अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अध्याय २७३ * ५५१
जो स्त्रीरूपमें प्रतिष्ठित थी, ‘छाया-संज्ञा’ कहते हैं।) छाया-संज्ञाने सूर्यके अंशसे सावर्णि मनु तथा शनैश्चर नामक पुत्रको और तपती एवं विष्टि नामवाली कन्याओंको जन्म दिया। तदनन्तर (अश्वारूपधारिणी) संज्ञासे दोनों अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्ति हुई॥ १–४॥
वैवस्वत मनुके दस पुत्र हुए, जो उन्हींके समान तेजस्वी थे। उनके नाम इस प्रकार हैं— इक्ष्वाकु, नाभाग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रांशु, नृग, सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ दिष्ट, करूष और पृषध्र—ये दसों महाबली राजा अयोध्यामें हुए। मनुकी इला नामवाली एक कन्या भी थी, जिसके गर्भसे बुधके अंशसे पुरूरवाका जन्म हुआ। पुरूरवाको उत्पन्न करके इला पुरुषरूपमें परिणत हो गयी। उस समय उसका नाम सुद्युम्न हुआ। सुद्युम्नसे उत्कल, गय और विनताश्व—इन तीन राजाओंका जन्म हुआ। उत्कलको उत्कलप्रान्त (उड़ीसा)-का राज्य मिला, विनताश्वका पश्चिमदिशापर अधिकार हुआ तथा राजाओंमें श्रेष्ठ गय पूर्वदिशाके राजा हुए, जिनकी राजधानी गयापुरी थी। राजा सुद्युम्न वसिष्ठ ऋषिके आदेशसे प्रतिष्ठानपुरमें¹ आ गये और उसीको अपनी राजधानी बनाया। उन्होंने वहाँका राज्य पाकर उसे पुरूरवाको दे दिया। नरिष्यन्तके पुत्र ‘शक’ नामसे प्रसिद्ध हुए। नाभागसे परमवैष्णव अम्बरीषका जन्म हुआ। वे प्रजाओंका अच्छी तरह पालन करते थे। राजा धृष्टसे धार्ष्टक-वंशका विस्तार हुआ। सुकन्या और आनर्त—ये दो शर्यातिकी संतानें हुईं। आनर्तसे ‘रेव’ नामक नरेशकी उत्पत्ति हुई। आनर्तदेशमें उनका राज्य था और कुशस्थली उनकी राजधानी थी। रेवके पुत्र रैवत हुए, जो ‘ककुद्मी’ नामसे प्रसिद्ध और धर्मात्मा थे। वे अपने पिताके सौ पुत्रोंमें सबसे बड़े थे, अतः कुशस्थलीका राज्य उन्हींको मिला॥ ५–१२½॥
एक समयकी बात है—वे अपनी कन्या रेवतीको साथ लेकर ब्रह्माजीके पास गये और वहाँ संगीत सुनने लगे। वहाँ ब्रह्माजीके समयसे दो ही घड़ी बीती, किंतु इतनेहीमें मर्त्यलोकके अंदर अनेक युग समाप्त हो गये। संगीत सुनकर वे बड़े वेगसे अपनी पुरीको लौटे, परंतु अब उसपर यदुवंशियोंका अधिकार हो गया था। उन्होंने कुशस्थलीकी जगह द्वारका नामकी पुरी बसायी थी, जो बड़ी मनोरम और अनेक द्वारोंसे सुशोभित थी। भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके वासुदेव आदि वीर उसकी रक्षा करते थे। वहाँ जाकर रैवतने अपनी कन्या रेवतीका बलदेवजीसे विवाह कर दिया और संसारकी अनित्यता जानकर सुमेरु पर्वतके शिखरपर जाकर तपस्या करने लगे। अन्तमें उन्हें विष्णुधामकी प्राप्ति हुई॥ १३–१६॥
नाभागके दो पुत्र हुए, जो वैश्याके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। वे (अपनी विशेष तपस्याके कारण) ब्राह्मणत्वको प्राप्त हुए। करूषके पुत्र ‘कारूष’ नामसे प्रसिद्ध क्षत्रिय हुए, जो युद्धमें मतवाले हो उठते थे। पृषध्रने भूलसे अपने गुरुकी गायकी हिंसा कर डाली थी, अतः वे शापवश शूद्र हो गये। मनुपुत्र इक्ष्वाकुके पुत्र विकुक्षि हुए, जो (कुछ कालके लिये) देवताओंके राज्यपर आसीन हुए थे। विकुक्षिके पुत्र ककुत्स्थ हुए। ककुत्स्थका पुत्र सुयोधन नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसके पुत्रका नाम ‘पृथु’ था। पृथुसे विश्वगश्वका² जन्म हुआ। उसका पुत्र आयु और आयुका पुत्र युवनाश्व हुआ। युवनाश्वसे श्रावन्तकी³ उत्पत्ति हुई, जिन्होंने पूर्वदिशामें श्रावन्तकी⁴ नामकी
१. गङ्गा-यमुनाके संगमके समीप बसा हुआ वर्तमान झूसी ग्राम ही पहलेका ‘प्रतिष्ठानपुर’ है।
२. विष्णुपुराणमें ‘विश्वगश्व’ नाम मिलता है और श्रीमद्भागवतमें ‘विश्वरन्ध्र’।
३-४. विष्णुपुराणमें ‘शावस्त’ तथा ‘शावस्ती’ नाम मिलते हैं।
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पुरी बसायी। श्रावन्तसे बृहदश्व और बृहदश्वसे कुवलाश्व नामक राजाका जन्म हुआ। इन्होंने पूर्वकालमें धुन्धु नामसे प्रसिद्ध दैत्यका वध किया था, अतः उसीके नामपर ये 'धुन्धुमार' कहलाये। धुन्धुमारसे तीन पुत्र हुए। वे तीनों ही राजा थे। उनके नाम थे- दृढ़ाश्व, दण्ड और कपिल। दृढ़ाश्वसे हर्यश्व और प्रमोदकने जन्म ग्रहण किया। हर्यश्वसे निकुम्भ और निकुम्भसे संहताश्वकी उत्पत्ति हुई। संहताश्वके दो पुत्र हुए-अकृशाश्व तथा रणाश्व। रणाश्वके पुत्र युवनाश्व और युवनाश्वके पुत्र राजा मांधाता हुए। मांधाताके भी दो पुत्र हुए, जिनमें एकका नाम पुरुकुत्स था और दूसरेका नाम मुचुकुन्द॥ १७-२४॥
पुरुकुत्ससे त्रसदस्युका जन्म हुआ। वे नर्मदाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। उनका दूसरा नाम 'सम्भूत' भी था। सम्भूतके सुधन्वा और सुधन्वाके पुत्र त्रिधन्वा हुए। त्रिधन्वाके तरुण और तरुणके पुत्र सत्यव्रत थे। सत्यव्रतसे सत्यरथ हुए, जिनके पुत्र हरिश्चन्द्र थे। हरिश्चन्द्रसे रोहिताश्वका जन्म हुआ, रोहिताश्वसे वृक हुए, वृकसे बाहु और बाहुसे सगरकी उत्पत्ति हुई। सगरकी प्यारी पत्नी प्रभा थी, जो प्रसन्न हुए और्व मुनिकी कृपासे साठ हजार पुत्रोंकी जननी हुई तथा उनकी दूसरी पत्नी भानुमतीने राजासे एक ही पुत्रको उत्पन्न किया, जिसका नाम असमञ्जस था। सगरके साठ हजार पुत्र पृथ्वी खोदते समय भगवान् कपिलके क्रोधसे भस्म हो गये। असमञ्जसके पुत्र अंशुमान् और अंशुमान्के दिलीप हुए। दिलीपसे भगीरथका जन्म हुआ, जिन्होंने गङ्गाको पृथ्वीपर उतारा था। भगीरथसे नाभाग और नाभागसे अम्बरीष हुए। अम्बरीषके सिन्धुद्वीप और सिन्धुद्वीपके पुत्र श्रुतायु हुए। श्रुतायुके ऋतुपर्ण और ऋतुपर्णके पुत्र कल्माषपाद थे। कल्माषपादसे सर्वकर्मा और सर्वकर्मासे अनरण्य हुए। अनरण्यके निघ्न और निघ्नके पुत्र दिलीप हुए। राजा दिलीपके रघु और रघुके पुत्र अज थे। अजसे दशरथका जन्म हुआ। दशरथके चार पुत्र हुए- वे सभी भगवान् नारायणके स्वरूप थे। उन सबमें ज्येष्ठ श्रीरामचन्द्रजी थे। उन्होंने रावणका वध किया था। रघुनाथजी अयोध्याके सर्वश्रेष्ठ राजा हुए। महर्षि वाल्मीकिने नारदजीके मुँहसे उनका प्रभाव सुनकर (रामायणके नामसे) उनके चरित्रका वर्णन किया था। श्रीरामचन्द्रजीके दो पुत्र हुए, जो कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले थे। वे सीताजीके गर्भसे उत्पन्न होकर कुश और लवके नामसे प्रसिद्ध हुए। कुशसे अतिथिका जन्म हुआ। अतिथिके पुत्र निषध हुए। निषधसे नलकी उत्पत्ति हुई (ये सुप्रसिद्ध राजा दमयन्तीपति नलसे भिन्न हैं); नलसे नभ हुए। नभसे पुण्डरीक और पुण्डरीकसे सुधन्वा उत्पन्न हुए। सुधन्वाके पुत्र देवानीक और देवानीकके अहीनाश्व हुए। अहीनाश्वसे सहस्राश्व और सहस्राश्वसे चन्द्रालोक हुए। चन्द्रालोकसे तारापीड, तारापीडसे चन्द्रगिरि और चन्द्रगिरिसे भानुरथका जन्म हुआ। भानुरथका पुत्र श्रुतायु नामसे प्रसिद्ध हुआ। ये इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न राजा सूर्यवंशका विस्तार करनेवाले माने गये हैं॥ २५-३९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सूर्यवंशका वर्णन' नामक दो सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७३॥
