसे लाभ होगा—ऐसा उपन्यास (उल्लेख) करके जो संधि की जाय, उसे उपन्यास कहा गया है।

६. मैंने पहले इसका उपकार किया है, संकटकालमें इसे सहायता दी है, अब यह ऐसे ही अवसरपर मेरी भी सहायता करके उस उपकारका बदला चुकायेगा—इस उद्देश्यसे जो संधि की जाती है, अथवा मैं इसका उपकार करता हूँ, यह मेरा भी उपकार करेगा—इस अभिप्रायसे जो संधि स्थापित की जाती है, उसका नाम प्रतीकारसंधि है—जैसे श्रीराम और सुग्रीवकी संधि।

७. एकपर ही चढ़ाई करनेके लिये जब शत्रु और विजिगीषु दोनों जाते हैं, उस समय यात्राकालमें जो उन दोनोंमें संगठन या साँठ-गाँठ हो जाती है, ऐसी संधिको संयोग कहते हैं।

८. जहाँ दो राजाओंमें एक नतमस्तक हो जाता है और दूसरा यह शर्त रखता है कि मेरे और तुम्हारे दोनों सेनापति मिलकर मेरा अमुक कार्य सिद्ध करें, तो उस शर्तपर होनेवाली संधि पुरुषान्तर कही जाती है।

९. अकेले तुम मेरा अमुक कार्य सिद्ध करो, उसमें मैं अथवा मेरी सेनाका कोई योद्धा साथ नहीं रहेगा—जहाँ शत्रु ऐसी शर्त सामने रखे, वहाँ उस शर्तपर की जानेवाली संधि 'अदृष्ट-पुरुष' कही जाती है। उसमें एक पक्षका कोई भी पुरुष देखनेमें नहीं आता, अतएव उसका नाम अदृष्टपुरुष है।

१०. जहाँ अपनी भूमिका एक भाग देकर शेषकी रक्षाके लिये बलवान् शत्रुके साथ संधि की जाती है, उसे आदिष्ट कहा गया है।

११. जहाँ अपनी सेना देकर संधि की जाती है, वहाँ अपने-आपको ही आमिष (भोग्य) बना देनेके कारण उस संधिका नाम आत्मामिष है।

१२. जहाँ प्राणरक्षाके लिये सर्वस्व अर्पण कर दिया जाता है, वह संधि उपग्रह कही गयी है।

१३. जहाँ कोषका एक भाग, कुप्य (वस्त्र, कम्बल आदि) अथवा सारा ही खजाना देकर शेष प्रकृति (अमात्य, राष्ट्र आदि)-की रक्षा की जाती है, वहाँ मानो उस धनसे उन शेष प्रकृतियोंका क्रय किया जाता है; अतएव उस संधिको परिक्रय कहते हैं।

१४. जहाँ सारभूत भूमि (कोष आदिकी अधिक वृद्धि करानेवाले भूभाग)-को देकर संधि की जाती है, वह अपना उच्छेद करनेके समान होनेसे उच्छिन्न कहलाती है।

१५. अपनी सम्पूर्ण भूमिसे जो भी फल या लाभ प्राप्त होता है, उसको कुछ अधिक मिलाकर देनेके बाद जो संधि होती है, वह परदूषण कही गयी है।

१६. जहाँ परिगणित फल (लाभ) खण्ड-खण्ड करके अर्थात् कई किश्तोंमें बाँटकर पहुँचाये जाते हैं, वैसी संधि स्कन्धोपनेय कही गयी है।

४६० * अग्निपुराण *


है, वह 'संधेय' कहलाता है। उसके दो भेद हैं—अभियोक्ता और अनभियोक्ता। उक्त संधियोंमेंसे उपन्यास, प्रतीकार और संयोग—ये तीन संधियाँ अनभियोक्ता (अनाक्रमणकारी)-के प्रति करनी चाहिये। शेष सभी अभियोक्ता (आक्रमणकारी)-के प्रति कर्तव्य हैं॥५-८॥

परस्परोपकार, मैत्र, सम्बन्धज तथा उपहार—ये ही चार संधिके भेद जानने चाहिये—ऐसा अन्य लोगोंका मत है¹॥९॥

बालक, वृद्ध, चिरकालका रोगी, भाई-बन्धुओंसे बहिष्कृत, डरपोक, भीरु सैनिकोंवाला, लोभी-लालची सेवकोंसे घिरा हुआ, अमात्य आदि प्रकृतियोंके अनुरागसे वञ्चित, अत्यन्त विषयासक्त, अस्थिरचित्त और अनेक लोगोंके सामने मन्त्र प्रकट करनेवाला, देवताओं और ब्राह्मणोंका निन्दक, दैवका मारा हुआ, दैवको ही सम्पत्ति और विपत्तिका कारण मानकर स्वयं उद्योग न करनेवाला, जिसके ऊपर दुर्भिक्षका संकट आया हो वह, जिसकी सेना कैद कर ली गयी हो अथवा शत्रुओंसे घिर गयी हो वह, अयोग्य देशमें स्थित (अपनी सेनाकी पहुँचसे बाहरके स्थानमें विद्यमान), बहुत-से शत्रुओंसे युक्त, जिसने अपनी सेनाको युद्धके योग्य कालमें नहीं नियुक्त किया है वह, तथा सत्य और धर्मसे भ्रष्ट—ये बीस पुरुष ऐसे हैं जिनके साथ संधि न करे, केवल विग्रह करे॥१०-१३½॥

एक-दूसरेके अपकारसे मनुष्योंमें विग्रह (कलह या युद्ध) होता है। राजा अपने अभ्युदयकी इच्छासे अथवा शत्रुसे पीड़ित होनेपर यदि देश-कालकी अनुकूलता और सैनिक-शक्तिसे सम्पन्न हो तो विग्रह प्रारम्भ करे॥ १४-१५॥

सप्ताङ्ग राज्य, स्त्री (सीता आदि-जैसी असाधारण देवी), जनपदके स्थानविशेष, राष्ट्रके एक भाग, ज्ञानदाता उपाध्याय आदि और सेना—इनमेंसे किसीका भी अपहरण विग्रहका कारण है (इस प्रकार छः हेतु बताये गये)। इनके सिवा मद (राजा दम्भोद्भव आदिकी भाँति शौर्यादिजनित दर्प), मान (रावण आदिकी भाँति अहंकार), जनपदकी पीड़ा (जनपद-निवासियोंका सताया जाना), ज्ञानविघात (शिक्षा-संस्थाओं अथवा ज्ञानदाता गुरुओंका विनाश), अर्थविघात (भूमि, हिरण्य आदिको क्षति पहुँचाना), शक्तिविघात (प्रभुशक्ति, मन्त्रशक्ति और उत्साहशक्तियोंका अपक्षय), धर्मविघात, दैव (प्रारब्धजनित दुरवस्था), सुग्रीव आदि-जैसे मित्रोंके प्रयोजनकी सिद्धि, माननीय जनोंका अपमान, बन्धुवर्गका विनाश, भूतानुग्रहविच्छेद (प्राणियोंको दिये गये अभयदानका खण्डन—जैसे एकने किसी वनमें वहाँके जन्तुओंको अभय देनेके लिये मृगयाकी मनाही कर दी, किंतु दूसरा उस नियमको तोड़कर शिकार खेलने आ गया—यही 'भूतानुग्रहविच्छेद' है), मण्डलदूषण (द्वादशराजमण्डलमेंसे किसीको विजिगीषुके विरुद्ध उभाड़ना), एकार्थाभिनिवेशित्व (जो भूमि या स्त्री आदि अर्थ एकको अभीष्ट है, उसीको लेनेके लिये दूसरेका भी दुराग्रह)—ये बीस विग्रहके कारण हैं॥ १६-१८॥

सापत्न (रावण और विभीषणकी भाँति सौतेले भाइयोंका वैमनस्य), वास्तुज (भूमि, सुवर्ण आदिके हरणसे होनेवाला अमर्ष), स्त्रीके अपहरणसे होनेवाला रोष, कटुवचनजनित क्रोध तथा अपराधजनित प्रतिशोधकी भावना—ये पाँच प्रकारके वैर अन्य विद्वानोंने बताये हैं²॥१९॥

(१) जिस विग्रहसे बहुत कम लाभ होनेवाला


¹ १. 'परस्परोपकार' ही प्रतीकार है; 'मैत्र'का ही नाम 'संगत' संधि है। सम्बन्धजको ही 'संतान' कहा गया है और 'उपहार' तो पूर्वकथित 'उपहार' है ही। इन्हींमें अन्य सबका समावेश है।
² २. सापत्न-वैरमें पूर्वोक्त एकार्थाभिनिवेशका अन्तर्भाव हो जाता है, स्त्री और वास्तुके अपहरणजनित वैरमें पूर्वकथित स्त्रीस्थानापहारज वैरका अन्तर्भाव है। वाग्जात वैरमें पूर्वोक्त ज्ञानापहारज और अपमानजनित वैर अन्तर्भूत होते हैं और अपराधजनित वैरमें पूर्वोक्तशेष १४ कारणोंका समावेश हो जाता है।

  • अध्याय २४० * ४६१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

हो, (२) जो निष्फल हो, (३) जिससे फलप्राप्तिमें संदेह हो, (४) जो तत्काल दोषजनक (विग्रहके समय मित्रादिके साथ विरोध पैदा करनेवाला), (५) भविष्यकालमें भी निष्फल, (६) वर्तमान और भविष्यमें भी दोषजनक हो, (७) जो अज्ञात बल-पराक्रमवाले शत्रुके साथ किया जाय एवं (८) दूसरोंके द्वारा उभाड़ा गया हो, (९) जो दूसरोंकी स्वार्थसिद्धिके लिये किंवा, (१०) किसी साधारण स्त्रीको पानेके लिये किया जा रहा हो, (११) जिसके दीर्घकालतक चलते रहनेकी सम्भावना हो, (१२) जो श्रेष्ठ द्विजोंके साथ छेड़ा गया हो, (१३) जो वरदान आदि पाकर अकस्मात् दैवबलसे सम्पन्न हुए पुरुषके साथ छिड़नेवाला हो, (१४) जिसके अधिक बलशाली मित्र हों, ऐसे पुरुषके साथ जो छिड़नेवाला हो, (१५) जो वर्तमान कालमें फलद, किंतु भविष्यमें निष्फल हो तथा (१६) जो भविष्यमें फलद किंतु वर्तमानमें निष्फल हो—इन सोलह प्रकारके विग्रहोंमें कभी हाथ न डाले। जो वर्तमान और भविष्यमें परिशुद्ध—पूर्णतः लाभदायक हो, वही विग्रह राजाको छेड़ना चाहिये॥ २०—२४॥

राजा जब अच्छी तरह समझ ले कि मेरी सेना हृष्ट-पुष्ट अर्थात् उत्साह और शक्तिसे सम्पन्न है तथा शत्रुको अवस्था इसके विपरीत है, तब वह उसका निग्रह करनेके लिये विग्रह आरम्भ करे। जब मित्र, आक्रन्द तथा आक्रन्दासार—इन तीनोंकी राजाके प्रति दृढ़भक्ति हो तथा शत्रुके मित्र आदि विपरीत स्थितिमें हों अर्थात् उसके प्रति भक्तिभाव न रखते हों, तब उसके साथ विग्रह आरम्भ करे॥ २५$\frac{१}{२}$॥

(जिसके बल एवं पराक्रम उच्च कोटिके हों, जो विजिगीषुके गुणोंसे सम्पन्न हो और विजयकी अभिलाषा रखता हो तथा जिसकी अमात्यादि प्रकृति उसके सद्गुणोंसे उसमें अनुरक्त हो, ऐसे राजाका युद्धके लिये यात्रा करना ‘यान’ कहलाता है।) विगृह्यागमन, संधायगमन, सम्भूयगमन, प्रसङ्गतः गमन तथा उपेक्षापूर्वक गमन—ये नीतिज्ञ पुरुषोंद्वारा यानके पाँच भेद कहे गये हैं*॥ २६$\frac{१}{२}$॥