- अध्याय २७४ * ५५३
दो सौ चौहत्तरवाँ अध्याय
सोमवंशका वर्णन
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! अब मैं सोमवंशका वर्णन करूँगा, इसका पाठ करनेसे पापका नाश होता है। विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए। ब्रह्माके पुत्र महर्षि अत्रि हुए। अत्रिसे सोमकी उत्पत्ति हुई। सोमने राजसूय-यज्ञ किया और उसमें तीनों लोकोंके राज्यका उन्होंने दक्षिणारूपसे दान कर दिया। जब यज्ञके अन्तमें अवभृथस्नान समाप्त हुआ तो उनका रूप देखनेकी इच्छासे नौ देवियाँ चन्द्रमाके पास आयीं और कामबाणसे संतप्त होकर उनकी सेवा करने लगीं। लक्ष्मी (कान्ति) नारायणको छोड़कर चली आयीं। सिनीवाली कर्दमको, द्युति अग्निको और पुष्टि अपने अविनाशी पति धाताको त्यागकर आ गयीं। प्रभा प्रभाकरको और कुहू हविष्मान्को छोड़कर स्वयं सोमके पास चली आयीं। कीर्तिने अपने स्वामी जयन्तको छोड़ा और वसुने मरीचिनन्दन कश्यपको तथा धृति भी उस समय अपने पति नन्दिको त्यागकर सोमकी ही सेवामें संलग्न हो गयीं॥ १—५॥
चन्द्रमाने भी उस समय उन देवियोंको अपनी ही पत्नीकी भाँति सकामभावसे अपनाया। सोमके इस प्रकार अत्याचार करनेपर भी उस समय उन देवियोंके पति शाप तथा शस्त्र आदिके द्वारा उनका अनिष्ट करनेमें समर्थ न हो सके; अपितु सोम ही अपनी तपस्याके प्रभावसे ‘भू’ आदि सातों लोकोंके एकमात्र स्वामी हुए। इस अनीतिसे ग्रस्त होकर चन्द्रमाकी बुद्धि विनयसे भ्रष्ट होकर भ्रान्त हो गयी और उन्होंने अङ्गिरानन्दन बृहस्पतिजीका अपमान करके उनकी यशस्विनी पत्नी ताराका बलपूर्वक अपहरण कर लिया। इसके कारण देवताओं और दानवोंमें संसारका विनाश करनेवाला महान् युद्ध हुआ, जो ‘तारकामय संग्राम’ के नामसे विख्यात है। अन्तमें ब्रह्माजीने (चन्द्रमाकी ओरसे युद्धमें सहायता पहुँचानेवाले) शुक्राचार्यको रोककर तारा बृहस्पतिजीको दिला दी। देवगुरु बृहस्पतीने ताराको गर्भिणी देखकर कहा—‘इस गर्भका त्याग कर दो।’ उनकी आज्ञासे ताराने उस गर्भका त्याग किया, जिससे बड़ा तेजस्वी कुमार प्रकट हुआ। उसने पैदा होते ही कहा—‘मैं चन्द्रमाका पुत्र हूँ।’ इस प्रकार सोमसे बुधका जन्म हुआ। उनके पुत्र पुरूरवा हुए; उर्वशी नामकी अप्सराने स्वर्ग छोड़कर पुरूरवाका वरण किया॥ ६—१२॥
महामुने! राजा पुरूरवाने उर्वशीके साथ उनसठ वर्षोंतक विहार किया। पूर्वकालमें एक ही अग्नि थे। राजा पुरूरवाने ही उन्हें (गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि-भेदसे) तीन रूपोंमें प्रकट किया। राजा योगी थे। अन्तमें उन्हें गन्धर्वलोककी प्राप्ति हुई। उर्वशीने राजा पुरूरवासे आयु, दृढ़ायु, अश्वायु, धनायु, धृतिमान्, वसु, दिविजात और शतायु—इन आठ पुत्रोंको उत्पन्न किया। आयुके नहुष, वृद्धशर्मा, रजि, दम्भ और विपाप्मा—ये पाँच पुत्र हुए। रजिसे सौ पुत्रोंका जन्म हुआ। वे ‘राजेय’ के नामसे प्रसिद्ध थे। राजा रजिको भगवान् विष्णुसे वरदान प्राप्त हुआ था। उन्होंने देवासुर-संग्राममें देवताओंकी प्रार्थनासे दैत्योंका वध किया था। इन्द्र राजा रजिके पुत्रभावको प्राप्त हुए। रजि स्वर्गका राज्य इन्द्रको देकर स्वयं दिव्यलोकवासी हो गये। कुछ कालके बाद रजिके पुत्रोंने इन्द्रका राज्य छीन लिया। इससे वे मन-ही-मन बहुत दुखी हुए। तदनन्तर देवगुरु बृहस्पतीने ग्रह-शान्ति आदिकी विधिसे रजिके पुत्रोंको मोहित करके राज्य लेकर इन्द्रको दे दिया। उस समय रजिके पुत्र अपने धर्मसे भ्रष्ट हो गये थे। राजा नहुषके सात
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पुत्र हुए। उनके नाम थे—यति, ययाति, उत्तम, उद्भव, पञ्चक, शर्याति और मेघपालक। यति कुमारावस्थामें होनेपर भी भगवान् विष्णुका ध्यान करके उनके स्वरूपको प्राप्त हो गये। उस समय शुक्राचार्यकी कन्या देवयानी तथा वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा—ये दो राजा ययातिकी पत्नियाँ हुईं। राजाके इन दोनों स्त्रियोंसे पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। देवयानीने यदु और तुर्वसुको जन्म दिया और वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु और पूरू—ये तीन पुत्र उत्पन्न किये। इनमेंसे यदु और पूरू—ये दो ही सोमवंशका विस्तार करनेवाले हुए॥ १३-२३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सोमवंशका वर्णन' नामक दो सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७४॥
दो सौ पचहत्तरवाँ अध्याय
यदुवंशका वर्णन
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! यदुके पाँच पुत्र थे—नीलाञ्जिक, रघु, क्रोष्टु, शतजित् और सहस्रजित्। इनमें सहस्रजित् सबसे ज्येष्ठ थे। शतजित्के हैहय, रेणुहय और हय—ये तीन पुत्र हुए। हैहयके धर्मनेत्र और धर्मनेत्रके पुत्र संहत हुए। संहतके पुत्र महिमा तथा महिमाके भद्रसेन थे। भद्रसेनके दुर्गम और दुर्गमसे कनकका जन्म हुआ। कनकसे कृतवीर्य, कृताग्नि, करवीरक और चौथे कृतौजा नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। कृतवीर्यसे अर्जुन हुए। अर्जुनने तपस्या की, इससे प्रसन्न होकर भगवान् दत्तात्रेयने उन्हें सातों द्वीपोंकी पृथ्वीका आधिपत्य, एक हजार भुजाएँ और संग्राममें अजेयताका वरदान दिया। साथ ही यह भी कहा—'अधर्ममें प्रवृत्त होनेपर भगवान् विष्णुके (अवतार श्रीपरशुरामजीके) हाथसे तुम्हारी मृत्यु निश्चित है।' राजा अर्जुनने दस हजार यज्ञोंका अनुष्ठान किया। उनके स्मरणमात्रसे राष्ट्रमें किसीके धनका नाश नहीं होता था। यज्ञ, दान, तपस्या, पराक्रम और शास्त्रज्ञानके द्वारा कोई भी राजा कृतवीर्यकुमार अर्जुनकी गतिको नहीं पा सकता। कार्तवीर्य अर्जुनके सौ पुत्र थे, उनमें पाँच प्रधान थे। उनके नाम हैं—शूरसेन, शूर, धृष्टोक्त, कृष्ण और जयध्वज। जयध्वज अवन्ती-देशके महाराज थे। जयध्वजसे तालजङ्घका जन्म हुआ और तालजङ्घसे अनेक पुत्र उत्पन्न हुए, जो तालजङ्घके ही नामसे प्रसिद्ध थे। हैहयवंशी क्षत्रियोंके पाँच कुल हैं—भोज, अवन्ति, वीतिहोत्र, स्वयंजात और शौण्डिकेय। वीतिहोत्रसे अनन्तकी उत्पत्ति हुई और अनन्तसे दुर्जय नामक राजाका जन्म हुआ॥ १-११॥