* बलवान् राजा जब समस्त शत्रुओंके साथ विग्रह आरम्भ करके युद्धके लिये यात्रा करता है, तब उसकी उस यात्राको नीतिशास्त्रके विद्वान् 'विगृह्यागमन' कहते हैं; अथवा शत्रुके समस्त मित्रोंको अर्थात् उसके आगे और पीछेके शुभचिन्तकोंको अपने सामने और पीछेवाले मित्रोंद्वारा छेड़े गये विग्रहमें फँसाकर शत्रुपर जो चढ़ाई की जाती है, उसे 'विगृह्यागमन' या 'विगृह्यायान' कहते हैं। जब अपनी चेष्टामें अवरोध उत्पन्न करनेवाले सभी प्रकारके शत्रुओंके साथ संधि करके जो एकमात्र किसी अन्य शत्रुपर आक्रमण किया जाता है, वह 'संधायगमन' कहा जाता है। अथवा अपने पाष्णिग्राह संज्ञावाले पृष्ठवर्ती शत्रुके साथ संधि करके जो अन्यत्र—अपने सामनेवाले शत्रुपर आक्रमणके लिये यात्रा की जाती है, विजिगीषुकी उस यात्राको भी 'संधायगमन' कहते हैं। सामूहिक लाभमें समानरूपसे भागी होनेवाले सामन्तोंके साथ, जो शक्ति और शुद्धभावसे युक्त हों, एकीभूत होकर—मिलकर जो किसी एक ही शत्रुपर चढ़ाई की जाती है, उसका नाम 'सम्भूयगमन' है। अथवा जो विजिगीषु और उसके शत्रु दोनोंकी प्रकृतियोंका विनाश करनेके कारण दोनोंका शत्रु हो, उसके प्रति विजिगीषु तथा शत्रु दोनोंका मिलकर युद्धके लिये यात्रा करना 'सम्भूयगमन' है। इसके उदाहरण हैं—सूर्य और हनुमान्। हनुमान् बाल्यावस्थामें लोहित सूर्यमण्डलको उदित हुआ देख, 'यह क्या है'—इस बातको जाननेके लिये बालोचित चपलतावश उछलकर उसे पकड़नेके लिये आगे बढ़े। निकट पहुँचनेपर उन्होंने देखा कि भानुको ग्रहण करनेके लिये स्वर्भानु (राहु) आया है। फिर तो उसे ही अपना प्रतिद्वन्द्वी जान हनुमान्जी उसपर टूट पड़े। उस समय सूर्यने भी अपने प्रमुख शत्रु राहुको दबानेके लिये अपने भोले-भाले शत्रु हनुमान्जीका ही साथ दिया। एकपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थित हुआ राजा यदि प्रसङ्गवश उसके विरोधी दूसरे पक्षको अपने आक्रमणका लक्ष्य बना लेता है तो उसकी उस यात्राको 'प्रसङ्गतःगमन' या 'प्रसङ्गयान' कहते हैं। इसके दृष्टान्त हैं राजा शल्य। वे दुर्योधनपर पाण्डवपक्षसे आक्रमणके लिये चले थे, किंतु मार्गमें दुर्योधनके अति सत्कारसे प्रसन्न हो उसे वर माँगनेके लिये कहकर उसकी प्रार्थनासे उसीके सेनापति हो गये और अपने भानजे युधिष्ठिरको ही अपने आक्रमणका लक्ष्य बनाया। शत्रुके प्रति आक्रमण करनेवाले विजिगीषुको रोकनेके लिये यदि उस शत्रुके बलवान् मित्र आ पहुँचें तो उस शत्रुको उपेक्षा करके उसके उन मित्रोंपर ही चढ़ाई करना 'उपेक्षायान' कहलाता है—जैसे इन्द्रकी आज्ञासे निवातकवचोंका वध करनेके लिये प्रस्थित हुए अर्जुनको रोकनेके निमित्त जब हिरण्यपुरवासी 'कालकंज' नामक असुर आ पहुँचे, तब अर्जुन उन निवातकवचोंकी उपेक्षा करके कालकंजोंपर ही टूट पड़े और उनको परास्त करनेके बाद ही उन्होंने निवातकवचोंका वध किया।

४६२ * अग्निपुराण *


जब विजिगीषु और शत्रु—दोनों एक-दूसरेकी शक्तिका विघात न कर सकनेके कारण आक्रमण न करके बैठ रहें तो इसे ‘आसन’ कहा जाता है; इसके भी ‘यान’की ही भाँति पाँच भेद होते हैं—१. विगृह्य आसन, २. संधाय आसन, ३. सम्भूय आसन, ४. प्रसङ्गासन तथा ५. उपेक्षासन* ॥ २७$\frac{१}{२}$ ॥

दो बलवान् शत्रुओंके बीचमें पड़कर वाणीद्वारा दोनोंको ही आत्मसमर्पण करे—‘मैं और मेरा! राज्य दोनोंके ही हैं’, यह संदेश दोनोंके ही पास गुप्तरूपसे भेजे और स्वयं दुर्गमें छिपा रहे। यह ‘द्वैधीभाव’की नीति है। जब उक्त दोनों शत्रु पहलेसे ही संगठित होकर आक्रमण करते हों, तब जो उनमें अधिक बलशाली हो, उसकी शरण ले। यदि वे दोनों शत्रु परस्पर मन्त्रणा करके उसके साथ किसी भी शर्तपर संधि न करना चाहते हों, तब विजिगीषु उन दोनोंके ही किसी शत्रु का आश्रय ले अथवा किसी भी अधिक शक्तिशाली राजाकी शरण लेकर आत्मरक्षा करे ॥ २८–३० ॥

यदि विजिगीषुपर किसी बलवान् शत्रु का आक्रमण हो और वह उच्छिन्न होने लगे तथा किसी उपायसे उस संकटका निवारण करना उसके लिये असम्भव हो जाय, तब वह किसी कुलीन, सत्यवादी, सदाचारी तथा शत्रु की अपेक्षा अधिक बलशाली राजाकी शरण ले। उस आश्रयदाताके दर्शनके लिये उसकी आराधना करना, सदा उसके अभिप्रायके अनुकूल चलना, उसीके लिये कार्य करना और सदा उसके प्रति आदरका भाव रखना—यह आश्रय लेनेवालेका व्यवहार बतलाया गया है ॥ ३१-३२ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘षाड्गुण्यकथन’ नामक दो सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४० ॥


* जब शत्रु और विजिगीषु परस्पर आक्रमण करके कारणवशात् युद्ध बंद करके बैठ जायँ तो इसे ‘विगृह्यासन’ कहते हैं। यह एक प्रकार है। विजिगीषु शत्रु के किसी प्रदेशको क्षति पहुँचाकर जब स्वतः युद्धसे विरत होकर बैठ जाता है, तब यह भी ‘विगृह्यासन’ कहलाता है।

यदि शत्रु दुर्गके भीतर स्थित होनेके कारण पकड़ा न जा सके, तो उसके आसार (मित्रवर्ग) तथा बीज (अनाजकी फसल आदि)-को नष्ट करके उसके साथ विग्रह छोड़कर बैठ रहे। दीर्घकालतक ऐसा करनेसे प्रजा आदि प्रकृतियाँ उस शत्रु राजासे विरक्त हो जाती हैं। अतः समयानुसार वह वशीभूत हो जाता है। शत्रु और विजिगीषु समान बलशाली होनेके कारण युद्ध छिड़नेपर जब समानरूपसे क्षीण होने लगें, तब परस्पर संधि करके बैठ जायँ। यह ‘संधाय आसन’ कहलाता है। पूर्वकालमें निवातकवचोंके साथ जब दिग्विजयी रावणका युद्ध होने लगा, तब दोनों पक्ष ब्रह्माजीके वरदानसे शक्तिशाली होनेके कारण एक-दूसरेको परास्त न कर सके। उस दशामें ब्रह्माजीको ही बीचमें डालकर रावण संधि करके बैठ रहा। यह ‘संधाय आसन’ का उदाहरण है।

विजिगीषु और उसके शत्रु को उदासीन और मध्यमसे आक्रमणकी समानरूपसे शङ्का हो, तब उन दोनोंको मिल जाना चाहिये। इस प्रकार मिलकर बैठना ‘सम्भूय आसन’ कहलाता है। जब मध्यम और उदासीनमेंसे कोई-सा भी विजिगीषु और उसके शत्रु—दोनोंका विनाश करना चाहता हो, तब वह उन दोनोंका शत्रु समझा जाता है; उस दशामें विजिगीषु अपने शत्रु के साथ मिलकर दोनोंके ही अधिक बलवान् शत्रुभूत उस मध्यम या उदासीनका सामना करें। यही ‘सम्भूय आसन’ है।

यदि विजिगीषु किसी अन्य शत्रु पर आक्रमणकी इच्छा रखता हो; किंतु कार्यान्तर (अर्थलाभ या अनर्थ-प्रतिकार)-के प्रसङ्गसे अन्यत्र बैठे रहे तो इसे ‘प्रसङ्गासन’ कहते हैं।

अधिक शक्तिशाली शत्रु की उपेक्षा करके अपने स्थानपर बैठे रहना ‘उपेक्षासन’ कहलाता है। भगवान् श्रीकृष्णने जब पारिजातहरण किया था, उस समय उन्हें अधिक शक्तिशाली जानकर इन्द्रदेव उपेक्षा करके बैठ रहे, यह उपेक्षासनका उदाहरण है। इसका एक दूसरा उदाहरण रुक्मी है। महाभारत-युद्धमें वह क्रथ और कैशिकोंकी सेना लेकर बारी-बारीसे कौरवों और पाण्डवोंके पास गया और बोला, ‘यदि तुम डरे हुए हो तो हम तुम्हारी सहायता करके तुम्हें विजय दिलायें।’ उसकी इस बातपर दोनोंने उसकी उपेक्षा कर दी। अतः वह किसी ओरसे युद्ध न करके अपने घरपर ही बैठा रहा।

* अध्याय २४१ * ४६३

दो सौ इकतालीसवाँ अध्याय

मन्त्रविकल्प

श्रीराम कहते हैं— 'लक्ष्मण! प्रभावशक्ति और उत्साह-शक्तिसे मन्त्रशक्ति श्रेष्ठ बतायी गयी है। प्रभाव और उत्साहसे सम्पन्न शुक्राचार्यको देवपुरोहित बृहस्पतिने मन्त्र-बलसे जीत लिया॥ १॥

जो विश्वसनीय होनेके साथ-ही-साथ नीतिशास्त्रका विद्वान् हो, उसीके साथ राजा अपने कर्तव्यके विषयमें मन्त्रणा करे। (जो विश्वसनीय होनेपर भी मूर्ख हो तथा विद्वान् होनेपर भी अविश्वसनीय हो, ऐसे मन्त्रीको त्याग दे। कौन कार्य किया जा सकता है और कौन अशक्य है, इसका स्वच्छ बुद्धिसे विवेचन करे।) जो अशक्य कार्यका आरम्भ करते हैं, उन्हें क्लेश उठानेके सिवा कोई फल कैसे प्राप्त हो सकता है?॥ २-३॥

अविज्ञात (परोक्ष)-का ज्ञान, विज्ञातका निश्चय, कर्तव्यके विषयमें दुविधा उत्पन्न होनेपर संशयका उच्छेद (समाधान) तथा शेष (अन्तिम निश्चित कर्तव्य)-की उपलब्धि—ये सब मन्त्रियोंके ही अधीन हैं। सहायक, कार्यसाधनके उपाय, देश और कालका विभाग, विपत्तिका निवारण तथा कर्तव्यकी सिद्धि—ये मन्त्रियोंकी मन्त्रणाके पाँच अङ्ग हैं॥ ४॥

मनकी प्रसन्नता, श्रद्धा (कार्यसिद्धिके विषयमें दृढ़ विश्वास), ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियोंकी स्वविषयक व्यापारमें क्षमता, सहाय-सम्पत्ति (सहायकोंका बाहुल्य अथवा सत्त्वादि गुणोंका योग) तथा उत्थान-सम्पत्ति (शीघ्रतापूर्वक उत्थान करनेका स्वभाव)—ये मन्त्रद्वारा निश्चित करके आरम्भ किये जानेवाले कर्मोंकी सिद्धिके लक्षण हैं॥ ५॥