अब क्रोष्टुके वंशका वर्णन करूँगा, जहाँ साक्षात् भगवान् विष्णुने अवतार धारण किया था। क्रोष्टुसे वृजिनीवान् और वृजिनीवान्से स्वाहाका जन्म हुआ। स्वाहाके पुत्र रुषद्वु और उनके पुत्र चित्ररथ थे। चित्ररथसे शशबिन्दु उत्पन्न हुए, जो चक्रवर्ती राजा थे। वे सदा भगवान् विष्णुके भजनमें ही लगे रहते थे। शशबिन्दुके दस हजार पुत्र थे। वे सब-के-सब बुद्धिमान्, सुन्दर, अधिक धनवान् और अत्यन्त तेजस्वी थे; उनमें पृथुश्रवा ज्येष्ठ थे। उनके पुत्रका नाम सुयज्ञ था। सुयज्ञके पुत्र उशना और उशनाके तितिक्षु हुए। तितिक्षुसे मरुत्त और मरुत्तसे कम्बलबर्हिष (जिनका दूसरा नाम रुक्मकवच था) हुए। रुक्मकवचसे रुक्मेषु, पृथुरुक्मक, हवि, ज्यामघ और पापघ्न आदि पचास पुत्र उत्पन्न हुए। इनमें ज्यामघ अपनी
- अध्याय २७५ * ५५५
स्त्रीके वशीभूत रहनेवाला था। उससे उसकी पत्नी शैव्याके गर्भसे विदर्भकी उत्पत्ति हुई। विदर्भके कौशिक, लोमपाद और क्रथ नामक पुत्र हुए। इनमें लोमपाद ज्येष्ठ थे। उनसे कृतिका जन्म हुआ। कौशिकके पुत्रका नाम चिदि हुआ। चिदिके वंशज राजा 'चैद्य'के नामसे प्रसिद्ध हुए। विदर्भपुत्र क्रथसे कुन्ति और कुन्तिसे धृष्टकका जन्म हुआ। धृष्टकके पुत्र धृति और धृतिके विदूरथ हुए। ये 'दशार्ह' नामसे भी प्रसिद्ध थे। दशार्हके पुत्र व्योम और व्योमके पुत्र जीमूत कहे जाते हैं। जीमूतके पुत्रका नाम विकल हुआ और उनके पुत्र भीमरथ नामसे प्रसिद्ध हुए। भीमरथसे नवरथ और नवरथसे दृढरथ हुए। दृढरथसे शकुन्ति तथा शकुन्तिसे करम्भ उत्पन्न हुए। करम्भसे देवरातका जन्म हुआ। देवरातके पुत्र देवक्षेत्र कहलाये। देवक्षेत्रसे मधु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और मधुसे द्रवरसने जन्म ग्रहण किया। द्रवरसके पुरुहूत और पुरुहूतके पुत्र जन्तु थे। जन्तुके पुत्रका नाम सात्वत था। ये यदुवंशियोंमें गुणवान् राजा थे। सात्वतके भजमान, वृष्णि, अन्धक तथा देवावृध — ये चार पुत्र हुए। इन चारोंके वंश विख्यात हैं। भजमानके बाह्य, वृष्टि, कृमि और निमि नामक पुत्र हुए। देवावृधसे बभ्रुका जन्म हुआ। उनके विषयमें इस श्लोकका गान किया जाता है—'हम जैसा दूरसे सुनते हैं, वैसा ही निकटसे देखते भी हैं। बभ्रु मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं और देवावृध देवताओंके समान हैं।' बभ्रुके चार पुत्र हुए। वे सभी भगवान् वासुदेवके भक्त थे। उनके नाम हैं—कुकुर, भजमान, शिनि और कम्बलबर्हिष। कुकुरके धृष्णु नामक पुत्र हुए। धृष्णुसे धृति नामवाले पुत्रकी उत्पत्ति हुई। धृतिसे कपोतरोमा और उनके पुत्र तित्तिरि हुए। तित्तिरिके पुत्र नर और उनके पुत्र आनकदुन्दुभि नामसे विख्यात हुए। आनकदुन्दुभिकी परम्परामें पुनर्वसु और उनके पुत्र आहुक हुए। ये आहुकीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। आहुकसे देवक और उग्रसेन हुए। देवकसे देववान्, उपदेव, सहदेव और देवरक्षित — ये चार पुत्र हुए। इनकी सात बहिनें थीं, जिनका देवकने वसुदेवके साथ ब्याह कर दिया। उन सातोंके नाम हैं—देवकी, श्रुतदेवी, मित्रदेवी, यशोधरा, श्रीदेवी, सत्यदेवी और सातवीं सुरापी। उग्रसेनके नौ पुत्र हुए, जिनमें कंस ज्येष्ठ था। शेष आठ पुत्रोंके नाम इस प्रकार हैं— न्यग्रोध, सुनामा, कङ्क, राजा शङ्कु, सुतनु, राष्ट्रपाल, युद्धमुष्टि और सुमुष्टिक। भजमानके पुत्र विदूरथ हुए, जो रथियोंमें प्रधान थे। उनके पुत्र राजाधिदेव और शूर नामसे विख्यात हुए। राजाधिदेवके दो पुत्र हुए शोणाश्व और श्वेतवाहन। शोणाश्वके शमी और शत्रुजित् आदि पाँच पुत्र हुए। शमीके पुत्र प्रतिक्षेत्र, प्रतिक्षेत्रके भोज और भोजके हृदिक हुए। हृदिकके दस पुत्र थे, जिनमें कृतवर्मा, शतधन्वा, देवार्ह और भीषण आदि प्रधान हैं। देवार्हसे कम्बलबर्हि और कम्बलबर्हिसे असमौजाका जन्म हुआ। असमौजाके सुदंष्ट्र, सुवास और धृष्ट नामक पुत्र हुए। धृष्टकी दो पत्नियाँ थीं—गान्धारी और माद्री। इनमें गान्धारीसे सुमित्रका जन्म हुआ और माद्रीने युधाजित्को उत्पन्न किया। धृष्टसे अनमित्र और शिनिका भी जन्म हुआ। शिनिसे देवमीढुष उत्पन्न हुए। अनमित्रके पुत्र निघ्न और निघ्नके प्रसेन तथा सत्राजित् हुए। इनमें प्रसेनके भाई सत्राजित्को सूर्यसे स्यमन्तकमणि प्राप्त हुई थी, जिसे लेकर प्रसेन जंगलमें मृगयाके लिये विचर रहे थे। उन्हें एक सिंहने मारकर वह मणि ले ली। तत्पश्चात् जाम्बवान्ने उस सिंहको मार डाला (और मणिको अपने अधिकारमें कर लिया)। इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने जाम्बवान्को युद्धमें परास्त किया और उनसे जाम्बवती तथा मणिको पाकर वे द्वारकापुरीको लौट आये। वहाँ आकर उन्होंने वह मणि सत्राजित्को
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दे दी, किंतु (मणिके लोभसे) शतधन्वाने सत्राजित्को मार डाला। श्रीकृष्णने शतधन्वाको मारकर वह मणि छीन ली और यशके भागी हुए। उन्होंने बलराम और मुख्य यदुवंशियोंके सामने वह मणि अक्रूरको अर्पित कर दी। इससे श्रीकृष्णके मिथ्या कलङ्कका मार्जन हुआ। जो इस प्रसङ्गका पाठ करता है, उसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। सत्राजित्को भङ्गकार नामसे प्रसिद्ध पुत्र और सत्यभामा नामकी कन्या हुई, जो भगवान् श्रीकृष्णकी प्यारी पटरानी हुई थी। अनमित्रसे शिनिका जन्म हुआ। शिनिके पुत्र सत्यक हुए। सत्यकसे सात्यकिकी उत्पत्ति हुई। वे 'युयुधान' नामसे भी प्रसिद्ध थे। उनके धुनि नामक पुत्र हुआ। धुनिका पुत्र युगन्धर हुआ। युधाजित्से स्वाह्यका जन्म हुआ। स्वाह्यसे ऋषभ और क्षेत्रककी उत्पत्ति हुई। ऋषभसे श्वफल्क उत्पन्न हुए। श्वफल्कके पुत्रका नाम अक्रूर हुआ और अक्रूरसे सुधन्वका जन्म हुआ। शूरसे वसुदेव आदि पुत्र तथा पृथा नामवाली कन्या उत्पन्न हुई, जो महाराज पाण्डुकी प्यारी पत्नी हुई। पाण्डुकी पत्नी कुन्ती (पृथा)-के गर्भ और धर्मके अंशसे युधिष्ठिर हुए, वायुके अंशसे भीमसेन और इन्द्रके अंशसे अर्जुनका जन्म हुआ। (पाण्डुकी दूसरी पत्नी) माद्रीके पेटसे (अश्विनीकुमारोंके अंशसे) नकुल और सहदेव उत्पन्न हुए। वसुदेवसे रोहिणीके गर्भसे बलराम, सारण और दुर्गम—ये तीन पुत्र हुए तथा देवकीके उदरसे पहले सुषेणका जन्म हुआ, फिर कीर्तिमान्, भद्रसेन, जारुख्य, विष्णुदास और भद्रदेह उत्पन्न हुए। इन छहों बच्चोंको कंसने मार डाला। तत्पश्चात् बलराम और कृष्णका प्रादुर्भाव हुआ तथा अन्तमें कल्याणमय वचन बोलनेवाली सुभद्राका जन्म हुआ। भगवान् श्रीकृष्णसे चारुदेष्ण और साम्ब आदि पुत्र उत्पन्न हुए। साम्ब आदि रानी जाम्बवतीके पुत्र थे॥ १२-५१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'यदुवंशका वर्णन' नामक दो सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७५ ॥