मद (मदिरा आदिका नशा), प्रमाद (कार्यान्तरके प्रसङ्गसे असावधानी), काम (कामभावनासे प्रेरित होकर स्त्रियोंपर विश्वास), स्वप्नावस्थामें किये गये प्रलाप, खंभे आदिकी ओटमें लुके-छिपे लोग, पार्श्ववर्तिनी कामिनियाँ तथा उपेक्षित प्राणी (तोता, मैना, बालक, बहरे आदि)—ये मन्त्रका भेदन करनेमें कारण बनते हैं॥ ६॥

सभामें निर्भीक बोलनेवाला, स्मरणशक्तिसे सम्पन्न, प्रवचन-कुशल, शस्त्र और शास्त्रमें परिनिष्ठित तथा दूतोचित कर्मके अभ्याससे सम्पन्न पुरुष राजदूत होनेके योग्य होता है। निसृष्टार्थ (जिसपर संधि-विग्रह आदि कार्यको इच्छानुसार करनेका पूरा भार सौंपा गया हो, वह), मितार्थ (जिसे परिमित कार्य-भार दिया गया हो, यथा—इतना ही करना या इतना ही बोलना चाहिये), तथा शासनहारक (लिखित आदेशको पहुँचानेवाला)—ये दूतके तीन भेद कहे गये हैं॥ ७-८॥

दूत अपने आगमनकी सूचना दिये बिना शत्रुके दुर्ग तथा संसद्में प्रवेश न करे (अन्यथा वह संदेहका पात्र बन जाता है)। वह कार्यसिद्धिके लिये समयकी प्रतीक्षा करे तथा शत्रु राजाकी आज्ञा लेकर वहाँसे विदा हो। उसे शत्रुके छिद्र (दुर्बलता)-की जानकारी प्राप्त करनी चाहिये। उसके कोष, मित्र और सेनाके विषयमें भी वह जाने तथा शत्रुके दृष्टि एवं शरीरकी चेष्टाओंसे अपने प्रति राग और विरक्तिका भी अनुमान कर लेना चाहिये॥ ९-१०॥

वह उभय पक्षोंके कुलकी (यथा—'आप उदितोदित कुलके रत्न हैं' आदि), नामकी (यथा—'आपका नाम दिग्दिगन्तमें विख्यात है' इत्यादि), द्रव्यकी (यथा—'आपका द्रव्य परोपकारमें लगता है' इत्यादि) तथा श्रेष्ठ कर्मकी (यथा—'आपके सत्कर्मकी श्रेष्ठ लोग भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं' आदि कहकर) बड़ाई करे। इस तरह चतुर्विध स्तुति करनी चाहिये। तपस्वीके वेषमें रहनेवाले

४६४ * अग्निपुराण *


अपने चरोंके साथ संवाद करे। अर्थात् उनसे बात करके यथार्थ स्थितिको जाननेकी चेष्टा करे॥ ११॥

चर दो प्रकारके होते हैं—प्रकाश (प्रकट) और अप्रकाश (गुप्त)। इनमें जो प्रकाश है, उसकी 'दूत' संज्ञा है और अप्रकाश 'चर' कहा गया है। वणिक् (वैदेहक), किसान (गृहपति), लिङ्गी (मुण्डित या जटाधारी तपस्वी), भिक्षुक (उदास्थित), अध्यापक (छात्रवृत्तिसे रहनेवाला—कार्पटिक)—इन चारोंकी स्थितिके लिये संस्थाएँ हैं। इनके लिये वृत्ति (जीविका)-की व्यवस्था की जानी चाहिये, जिससे ये सुखसे रह सकें १॥ १२॥

जब दूतकी चेष्टा विफल हो जाय तथा शत्रु व्यसनग्रस्त हो, तब उसपर चढ़ाई करे॥ १२ १/२॥

जिससे अपनी प्रकृतियाँ व्यसनग्रस्त हो गयी हों, उस कारणको शान्त करके विजिगीषु शत्रुपर चढ़ाई करे। व्यसन दो प्रकारके होते हैं—मानुष और दैव। अनय और अपनय दोनोंके संयोगसे प्रकृति-व्यसन प्राप्त होता है। अथवा केवल दैवसे भी उसकी प्राप्ति होती है। वह श्रेय (अभीष्ट अर्थ)-को व्यस्त (क्षिप्त या नष्ट) कर देता है, इसलिये 'व्यसन' कहलाता है। अग्नि (आग लगना), जल (अतिवृष्टि या बाढ़), रोग, दुर्भिक्ष (अकाल पड़ना) और मरक (महामारी)—ये पाँच प्रकारके 'दैव-व्यसन' हैं। शेष 'मानुष-व्यसन' हैं। पुरुषार्थ अथवा अथर्ववेदोक्त शान्तिकर्मसे दैव-व्यसनका निवारण करे। उत्थान-शीलता (दुर्गादि-निर्माणविषयक चेष्टा) अथवा नीति—संधि या साम आदिके प्रयोगके द्वारा मानुष-व्यसनकी शान्ति करे॥ १३—१५ १/२॥

मन्त्र (कार्यका निश्चय), मन्त्रफलकी प्राप्ति, कार्यका अनुष्ठान, भावी उन्नतिका सम्पादन, आय-व्यय, दण्डनीति, शत्रुंका निवारण तथा व्यसनको टालनेका उपाय, राजा एवं राज्यकी रक्षा—ये सब अमात्यके कर्म हैं। यदि अमात्य व्यसनग्रस्त हो तो वह इन सब कर्मोंको नष्ट कर देता है २ ॥ १६—१७ १/२॥

सुवर्ण, धान्य, वस्त्र, वाहन तथा अन्यान्य द्रव्योंका संग्रह जनपदवासिनी प्रजाके कर्म हैं। यदि प्रजा व्यसनग्रस्त हो तो वह उपर्युक्त सब कार्योंका नाश कर डालती है॥ १८ १/२॥