दो सौ छिहत्तरवाँ अध्याय
श्रीकृष्णकी पत्नियों तथा पुत्रोंके संक्षेपसे नामनिर्देश तथा द्वादश-संग्रामोंका संक्षिप्त परिचय
अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ! महर्षि कश्यप वसुदेवके रूपमें अवतीर्ण हुए थे और नारियोंमें श्रेष्ठ अदितिका देवकीके रूपमें आविर्भाव हुआ था। वसुदेव और देवकीसे भगवान् श्रीकृष्णका प्रादुर्भाव हुआ। वे बड़े तपस्वी थे। धर्मकी रक्षा, अधर्मका नाश, देवता आदिका पालन तथा दैत्य आदिका मर्दन—यही उनके अवतारका उद्देश्य था। रुक्मिणी, सत्यभामा और नग्नजित्कुमारी सत्या—ये भगवान्की प्रिय रानियाँ थीं। इनमें भी सत्यभामा उनकी आराध्य देवी थीं। इनके सिवा गन्धार-राजकुमारी लक्ष्मणा, मित्रविन्दा, देवी कालिन्दी, जाम्बवती, सुशीला, माद्री, कौसल्या, विजया और जया आदि सोलह हजार देवियाँ भगवान् श्रीकृष्णकी पत्नियाँ थीं। रुक्मिणीके गर्भसे प्रद्युम्न आदि पुत्र उत्पन्न हुए थे और सत्यभामाने भीम आदिको जन्म दिया था। जाम्बवतीके गर्भसे साम्ब आदिकी उत्पत्ति हुई थी। ये तथा और भी बहुत-से श्रीकृष्णके पुत्र थे। परम बुद्धिमान् भगवान्के
- अध्याय २७६ * ५५७
पुत्रोंकी संख्या एक करोड़ अस्सी हजारके लगभग थी। समस्त यादव भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित थे। प्रद्युम्नसे विदर्भराजकुमारी रुक्मवतीके गर्भसे अनिरुद्ध नामक पुत्र हुआ। अनिरुद्धको युद्ध बहुत ही प्रिय था। अनिरुद्धके पुत्र वज्र आदि हुए। सभी यादव अत्यन्त बलवान् थे। यादवोंकी संख्या कुल मिलाकर तीन करोड़ थी। उस समय साठ लाख दानव मनुष्य-योनिमें उत्पन्न हुए थे, जो लोगोंको कष्ट पहुँचा रहे थे। उन्हींका विनाश करनेके लिये भगवान्का अवतार हुआ था। धर्म-मर्यादाकी रक्षा करनेके लिये ही भगवान् श्रीहरि मनुष्यरूपमें प्रकट होते हैं ॥ १-९ ॥
देवता और असुरोंमें अपने दायभागके लिये बारह संग्राम हुए हैं। उनमें पहला 'नारसिंह' और दूसरा 'वामन' नामवाला युद्ध है। तीसरा 'वाराह-संग्राम' और चौथा 'अमृत-मन्थन' नामक युद्ध है। पाँचवाँ 'तारकामय संग्राम' और छठा 'आजीवक' नामक युद्ध हुआ। सातवाँ 'त्रैपुर' आठवाँ 'अन्धकवध'और नवाँ 'वृत्रविघातक संग्राम' है। दसवाँ 'जित्', ग्यारहवाँ 'हालाहल' और बारहवाँ 'घोर कोलाहल' नामक युद्ध हुआ है ॥ १०-१२ ॥
प्राचीनकालमें देवपालक भगवान् नरसिंहने हिरण्यकशिपुका हृदय विदीर्ण करके प्रह्लादको दैत्योंका राजा बनाया था। फिर देवासुर-संग्रामके अवसरपर कश्यप और अदितिसे वामनरूपमें प्रकट होकर भगवान्ने बल और प्रतापमें बढ़े-चढ़े हुए राजा बलिको छला और इन्द्रको त्रिलोकीका राज्य दे दिया। 'वाराह' नामक युद्ध उस समय हुआ था, जबकि भगवान्ने वाराह अवतार धारण करके हिरण्याक्षको मारा, देवताओंकी रक्षा की और जलमें डूबी हुई पृथ्वीका उद्धार किया। उस समय देवाधिदेवोंने भगवान्की स्तुति की ॥ १३-१५ ॥
एक बार देवता और असुरोंने मिलकर मन्दराचलको मथानी और नागराज वासुकिको नेती (बन्धनकी रस्सी) बना समुद्रको मथकर अमृत निकाला, किंतु भगवान्ने वह सारा अमृत देवताओंको ही पिला दिया। (उस समय देवताओं और दैत्योंमें घोर युद्ध हुआ था।) तारकामय-संग्रामके अवसरपर भगवान् ब्रह्माने इन्द्र, बृहस्पति, देवताओं तथा दानवोंको युद्धसे रोककर देवताओंकी रक्षा की और सोमवंशको स्थापित किया। आजीवक-युद्धमें विश्वामित्र, वसिष्ठ और अत्रि आदि ऋषियोंने राग-द्वेषादि दानवोंका निवारण करके देवताओंका पालन किया। पृथ्वीरूपी रथमें वेदरूपी घोड़े जोतकर भगवान् शंकर उसपर बैठे (और त्रिपुरका नाश करनेके लिये चले)। उस समय देवताओंके रक्षक और दैत्योंका विनाश करनेवाले भगवान् श्रीहरिने शंकरजीको शरण दी और बाण बनकर स्वयं ही त्रिपुरका दाह किया। गौरीका अपहरण करनेकी इच्छासे अन्धकासुरने रुद्रदेवको बहुत कष्ट पहुँचाया—यह जानकर रेवतीमें अनुराग रखनेवाले श्रीहरिने उस असुरका विनाश किया (यही आठवाँ संग्राम है)। देवताओं और असुरोंके युद्धमें वृत्रका नाश करनेके लिये भगवान् विष्णु जलके फेन होकर इन्द्रके वज्रमें लग गये। इस प्रकार उन्होंने देवराज इन्द्र और देवधर्मका पालन करनेवाले देवताओंको संकटसे बचाया। ('जित्' नामक दसवाँ संग्राम वह है, जब कि) भगवान् श्रीहरिने परशुराम अवतार धारण कर शाल्व आदि दानवोंपर विजय पायी और दुष्ट क्षत्रियोंका विनाश करके देवता आदिकी रक्षा की। (ग्यारहवें संग्रामके समय) मधुसूदनने हालाहल विषके रूपमें प्रकट हुए दैत्यका शंकरजीके द्वारा नाश कराकर देवताओंका भय दूर किया। देवासुर-संग्राममें जो 'कोलाहल' नामका दैत्य
५५८ * अग्निपुराण *
था, उसको परास्त करके भगवान् विष्णुने धर्मपालनपूर्वक सम्पूर्ण देवताओंकी रक्षा की। राजा, राजकुमार, मुनि और देवता—सभी भगवान्के स्वरूप हैं। मैंने यहाँ जिनको बतलाया और जिनका नाम नहीं लिया, वे सभी श्रीहरिके ही अवतार हैं॥ १६–२५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'द्वादश-संग्रामोंका वर्णन' नामक दो सौ छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७६॥
दो सौ सतहत्तरवाँ अध्याय
तुर्वसु आदि राजाओंके वंशका तथा अङ्गवंशका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ! तुर्वसुके पुत्र वर्ग और वर्गके पुत्र गोभानु हुए। गोभानुसे त्रैशानि, त्रैशानिसे करंधम और करंधमसे मरुत्तका जन्म हुआ। उनके पुत्र दुष्मन्त हुए। दुष्मन्तसे वरूथ और वरूथसे गाण्डीरकी उत्पत्ति हुई। गाण्डीरसे गान्धार हुए। गान्धारके पाँच पुत्र हुए, जिनके नामपर गन्धार, केरल, चोल, पाण्ड्य और कोल—इन पाँच देशोंकी प्रसिद्धि हुई। ये सभी महान् बलवान् थे। द्रुह्युसे बभ्रुसेतु और बभ्रुसेतुसे पुरोवसुका जन्म हुआ। उनसे गान्धार नामक पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई। गान्धारोंने धर्मको जन्म दिया और धर्मसे घृत उत्पन्न हुए। घृतसे विदुष और विदुषसे प्रचेता हुए। प्रचेताके सौ पुत्र हुए, जिनमें अनडु, सुभानु, चाक्षुष और परमेषु—ये प्रधान थे। सुभानुसे कालानल और कालानलसे सृञ्जय उत्पन्न हुए। सृञ्जयके पुरञ्जय और पुरञ्जयके पुत्र जनमेजय थे। जनमेजयके पुत्र महाशाल और उनके पुत्र महामना हुए। ब्रह्मन्! महामनासे उशीनरका जन्म हुआ और महामनाकी 'नृगा' नामवाली पत्नीके गर्भसे राजा नृगका जन्म हुआ। नृगकी 'नरा' नामक पत्नीसे नरकी उत्पत्ति हुई और कृमि नामवाली स्त्रीके गर्भसे कृमिका जन्म हुआ। इसी प्रकार नृगके दशा नामकी पत्नीसे सुव्रत और दृषद्वतीसे शिवि उत्पन्न हुए। शिविके चार पुत्र हुए—पृथुदर्भ, वीरक, कैकेय और भद्रक—इन चारोंके नामसे श्रेष्ठ जनपदोंकी प्रसिद्धि हुई। उशीनरके पुत्र तितिक्षु हुए, तितिक्षुसे रुषद्रथ, रुषद्रथसे पैल और पैलसे सुतपा नामक पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई। सुतपासे महायोगी बलिका जन्म हुआ। बलिसे अङ्ग, वङ्ग, मुख्यक, पुण्ड्र और कलिङ्ग नामक पुत्र उत्पन्न हुए। ये सभी 'बालेय' कहलाये। बलि योगी और बलवान् थे। अङ्गसे दधिवाहन, दधिवाहनसे राजा दिविरथ और दिविरथसे धर्मरथ उत्पन्न हुए। धर्मरथके पुत्रका नाम चित्ररथ हुआ। चित्ररथके सत्यरथ और उनके पुत्र लोमपाद हुए। लोमपादका पुत्र चतुरङ्ग और चतुरङ्गका पुत्र पृथुलाक्ष हुआ। पृथुलाक्षसे चम्प, चम्पसे हर्यङ्ग और हर्यङ्गसे भद्ररथ हुआ। भद्ररथके पुत्रका नाम बृहत्कर्मा था। बृहत्कर्मासे बृहद्भानु, बृहद्भानुसे बृहदात्मवान्, उनसे जयद्रथ और जयद्रथसे बृहद्रथकी उत्पत्ति हुई। बृहद्रथसे विश्वजित् और विश्वजित्का पुत्र कर्ण हुआ। कर्णका वृषसेन और वृषसेनका पुत्र पृथुसेन था। ये अङ्गवंशमें उत्पन्न राजा बतलाये गये। अब मुझसे पूरुवंशका वर्णन सुनो॥ १–१७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'राजवंशका वर्णन' नामक दो सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७७॥
- अध्याय २७८ * ५५९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
दो सौ अठहत्तरवाँ अध्याय
पूरुवंशका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ! पूरुसे जनमेजय हुए, जनमेजयसे प्राचीवान् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। प्राचीवान्से मनस्यु और मनस्युसे राजा वीतमयका जन्म हुआ। वीतमयसे शुन्धु हुआ, शुन्धुसे बहुविध नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। बहुविधसे संयाति और संयातिका पुत्र रहोवादी हुआ। रहोवादीके पुत्रका नाम भद्राश्व था। भद्राश्वके दस पुत्र हुए—ऋचेयु, कृषेयु, संनतेयु, घृतेयु, चितेयु, स्थण्डिलेयु, धर्मेयु, संनतेयु (दूसरा), कृतेयु और मतिनार। मतिनारके तंसुरोध, प्रतिरथ और पुरस्त—ये तीन पुत्र हुए। प्रतिरथसे कण्व और कण्वसे मेधातिथिका जन्म हुआ। तंसुरोधसे चार पुत्र उत्पन्न हुए—दुष्यन्त, प्रवीरक, सुमन्त और वीरवर अनय। दुष्यन्तसे भरतका जन्म हुआ। भरत शकुन्तलाके महाबली पुत्र थे। राजा भरतके नामपर उनके वंशज क्षत्रिय 'भारत' कहलाते हैं। भरतके पुत्र अपनी माताओंके क्रोधसे नष्ट हो गये, तब राजाके यज्ञ करनेपर मरुद्गणोंने बृहस्पतिके पुत्र भरद्वाजको ले आकर उन्हें पुत्ररूपसे अर्पण किया। (भरतवंश 'वितथ' हो रहा था, ऐसे समयमें भरद्वाज आये, अतः) वे 'वितथ' नामसे प्रसिद्ध हुए। वितथने पाँच पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम ये हैं—सुहोत्र, सुहोता, गय, गर्भ तथा कपिल। इनके सिवा उनसे महात्मा और सुकेतु—ये दो पुत्र और उत्पन्न हुए। तत्पश्चात् उन्होंने कौशिक और गृत्सपतिको भी जन्म दिया। गृत्सपतिके अनेक पुत्र हुए, उनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—सभी थे। काश और दीर्घतमा भी उन्हींके पुत्र थे। दीर्घतमाके धन्वन्तरि हुए और धन्वन्तरिका पुत्र केतुमान् हुआ। केतुमान्से हिमरथका जन्म हुआ, जो 'दिवोदास'के नामसे भी प्रसिद्ध हैं। दिवोदाससे प्रतर्दन तथा प्रतर्दनसे भर्ग और वत्स नामक दो पुत्र हुए। वत्ससे अनर्क और अनर्कसे क्षेमककी उत्पत्ति हुई। क्षेमकके वर्षकेतु और वर्षकेतुके पुत्र विभु बतलाये गये हैं। विभुसे आनर्त और सुकुमार नामक पुत्र उत्पन्न हुए। सुकुमारसे सत्यकेतुका जन्म हुआ। राजा वत्ससे वत्सभूमि नामक पुत्रकी भी उत्पत्ति हुई थी। वितथकुमार सुहोत्रसे बृहत् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। बृहत्के तीन पुत्र हुए—अजमीढ, द्वीमीढ और पराक्रमी पुरुमीढ। अजमीढकी केशिनी नामवाली पत्नीके गर्भसे प्रतापी जह्नुका जन्म हुआ। जह्नुसे अजकाश्वकी उत्पत्ति हुई और अजकाश्वका पुत्र बलाकाश्व हुआ। बलाकाश्वके पुत्रका नाम कुशिक हुआ। कुशिकसे गाधि उत्पन्न हुए, जिन्होंने इन्द्रत्व प्राप्त किया था। गाधिसे सत्यवती नामकी कन्या और विश्वामित्र नामक पुत्रका जन्म हुआ। देवरात और कतिमुख आदि विश्वामित्रके पुत्र हुए। अजमीढसे शुनःशेप और अष्टक नामवाले अन्य पुत्रोंकी भी उत्पत्ति हुई। उनकी नीलिनी नामवाली पत्नीके गर्भसे एक और पुत्र हुआ, जिसका नाम शान्ति था। शान्तिसे पुरुजाति, पुरुजातिसे बाह्याश्व और बाह्याश्वसे पाँच राजा उत्पन्न हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं— मुकुल, सृञ्जय, राजा बृहदिषु, यवीनर और कृमिल।—ये 'पाञ्चाल' नामसे विख्यात हुए। मुकुलके वंशज 'मौकुल्य' कहलाये। वे क्षात्रधर्मसे युक्त ब्राह्मण हुए। मुकुलसे चञ्चाश्वका जन्म हुआ और चञ्चाश्वसे एक पुत्र और एक जुड़वीं संतान पैदा हुई। पुत्रका नाम दिवोदास था और कन्याका अहल्या। अहल्याके गर्भसे शरद्वत (गौतम)-द्वारा
५६० * अग्निपुराण *
शतानन्दकी उत्पत्ति हुई। शतानन्दसे सत्यधृक् हुए। सत्यधृक्से भी दो जुड़वीं सन्तानें पैदा हुईं। उनमें पुत्रका नाम कृप और कन्याका नाम कृपी था। दिवोदाससे मैत्रेय और मैत्रेयसे सोमक हुए। सृञ्जयसे पञ्चधनुषकी उत्पत्ति हुई। उनके पुत्रका नाम सोमदत्त था। सोमदत्तसे सहदेव, सहदेवसे सोमक और सोमकसे जन्तु हुए। जन्तुके पुत्रका नाम पृषत् हुआ। पृषत्से द्रुपदका जन्म हुआ तथा द्रुपदका पुत्र धृष्टद्युम्न था और धृष्टद्युम्नसे धृष्टकेतुकी उत्पत्ति हुई। महाराज अजमीढकी धूमिनी नामवाली पत्नीसे ऋक्ष नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ १—२५॥