आपत्कालमें प्रजाजनोंकी रक्षा, कोष और सेनाकी रक्षा, गुप्त या आकस्मिक युद्ध, आपत्तिग्रस्त जनोंकी रक्षा, संकटमें पड़े हुए मित्रों और अमित्रोंका संग्रह तथा सामन्तों और वनवासियोंसे प्राप्त होनेवाली बाधाओंका निवारण भी दुर्गका आश्रय लेनेसे होता है। नगरके नागरिक भी शरण लेनेके लिये दुर्गपतियोंका कोष आदिके द्वारा उपकार करते हैं। (यदि दुर्ग विपत्तिग्रस्त हो जाय तो ये सब कार्य विपन्न हो जाते हैं।)॥ १९—२० १/२॥

भृत्यों (सैनिक आदि)-का भरण-पोषण, दानकर्म, भूषण, हाथी-घोड़े आदिका खरीदना, स्थिरता, शत्रुपक्षकी लुब्ध प्रकृतियोंमें धन देकर फूट डालना, दुर्गका संस्कार (मरम्मत और सजावट), सेतुबन्ध (खेतीके लिये जलसंचय करनेके निमित्त बाँध आदिका निर्माण), वाणिज्य, प्रजा और मित्रोंका संग्रह, धर्म, अर्थ एवं कामकी सिद्धि—ये सब कार्य कोषसे सम्पादित होते हैं। कोषसम्बन्धी व्यसनसे राजा इन सबका नाश कर देता है; क्योंकि राजाका मूल है—कोष॥ २१—२२॥

मित्र, अमित्र (अपकारकी इच्छावाले शत्रु),


१. यहाँ कोष्ठमें दिये गये 'वैदेहक' आदि शब्द 'वणिक्' आदि संस्थाओंके चरोंके नामान्तर हैं।
२. इन कर्मोंमें मन्त्र या कार्यका निश्चय मन्त्रीके अधीन है, शत्रुओंको दूरसे ही भगाकर मन्त्रसाध्य फलकी प्राप्ति दूतके अधीन है, कार्यका अनुष्ठान (दुर्गादिकर्मकी प्रवृत्ति) अध्यक्षके अधीन है, आयति अथवा भावी उन्नतिका सम्पादन अमात्योंके अधीन है, आय और व्यय अक्षपटलिक (अर्थमन्त्री)-के अधीन हैं, दण्डनीति धर्मस्थ (न्यायाधिकारी)-के हाथमें है तथा शत्रुओंका निवारण मित्र-साध्य कर्म है—ऐसा विभाग जयमङ्गलाकारने किया है।

  • अध्याय २४१ *                                   ४६५

सुवर्ण और भूमिको अपने वशमें करना, शत्रुओंको कुचल डालना, दूरके कार्यको शीघ्र पूरा करा लेना इत्यादि कार्य दण्ड (सेना)-द्वारा साध्य हैं। उसपर संकट आनेसे ये सब कार्य बिगड़ जाते हैं॥ २३॥

‘मित्र’ विजिगीषुके विचलित होनेवाले मित्रोंको रोकता है—उनमें सुस्थिर स्नेह पैदा करता है, उसके शत्रुओंका नाश करता है तथा धन आदिसे विजिगीषुका उपकार करता है। ये सब मित्रसे सिद्ध होनेवाले कार्य हैं। मित्रके व्यसनग्रस्त होनेपर ये कार्य नष्ट होते हैं॥ २४॥

यदि राजा व्यसनी हो तो समस्त राजकार्योंको नष्ट कर देता है। कठोर वचन बोलकर दूसरोंको दुःख पहुँचाना, अत्यन्त कठोर दण्ड देना, अर्थदूषण (वाणीद्वारा पहलेकी दी हुई वस्तुको न देना, दी हुईको छीन लेना, चोरी आदिके द्वारा धनका नाश होना तथा प्राप्त हुए धनको त्याग देना),* मदिरापान, स्त्रीविषयक आसक्ति, शिकार खेलनेमें अधिक तत्पर रहना और जूआ खेलना—ये राजाके व्यसन हैं॥ २५$\frac{१}{२}$॥

आलस्य (उद्योगशून्यता), स्तब्धता (बड़ोंके सामने उद्धण्डता या मान-प्रदर्शन), दर्प (शौर्यादिका अहंकार), प्रमाद (असावधानी), बिना कारण वैर बाँधना—ये तथा पूर्वोक्त कठोर वचन बोलना आदि राजव्यसन सचिवके लिये दुर्व्यसन बताये गये हैं॥ २६ $\frac{१}{२}$॥

अनावृष्टि (और अतिवृष्टि) तथा रोगजनित पीड़ा आदि राष्ट्रके लिये व्यसन कहे गये हैं। यन्त्र (शतघ्नी आदि), प्राकार (चहारदीवारी) तथा परिखा (खाई)-का नष्ट-भ्रष्ट हो जाना, अस्त्र-शस्त्रोंका अभाव हो जाना तथा घास, ईंधन एवं अन्नका क्षीण हो जाना दुर्गके लिये व्यसन बताया गया है॥ २७-२८॥

असद्व्यय किंवा अपव्ययके द्वारा जिसे खर्च कर दिया गया हो, जिसे मण्डलके अनेक स्थानोंमें थोड़ा-थोड़ा करके बाँट दिया गया हो, रक्षक आदिने जिसका भक्षण कर लिया हो, जिसे संचय करके रखा नहीं गया हो, जिसे चोर आदिने चुरा लिया हो तथा जो दूरवर्ती स्थानमें रखा गया हो, ऐसा कोष व्यसनग्रस्त बताया जाता है॥ २९॥

जो चारों ओरसे अवरुद्ध कर दी गयी हो, जिसपर घेरा पड़ गया हो, जिसका अनादर या असम्मान हुआ हो, जिसका ठीक-ठीक भरण-पोषण नहीं किया गया हो, जिसके अधिकांश सैनिक रोगी, थके-माँदे, चलकर दूरसे आये हुए तथा नवागत हों, जो सर्वथा क्षीण और प्रतिहत हो चली हो, जिसके आगे बढ़नेका वेग कुण्ठित कर दिया गया हो, जिसके अधिकांश लोग आशाजनित निर्वेद (खेद एवं विरक्ति)-से भरे हों, जो अयोग्य भूमिमें स्थित, अनृतप्राप्त (अविश्वस्त) हो गयी हो, जिसके भीतर स्त्रियाँ अथवा स्त्रैण हों, जिसके हृदयमें कुछ काँटा-सा चुभ रहा हो तथा जिस सेनाके पीछे दुष्ट पाष्णिग्राह (शत्रु)-की सेना लगी हुई हो, उस सेनाकी इस दुरावस्थाको ‘बलव्यसन’ कहा जाता है॥ ३०-३३॥