ऋक्षसे संवरण और संवरणसे कुरुका जन्म हुआ, जिन्होंने प्रयागसे जाकर कुरुक्षेत्र तीर्थकी स्थापना की। कुरुसे सुधन्वा, सुधनु, परीक्षित् और रिपुञ्जय—ये चार पुत्र हुए। सुधन्वासे सुहोत्र और सुहोत्रसे च्यवन उत्पन्न हुए। च्यवनकी पत्नी महारानी गिरिकाके वसुश्रेष्ठ उपरिचरके अंशसे सात पुत्र उत्पन्न हुए। उनके नाम इस प्रकार हैं— बृहद्रथ, कुश, वीर, यदु, प्रत्यग्रह, बल और मत्स्यकाली। राजा बृहद्रथसे कुशाग्रका जन्म हुआ। कुशाग्रसे वृषभकी उत्पत्ति हुई और वृषभके पुत्रका नाम सत्यहित हुआ। सत्यहितसे सुधन्वा, सुधन्वासे ऊर्ज, ऊर्जसे सम्भव और सम्भवसे जरासंध उत्पन्न हुआ। जरासंधके पुत्रका नाम सहदेव था। सहदेवसे उदापि और उदापिसे श्रुतकर्माकी उत्पत्ति हुई। कुरुनन्दन परीक्षित्के पुत्र जनमेजय हुए। वे बड़े धार्मिक थे। जनमेजयसे त्रसदस्युका जन्म हुआ। राजा अजमीढके जो जह्नु नामवाले पुत्र थे, उनके सुरथ, श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन—ये चार पुत्र उत्पन्न हुए। परीक्षित्कुमार जनमेजयके दो पुत्र और हुए—सुरथ तथा महिमान्। सुरथसे विदूरथ और विदूरथसे ऋक्ष हुए। इस वंशमें ये ऋक्ष नामसे प्रसिद्ध द्वितीय राजा थे। इनके पुत्रका नाम भीमसेन हुआ। भीमसेनके पुत्र प्रतीप और प्रतीपके शांतनु हुए। शांतनुके देवापि, बाह्लिक और सोमदत्त—ये तीन पुत्र थे। बाह्लिकसे सोमदत्त और सोमदत्तसे भूरि, भूरिश्रवा तथा शलका जन्म हुआ। शांतनुसे गङ्गाजीके गर्भसे भीष्म उत्पन्न हुए तथा उनकी काल्या (सत्यवती) नामवाली पत्नीसे विचित्रवीर्यकी उत्पत्ति हुई। विचित्रवीर्यकी पत्नीके गर्भसे श्रीकृष्णद्वैपायनने धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरको जन्म दिया। पाण्डुकी रानी कुन्तीके गर्भसे युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन—ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए तथा उनकी माद्री नामवाली पत्नीसे नकुल और सहदेवका जन्म हुआ। पाण्डुके ये पाँच पुत्र देवताओंके अंशसे प्रकट हुए थे। अर्जुनके पुत्रका नाम अभिमन्यु था। वे सुभद्राके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। अभिमन्युसे राजा परीक्षित्का जन्म हुआ। द्रौपदी पाँचों पाण्डवोंकी पत्नी थी। उसके गर्भसे युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, भीमसेनसे सुतसोम, अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, सहदेवसे श्रुतशर्मा और नकुलसे शतानीककी उत्पत्ति हुई। भीमसेनका एक दूसरा पुत्र भी था, जो हिडिम्बाके गर्भसे उत्पन्न हुआ था। उसका नाम था घटोत्कच। ये भूतकालके राजा हैं। भविष्यमें भी बहुत-से राजा होंगे, जिनकी कोई गणना नहीं हो सकती। सभी समयानुसार कालके गालमें चले जाते हैं। विप्रवर! काल भगवान् विष्णुका ही स्वरूप है, अतः उन्हींका पूजन करना चाहिये। उन्हींके उद्देश्यसे अग्निमें हवन करो; क्योंकि वे भगवान् ही सब कुछ देनेवाले हैं॥ २६—४१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कुरुवंशका वर्णन' नामक दो सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७८॥
* अध्याय २७९ * ५६१
दो सौ उनासीवाँ अध्याय¹
सिद्ध ओषधियोंका वर्णन
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! अब मैं आयुर्वेदका वर्णन करूँगा, जिसे भगवान् धन्वन्तरिने सुश्रुतसे कहा था। यह आयुर्वेदका सार है और अपने प्रयोगोंद्वारा मृतकको भी जीवन प्रदान करनेवाला है॥ १॥
**सुश्रुतने कहा—**भगवन्! मुझे मनुष्य, घोड़े और हाथीके रोगोंका नाश करनेवाले आयुर्वेद-शास्त्रका उपदेश कीजिये। साथ ही सिद्ध योगों, सिद्ध मन्त्रों और मृतसंजीवनकारक औषधोंका भी वर्णन कीजिये॥ २॥
**धन्वन्तरि बोले—**सुश्रुत! वैद्य ज्वराक्रान्त व्यक्तिके बलकी रक्षा करते हुए, अर्थात् उसके बलपर ध्यान रखते हुए लङ्घन (उपवास) करावे। तदनन्तर उसे सोंठसे युक्त लाल मण्ड (धानके लावेका माँड़) तथा नागरमोथा, पित्तपापड़ा, खस, लालचन्दन, सुगन्धबाला और सोंठके साथ शृत (अर्धपक्व) जलको प्यास और ज्वरकी शान्तिके लिये दे। छः² दिन बीत जानेके बाद चिरायता-जैसे द्रव्योंका काढ़ा अवश्य दे॥ ३-४॥
ज्वर निकालनेके लिये (आवश्यकता हो तो) स्वेदन (पसीना) करावे। रोगीके दोष (वातादि) जब शान्त हो जायें, तब विरेचन-द्रव्य देकर विरेचन कराना चाहिये। साठी, तिन्नी, लाल अगहनी और प्रमोद्क (धान्यविशेष)-के तथा ऐसे ही अन्य धान्योंके भी पुराने चावल ज्वरमें (ज्वरकालमें मण्ड आदिके लिये) हितकर होते हैं। यवके बने (बिना भूसीके) पदार्थ भी लाभदायक हैं। मूँग, मसूर, चना, कुलथी, मोंठ, अरहर, खेखशा, कायफर, उत्तम फलके सहित परवल, नीमकी छाल, पित्तपापड़ा एवं अनार भी ज्वरमें हितकारक होते हैं॥ ५-७॥
रक्तपित्त नामक रोग यदि अधोग (नीचेकी गतिवाला) हो तो वमन हितकर होता है तथा ऊर्ध्वग (ऊपरकी ओर गतिवाला) हो तो विरेचन लाभदायक होता है। इसमें बिना सोंठके षडङ्ग (मुस्तपर्पटकोशीरचन्दनोदीच्य—नागरमोथा, पित्तपापड़ा, खस, चन्दन एवं सुगन्धबाला)-से बना क्वाथ देना चाहिये। इस रोगमें (जौका) सत्तू, गेहूँका आटा, धानका लावा, जौके बने विभिन्न पदार्थ, अगहनी धानका चावल, मसूर, मोंठ, चना और मूँग खानेयोग्य हैं। घी एवं दूधसे तैयार किये गये गेहूँके पदार्थ—दलिया, हलुवा आदि भी लाभकारी होते हैं। बलवर्धक रस तथा छोटी मक्खियोंका मधु भी हितकर होता है। अतिसारमें पुराना अगहनीका चावल लाभदायक होता है॥ ८-१०॥
गुल्मरोगमें जो अन्न कफकारक न हो तथा पठानी लोधकी छालके क्वाथसे सिद्ध किया गया हो, वही देना चाहिये। उस रोगमें वायुकारक अन्नको त्याग दे एवं वायुसे रोगीको बचाये। रोगको मिटानेके लिये यह प्रयत्न सर्वथा करनेयोग्य है॥ ११॥
उदर-रोगमें दूधके साथ बाटी खाय। घीसे पकाया हुआ बथुआ, गेहूँ, अगहनी चावल तथा
१. दो सौ उनासीवें अध्यायसे वैद्यक अथवा आयुर्वेदका प्रकरण आरम्भ होता है। इसका संशोधन वाराणसेय संस्कृत वि० वि० वाराणसी आयुर्वेदविभागके प्राध्यापक आचार्य पं० श्रीगोमतीप्रसादजीने किया है। आप सुप्रसिद्ध आयुर्वेदधन्वन्तरि स्व० पं० श्रीसत्यनारायणजी शास्त्रीके शिष्य हैं।
२. छः दिन उपलक्षणमात्र है। जबतक ज्वरकी सामता (अपरिपक्वावस्था) रहे, तबतक प्रतीक्षा करके जब उसकी निरामता (परिपक्वावस्था) हो जाय, तब तिक्त (चिरायता आदि) दे।
५६२ * अग्निपुराण *
तिक्त औषध उदर-रोगियोंके लिये हितकर हैं॥ १२॥ गेहूँ, चावल, मूँग, पलाशबीज, खैर, हरें, पञ्चकोल (पिप्पली, पीपलामूल, चाभ, चित्ता, सोंठ), जांगल-रस, नीमका पञ्चाङ्ग (फूल, पत्ती, फल, छाल एवं मूल), आँवला, परवल, बिजौरा नीबूका रस, काला या सफेद जीरा, (पाठान्तरके अनुसार चमेलीकी पत्ती), सूखी मूली तथा सेंधा नमक—ये कुष्ठ रोगियोंके लिये हितकारक हैं। पीनेके लिये खदिरोदक (खैर मिलाकर तैयार किया गया जल) प्रशस्त माना गया है। पेया बनानेके लिये मसूर एवं मूँगका प्रयोग होना चाहिये। खानेके लिये पुराने चावलका उपयोग उचित है। नीम तथा पित्तपापड़ाका शाक और जांगल-रस—ये सब कुष्ठमें हितकर होते हैं। बायबिडङ्ग, काली मिर्च, मोथा, कूट, पठानी लोध, हुरहुर, मैनसिल तथा वच—इन्हें गोमूत्रमें पीसकर लगानेसे कुष्ठरोगका नाश होता है॥ १३–१६॥
प्रमेहके रोगियोंके लिये पूआ, कूट, कुल्माष (घुघुरी) और जौ आदि लाभदायक हैं। जौके बने भोज्य पदार्थ, मूँग, कुलथी, पुराना अगहनीका चावल, तिक्त-रूक्ष एवं तिक्त हरे शाक हितकर हैं। तिल, सहजन, बहेड़ा और इंगुदीके तेल भी लाभदायक हैं॥ १७-१८॥
मूँग, जौ, गेहूँ, एक वर्षतक रखे हुए पुराने धानका चावल तथा जांगल-रस—ये राजयक्ष्माके रोगियोंके भोजनके लिये प्रशस्त हैं॥ १९॥
श्वास-कास (दमा और खाँसी)-के रोगियोंको कुलथी, मूँग, रास्ना, सूखी मूली, मूँगका पूआ, दही और अनारके रससे सिद्ध किये गये विष्किर, जांगल-रस, बिजौरेका रस, मधु, दाख और व्योष (सोंठ, मिर्च, पीपल)-से संस्कृत जौ, गेहूँ और चावल खिलाये। दशमूल, बला (बरियार या खरेटी), रास्ना और कुलथीसे बनाये गये तथा पूपरससे युक्त क्वाथ श्वास और हिचकीका कष्ट दूर करनेवाले हैं॥ २०–२२॥
सूखी मूली, कुलथी, मूल (दशमूल), जांगल-रस, पुराना जौ, गेहूँ और चावल खसके साथ लेना चाहिये। इससे भी श्वास और कासका नाश होता है। शोथमें गुड़सहित हरें या गुड़सहित सोंठ खानी चाहिये। चित्रक तथा मट्ठा—दोनों ग्रहणी रोगके नाशक हैं॥ २३–२४॥
निरन्तर वातरोगसे पीड़ित रहनेवालोंके लिये पुराना जौ, गेहूँ, चावल, जांगल-रस, मूँग, आँवला, खजूर, मुनक्का, छोटी बेर, मधु, घी, दूध, शक्र (इन्द्रयव), नीम, पित्तपापड़ा, वृष (बलकारक द्रव्य) तथा तक्रारिष्ट हितकर हैं॥ २५-२६॥
हृदयके रोगी विरेचन-योग्य होते हैं अर्थात् उनका विरेचन कराना चाहिये। हिचकीवालोंके लिये पिप्पली हितकर है। छाछ-आरनाल, सीधु तथा मोती ठंडे जलसे लें। यह हिक्का (हिचकी) रोगोंमें विशेष लाभप्रद है॥ २७॥
मदात्यय-रोगमें मोती, नमकयुक्त जीरा तथा मधु हितकर हैं। उरःक्षत रोगी मधु और दूधसे लाहको लेवे। मांस-रस (जटामांसीके रस)-के आहार और अग्निसंरक्षण (बुभुक्षा-वर्द्धक भोगों)-से क्षयको जीते। क्षयरोगीके लिये भोजनमें लाल अगहनी धानका चावल, नीवार, कलम (रोपा धान) आदि हितकारी हैं॥ २८-२९॥
अर्श (बवासीर)-में यवान्न-विकृति, नीम, मांस (जटामांसी), शाक, संचर नमक, कचूर, हरें, माँड तथा जल मिलाया हुआ मट्ठा हितकारक है॥ ३०॥
मूत्रकृच्छ्रमें मोथा, हल्दीके साथ चित्रकका लेप, यवान्न-विकृति, शालिधान्य, बथुआ, सुवर्चल (संचर नमक), त्रपु (लाह), दूध, ईखके रस और घीसे युक्त गेहूँ—ये खानेके लिये लाभकारी हैं तथा पीनेके लिये मण्ड और सुरा आदि देने
- अध्याय २७९ * ५६३
चाहिये॥ ३१-३२ ॥
छर्दि (कै, वमन)-के लिये लाजा (लावा), सत्तू, मधु, परूषक (फालसा), बैगनका भर्ता, शिखि-पंख (मोरकी पाँख) तथा पानक (विशेष प्रकारका पेय) लाभदायक है॥ ३३ ॥
अग्रहनीके चावलका जल, गरम या शीत-गरम दूध तृष्णाका नाशक है। मोथा और गुड़से बनी हुई गुटिका (गोली) मुखमें रखी जाय तो तृष्णानाशक है। यवान्न-विकृति, पूप (पूआ), सूखी मूली, परवलका शाक, वेत्राग्र (बेंतके अग्रभागका नरम हिस्सा) और करेल ऊरुस्तम्भ (जाँघके जकड़ने)-का विनाशक है। विसर्पी (फोड़े-फुंसी आदिके रूपमें सारे शरीरमें फैलनेवाले रोगका रोगी) मूँग, अरहर, मसूरके यूष, तिलयुक्त जांगल-रस, सेंधा नमकसहित घृत, दाख, सोंठ, आँवला और उन्नावके यूषके साथ पुराने गेहूँ, जौ और अगहनी धानके चावल आदि अन्नका सेवन करे तथा चीनीके साथ मधु, मुनक्का एवं अनारसे बना जल पीये॥ ३४-३७ ॥
वातरक्तके रोगीके लिये लाल साठीका चावल, गेहूँ, यव, मूँग आदि हलका अन्न देवे। काकमाची (काली मकोय), वेत्राग्र, बथुआ, सुवर्चला आदि शाक देवे। मधु और मिश्रीसहित जल पिलावे। नासिकाके रोगोंमें दूर्वासे सिद्ध घृत लाभदायक है। आँवलेके रससे या भृङ्गराजके रससे सिद्ध किये हुए तेलका नस्य दिया जाय तो वह सिरके समस्त कृमिरोगोंमें लाभप्रद है॥ ३८-४० ॥
विप्रवर! शीतल जलके साथ लिया गया अन्नपान और तिलोंका भक्षण दाँतोंको मजबूत बनानेवाला तथा परम तृप्तिकारक है। तिलके तेलसे किया गया कुल्ला दाँतोंको अधिक मजबूत करनेवाला है। सब प्रकारके कृमियोंके नाशके लिये बायबिडंगका चूर्ण तथा गोमूत्रका प्रयोग करे। आँवलेको घीमें पीसकर यदि उसका सिरपर लेपन किया जाय तो वह शिरोरोगके नाशके लिये उत्तम माना गया है। चिकना और गरम भोजन भी इसके लिये हितकर होता है॥ ४१-४३ ॥
द्विजोत्तम! कानमें दर्द हो तो बकरेके मूत्र तथा तेलसे कानोंको भर देना उत्तम है। यह कर्णशूलका नाश करनेवाला है। सब प्रकारके सिरके भी इस रोगमें लाभदायक हैं। गिरिमृत्तिका (पहाड़ी मिट्टी), सफेद चन्दन, लाख, मालतीकलिका (चमेलीकी कली) सबको पीसकर बनायी हुई बत्ती उरःक्षत तथा शुक्र-दोषोंको नष्ट करती है। व्योष (सोंठ, काली मिर्च, पीपल) और त्रिफला (आँवला, हर्रा, बहेड़ा) तथा तूतिया थोड़ा जल मिलाकर आँखमें डाले। यह और रसाञ्जन (रसोत) भी आँखके सब रोगोंका नाश करनेवाला है। लोध्र, काँजी और सेंधा नमकको घीमें भूनकर शिलापर पीसकर आँखोंपर लेप करनेसे सब प्रकारके नेत्र-रोगोंमें लाभ होता है। आश्च्योतन (आँसू गिरना) तो बंद ही हो जाता है। गिरिमृत्तिका और सफेद चन्दनका बाहरी लेप आँखोंको लाभ पहुँचाता है तथा नेत्र-रोगोंके नाशके लिये त्रिफलाका सदा सेवन करे (उसके जलसे आँखोंको धोना उत्तम माना गया है)॥ ४४-४८ ॥
दीर्घजीवी होनेकी इच्छावालेको रातमें त्रिफला घृत-मधुके साथ खाना चाहिये। शतावरी-रसमें सिद्ध दूध तथा घी वृष्य है (बलकारक एवं आयुवर्धक है)। कलम्बिका (करमीका शाक) और उड़द भी वृष्य होते हैं। दूध एवं घृत भी वृष्य हैं। पूर्ववत् मुलहठीके सहित त्रिफला आयुको बढ़ानेवाली है। महुवाके फूलके रसके साथ त्रिफला ली जाय तो वह बुढ़ापाके चिह्न—झुर्री पड़ने और बालोंके पकने-गिरने आदिका निवारण करती है॥ ४९-५० ½ ॥
५६४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
विप्रवर! वचसे सिद्ध घृत भूतदोषका नाश करनेवाला है। उसका कव्य बुद्धिको देनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। खरेटीके (पत्थरपर पीसे हुए) कल्कसे सिद्ध क्वाथद्वारा बनाया हुआ अञ्जन नेत्रोंके लिये हितकारी है। रास्ना या सहचरी (झिण्टी)-से सिद्ध तैल वात-रोगियोंके लिये हितकर है। जो अन्न श्लेष्माकारी न हो, वह व्रणरोगोंमें श्रेष्ठ माना गया है। सक्तुपिण्डी तथा आमड़ा पाचनके लिये श्रेष्ठ हैं। नीमका चूर्ण घावके भेदन (फोड़ने)-में तथा रोपण (घाव भरने)-में श्रेष्ठ है। उसी प्रकार सूच्युपचार (सूची-कर्म) भी व्रणको फोड़ने या बहानेमें सहायक हैं। बलिकर्मविशेषसे सूतिकाको लाभ होता है तथा रक्षा-कर्म प्राणियोंके लिये सदा हित करनेवाला है। नीमके पत्तोंको खाना साँपसे डँसे हुएकी दवा है। (पीसकर लगाया हुआ) पाताल नीमका पत्ता, पुराना तैल अथवा पुराना घी केशके लिये हितकर होते हैं॥ ५१-५६॥