जो दैवसे पीड़ित, शत्रुसेनासे आक्रान्त तथा पूर्वोक्त काम, क्रोध आदिसे संयुक्त हो, उस मित्रको व्यसनग्रस्त बताया गया है। उसे उत्साह एवं सहायता दी जाय तो वह शत्रुओंसे युद्धके लिये उद्यत एवं विजयी हो सकता है॥ ३४॥

अर्थदूषण, वाणीकी कठोरता तथा दण्डविषयक अत्यन्त क्रूरता—ये तीन क्रोधज व्यसन हैं। मृगया, जूआ, मद्यपान तथा स्त्रीसङ्ग—ये चार प्रकारके कामज व्यसन हैं॥ ३५॥

वाणीकी कठोरता लोकमें अत्यन्त उद्वेग पैदा


* पूर्वप्रवृत्त अर्थका उच्छेद होनेसे 'अदान', उसका पण्यागार आदिसे आकर्षण 'आदान', स्वयं उपार्जित धनका अग्नि आदिसे विध्वंस 'विनाश' तथा कहींसे प्राप्त धनके विघातपूर्वक उसका त्याग 'परित्याग' नामक अर्थदूषण है। (जयमङ्गला)

४६६ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

करनेवाली और अनर्थकारिणी होती है। अर्थहरण, ताड़न और वध—यह तीन प्रकारका दण्ड असिद्ध अर्थका साधक होनेसे सत्पुरुषोंद्वारा 'शासन' कहा गया है। उसको युक्तिसे ही प्राप्त कराये। जो राजा युक्त (उचित) दण्ड देता है, उसकी प्रशंसा की जाती है। जो क्रोधवश कठोर दण्ड देता है, वह राजा प्राणियोंमें उद्वेग पैदा करता है। उस दण्डसे उद्विग्न हुए मनुष्य विजिगीषुके शत्रुओंकी शरणमें चले जाते हैं, उनसे वृद्धिको प्राप्त हुए शत्रु उक्त राजाके विनाशमें कारण होते हैं॥ ३६-३७$\frac{१}{२}$॥

दूषणीय मनुष्यके दूषण (अपकार)-के लिये उससे प्राप्त होनेवाले किसी महान् अर्थका विघातपूर्वक परित्याग नीति-तत्त्वज्ञ विद्वानोंद्वारा 'अर्थदूषण' कहा जाता है॥ ३८$\frac{१}{२}$॥

दौड़ते हुए यान (अश्व आदि)-से गिरना, भूख-प्यासका कष्ट उठाना आदि दोष मृगयासे प्राप्त होते हैं। किसी छिपे हुए शत्रुसे मारे जानेकी भी सम्भावना रहती है। श्रम या थकावटपर विजय पानेके लिये किसी सुरक्षित वनमें राजा शिकार खेले॥ ३९$\frac{१}{२}$॥

जूएमें धर्म, अर्थ और प्राणोंके नाश आदि दोष होते हैं; उसमें कलह आदिकी भी सम्भावना रहती है। स्त्रीसम्बन्धी व्यसनसे प्रत्येक कर्तव्य-कार्यके करनेमें बहुत अधिक विलम्ब होता है—ठीक समयसे कोई काम नहीं हो पाता तथा धर्म और अर्थको भी हानि पहुँचती है। मद्यपानके व्यसनसे प्राणोंका नाशतक हो जाता है, नशेके कारण कर्तव्य और अकर्तव्यका निश्चय नहीं हो पाता॥ ४०-४१॥

सेनाकी छावनी कहाँ और कैसे पड़नी चाहिये, इस बातको जो जानता है तथा भले-बुरे निमित्त (शकुन)-का ज्ञान रखता है, वह शत्रुपर विजय पा सकता है। स्कन्धावार (सेनाकी छावनी)-के मध्यभागमें खजानासहित राजाके ठहरनेका स्थान होना चाहिये। राजभवनको चारों ओरसे घेरकर क्रमशः मौल (पिता-पितामहके कालसे चली आती हुई मौलिक सेना), भृत (भोजन और वेतन देकर रखी हुई सेना), श्रेणि (जनपदनिवासियोंका दल अथवा कुविन्द आदिकी सेना), मित्रसेना, द्विषद्वल (राजाकी दण्डशक्तिसे वशीभूत हुए सामन्तोंकी सेना) तथा आटविक (वन्य-प्रदेशके अधिपति की सेना)—इन सेनाओंकी छावनी डाले॥ ४२-४३॥

(राजा और उसके अन्तःपुरकी रक्षाकी सुव्यवस्था करनेके पश्चात्) सेनाका एक चौथाई भाग युद्धसज्जासे सुसज्जित हो सेनापतिको आगे करके प्रयत्नपूर्वक छावनीके बाहर रातभर चक्कर लगाये। वायुके समान वेगशाली घोड़ोंपर बैठे हुए घुड़सवार दूर सीमान्तपर विचरते हुए शत्रु की गतिविधिका पता लगायें। जो भी छावनीके भीतर प्रवेश करें या बाहर निकलें, सब राजाकी आज्ञा प्राप्त करके ही वैसा करें॥ ४४-४५॥

साम, दान, दण्ड, भेद, उपेक्षा, इन्द्रजाल और माया—ये सात उपाय हैं; इनका शत्रुके प्रति प्रयोग करना चाहिये। इन उपायोंसे शत्रु वशीभूत होता है॥ ४६॥

सामके पाँच भेद बताये गये हैं—१. दूसरेके उपकारका वर्णन, २. आपसके सम्बन्धको प्रकट करना (जैसे 'आपकी माता मेरी मौसी हैं' इत्यादि), ३. मधुरवाणीमें गुण-कीर्तन करते हुए बोलना, ४. भावी उन्नतिका प्रकाशन (यथा—'ऐसा होनेपर आगे चलकर हम दोनोंका बड़ा लाभ होगा' इत्यादि) तथा ५. मैं आपका हूँ—यों कहकर आत्मसमर्पण करना॥ ४७$\frac{१}{२}$॥

किसीसे उत्तम (सार), अधम (असार) तथा मध्यम (सारासार) भेदसे जो द्रव्य-सम्पत्ति प्राप्त हुई हो, उसको उसी रूपमें लौटा देना—यह दानका प्रथम भेद है। २. बिना दिये ही जो धन किसीके द्वारा ले लिया गया हो, उसका अनुमोदन

  • अध्याय २४१ * \hfill ४६७

करना (यथा—'आपने अच्छा किया जो ले लिया। मैंने पहलेसे ही आपको देनेका विचार कर लिया था')—यह दानका दूसरा भेद है। ३. अपूर्व द्रव्यदान (भाण्डागारसे निकालकर दिया गया नूतन दान), ४. स्वयंग्राहप्रवर्तन (किसी दूसरेसे स्वयं ही धन ले लेनेके लिये प्रेरित करना। यथा—'अमुक व्यक्तिसे अमुक द्रव्य ले लो, वह तुम्हारा ही हो जायगा') तथा ५. दातव्य ऋण आदिको छोड़ देना या न लेना—इस प्रकार ये दानके पाँच भेद कहे गये हैं॥ ४८-४९$\frac{१}{२}$॥

स्नेह और अनुरागको दूर कर देना, परस्पर संघर्ष (कलह) पैदा करना तथा धमकी देना—भेदज्ञ पुरुषोंने भेदके ये तीन प्रकार बताये हैं॥ ५०$\frac{१}{२}$॥

वध, धनका अपहरण और बन्धन एवं ताड़न आदिके द्वारा क्लेश पहुँचाना—ये दण्डके तीन भेद हैं। वधके दो प्रकार हैं—(१) प्रकाश (प्रकट) और (२) अप्रकाश (गुप्त)। जो सब लोगोंके द्वेषपात्र हों, ऐसे दुष्टोंका प्रकटरूपमें वध करना चाहिये; किंतु जिनके मारे जानेसे लोग उद्विग्न हो उठें, जो राजाके प्रिय हों तथा अधिक बलशाली हों, वे यदि राजाके हितमें बाधा पहुँचाते हैं तो उनका गुप्तरूपसे वध करना उत्तम कहा गया है। गुप्तरूपसे वधका प्रयोग यों करना चाहिये—विष देकर, एकान्तमें आग आदि लगाकर, गुप्त मनुष्योंद्वारा शस्त्रका प्रयोग कराकर अथवा शरीरमें फोड़ा पैदा करनेवाले उबटन लगवाकर राज्यके शत्रुको नष्ट करे। जो जातिमात्रसे भी ब्राह्मण हो, उसे प्राणदण्ड न दे। उसपर सामनीतिका प्रयोग करके उसे वशमें लानेकी चेष्टा करे॥ ५१—५३॥

प्रिय वचन बोलना 'साम' कहलाता है। उसका प्रयोग इस तरह करे, जिससे चित्तमें अमृतका-सा लेप होने लगे। अर्थात् वह हृदयमें स्थान बना ले। ऐसी स्निग्ध दृष्टिसे देखे, मानो वह सामनेवालेको प्रेमसे पी जाना चाहता हो तथा इस तरह बात करे, मानो उसके मुखसे अमृतकी वर्षा हो रही हो॥ ५४॥

जिसपर झूठा ही कलङ्क लगाया गया हो, जो धनका इच्छुक हो, जिसे अपने पास बुलाकर अपमानित किया गया हो, जो राजाका द्वेषी हो, जिसपर भारी कर लगाया गया हो, जो विद्या और कुल आदिकी दृष्टिसे अपनेको सबसे बड़ा मानता हो, जिसके धर्म, काम और अर्थ छिन्न-भिन्न हो गये हों, जो कुपित, मानी और अनादृत हो, जिसे अकारण राज्यसे निर्वासित कर दिया गया हो, जो पूजा एवं सत्कारके योग्य होनेपर भी असत्कृत हुआ हो, जिसके धन तथा स्त्रीका हरण कर लिया गया हो, जो मनमें वैर रखते हुए भी ऊपरसे सामनीतिके प्रयोगसे शान्त रहता हो, ऐसे लोगोंमें, तथा जो सदा शङ्कित रहते हों, उनमें, यदि वे शत्रुपक्षके हों तो फूट डाले और अपने पक्षमें इस तरहके लोग हों तो उन्हें यत्नपूर्वक शान्त करे। यदि शत्रुपक्षसे फूटकर ऐसे लोग अपने पक्षमें आयें तो उनका सत्कार करे॥ ५५—५७$\frac{१}{२}$॥

समान तृष्णाका अनुसन्धान (उभयपक्षको समानरूपसे लाभ होनेकी आशाका प्रदर्शन), अत्यन्त उग्रभय (मृत्यु आदिकी विभीषिका) दिखाना तथा उच्चकोटिका दान और मान—ये भेदके उपाय कहे गये हैं॥ ५८$\frac{१}{२}$॥

शत्रुकी सेनामें जब भेदनीतिद्वारा फूट डाल दी जाती है, तब वह घुन लगे हुए काष्ठकी भाँति विशीर्ण (छिन्न-भिन्न) हो जाती है। प्रभाव, उत्साह तथा मन्त्रशक्तिसे सम्पन्न एवं देश-कालका ज्ञान रखनेवाला राजा दण्डके द्वारा शत्रुओंका अन्त कर दे। जिसमें मैत्रीभाव प्रधान है तथा जिसका विचार कल्याणमय है, ऐसे पुरुषको सामनीतिके द्वारा वशमें करे॥ ५९-६०॥

जो लोभी हो और आर्थिक दृष्टिसे क्षीण हो चला हो, उसको दानद्वारा सत्कारपूर्वक वशमें