जिसे बिच्छूने काटा हो, उसके लिये मोरपंख और घृतका धूम लाभदायक है। अथवा आकके दूधसे पीसे हुए पलाशबीजका लेप करनेसे बिच्छूका जहर उतर जाता है। बिच्छूके काटे हुएको पीपल या बड़ी हरड़ जायफलके साथ पिलाये। आकका दूध, तिल, तैल, पलल और गुड़—इनको समान मात्रामें लेकर पिलानेसे कुत्तेका भयंकर विष शीघ्र ही दूर होता है। चौराईका मूल और निशोथ समान मात्रामें घीके साथ पीनेसे मनुष्य अतिबलवान् सर्पविष और कीटोंके विषोंपर भी शीघ्र ही काबू पा लेता है। श्वेत चन्दन, पद्माख, कूठ, लताम्बु (जूहीका पानी), उशीर (खस), पाटला, निर्गुण्डी, शारिवा, सेलु (सेरुकी)—ये मकड़ीके विषका नाश करनेवाले औषध हैं। द्विजश्रेष्ठ! गुड़सहित सोंठ शिरोविरेचनके लिये हितकारक हैं॥ ५७-६१॥
स्नेहपानमें तथा वस्तिकर्ममें तैल और घृत सर्वोत्तम है। अग्नि पसीना करानेमें तथा शीतजल स्तम्भनमें श्रेष्ठ हैं। इसमें संशय नहीं कि निशोथ रेचनमें श्रेष्ठ है और मैनफल वमनमें। वस्ति, विरेचन एवं वमन, तैल, घृत एवं मधु—ये तीन क्रमशः वात, पित्त एवं कफके परम औषध हैं॥ ६२-६३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सिद्ध ओषधियोंका वर्णन' नामक दो सौ उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७९॥
दो सौ अस्सीवाँ अध्याय
सर्वरोगहर औषधोंका वर्णन
भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं—सुश्रुत! शारीर, मानस, आगन्तुक और सहज—ये चार प्रकारकी व्याधियाँ हैं। ज्वर और कुष्ठ आदि 'शारीर' रोग हैं, क्रोध आदि 'मानस' रोग हैं, चोट आदिसे उत्पन्न रोग 'आगन्तुक' कहे जाते हैं तथा भूख, बुढ़ापा आदि 'सहज' (स्वाभाविक) रोग हैं। 'शारीर' तथा 'आगन्तुक' व्याधिके नाशके लिये रविवारको ब्राह्मणकी पूजा करके उसे घृत, गुड़, नमक और सुवर्णका दान करे। जो सोमवारको ब्राह्मणके लिये उबटन देता है, वह सब रोगोंसे छूट जाता है। शनिवारको तैलका दान करे। आश्विनके महीनेमें गोरस—गायका घी, दूध और दही तथा अन्न देनेवाला सब रोगोंसे छुटकारा पा जाता है। घृत तथा दूधसे शिवलिङ्गको स्नान करानेसे मनुष्य रोगहीन हो जाता है। त्रिमधुर (शर्करा, गुड़, मधु)-में डुबायी हुई
* अध्याय २८० * ५६५
दूर्वाका गायत्री-मन्त्रसे हवन करनेपर मनुष्य सब रोगोंसे छूट जाता है। जिस नक्षत्रमें रोग पैदा हो, उसी शुभ नक्षत्रमें स्नान करे तथा बलि दे। भगवान् विष्णुका स्तोत्र 'मानस-रोग' आदिको हर लेनेवाला है। अब वात, पित्त एवं कफ—इन दोषोंका तथा रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र आदि धातुओंका वर्णन सुनो॥ १—६॥
सुश्रुत! खाया हुआ अन्न पक्वाशयसे दो भागोंमें विभक्त हो जाता है। एक अंशसे वह किट्ट होता है और दूसरे अंशसे रस। किट्टभाग मल है, जो विष्ठा, मूत्र तथा स्वेदरूपमें परिणत होता है। वही नेत्रमल, नासामल, कर्णमल तथा देहमल कहलाता है। रस अपने समस्त भागसे रुधिररूपमें परिणत हो जाता है। रुधिरसे मांस, मांससे मेद, मेदसे अस्थि, अस्थिसे मज्जा, मज्जासे शुक्र, शुक्रसे राग (रंग या वर्ण) तथा ओजस् उत्पन्न होता है। चिकित्सकको चाहिये कि देश, काल, पीड़ा, बल, शक्ति, प्रकृति तथा भेषजके बलको समझकर तदनुकूल चिकित्सा करे। औषध प्रारम्भ करनेमें रिक्ता (४, ९, १४) तिथि, भौमवार एवं मन्द, दारुण तथा उग्र नक्षत्रको त्याग देवे। विष्णु, गौ, ब्राह्मण, चन्द्रमा, सूर्य आदि देवोंकी पूजा करके रोगीके उद्देश्यसे निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करते हुए औषध प्रारम्भ करे—॥ ७—१२॥
ब्रह्मदक्षाश्विरुद्रेन्द्रभूचन्द्रार्कानिलानलाः ।
ऋषयश्चौषधीग्रामा भूतसंघाश्च पान्तु ते॥
रसायनमिवर्षीणां देवानाममृतं यथा।
सुधैवोत्तमानागानां भैषज्यमिदमस्तु ते॥
'ब्रह्मा, दक्ष, अश्विनीकुमार, रुद्र, इन्द्र, भूमि, चन्द्रमा, सूर्य, अनिल, अनल, ऋषि, ओषधिसमूह तथा भूतसमुदाय—ये तुम्हारी रक्षा करें। जैसे ऋषियोंके लिये रसायन, देवताओंके लिये अमृत तथा श्रेष्ठ नागोंके लिये सुधा ही उत्तम एवं गुणकारी है, उसी प्रकार यह औषध तुम्हारे लिये आरोग्यकारक एवं प्राणरक्षक हो'॥ १३-१४॥
देश— बहुत वृक्ष तथा अधिक जलवाला देश 'अनूप' कहलाता है। वह वात और कफ उत्पन्न करनेवाला होता है। जांगल देश 'अनूप' देशके गुण-प्रभावसे रहित होता है। थोड़े वृक्ष तथा थोड़े जलवाला देश 'साधारण' कहा जाता है। जांगल देश अधिक पित्त उत्पन्न करनेवाला तथा साधारण देश मध्यमपित्तका उत्पादक है॥ १५-१६॥
वात, पित्त, कफके लक्षण— वायु रूक्ष, शीत तथा चल है। पित्त उष्ण है तथा कटुत्रय (सोंठ, मिर्च, पीपली) पित्तकर हैं। कफ स्थिर, अम्ल, स्निग्ध तथा मधुर है। समान वस्तुओंके प्रयोगसे इनकी वृद्धि तथा असमान वस्तुओंके प्रयोगसे हानि होती है। मधुर, अम्ल एवं लवण रस कफकारक तथा वायुनाशक हैं। कटु, तिक्त एवं कषाय रस वायुकी वृद्धि करते हैं तथा कफनाशक हैं। इसी तरह कटु, अम्ल तथा लवण रस पित्त बढ़ानेवाले हैं। तिक्त, स्वादु (मधुर) तथा कषाय रस पित्तनाशक होते हैं। यह गुण या प्रभाव रसका नहीं, उसके विपाकका माना गया है। उष्णवीर्य कफनाशक तथा शीतवीर्य पित्तनाशक होते हैं। सुश्रुत! ये सब प्रभावसे ही वैसा कार्य करते हैं॥ १७—२१॥
शिशिर, वसन्त तथा शरदमें क्रमशः कफके चय, प्रकोप तथा प्रशमन बताये गये हैं। अर्थात् कफका चय शिशिर-ऋतुमें, प्रकोप वसन्त-ऋतुमें तथा प्रशमन ग्रीष्म-ऋतुमें होता है। सुश्रुत! वायुका संचय ग्रीष्ममें, प्रकोप वर्षा तथा रात्रिमें और शमन शरदमें कहा गया है। इसी प्रकार पित्तका संचय वर्षामें, प्रकोप शरदमें तथा शमन हेमन्तमें कहा गया है। वर्षासे हेमन्तपर्यन्त (वर्षा, शरद्, हेमन्त—ये) तीन ऋतुएँ 'विसर्ग-काल' कही गयी हैं तथा शिशिरसे ग्रीष्मपर्यन्त तीन
५६६ * अग्निपुराण *
ऋतुओंको (औषध लेनेके निमित्त) 'आदान (काल)' कहा गया है। विसर्ग-कालको 'सौम्य' और आदानकालको 'आग्नेय' कहा गया है। वर्षा आदि तीन ऋतुओंमें चलता हुआ चन्द्रमा ओषधियोंमें क्रमशः अम्ल, लवण तथा मधुर रसोंको उत्पन्न करता है। शिशिर आदि तीन ऋतुओंमें विचरता हुआ सूर्य क्रमशः तिक्त, कषाय तथा कटु रसोंको बढ़ाता है। रातें ज्यों-ज्यों बढ़ती हैं, त्यों-त्यों ओषधियोंका बल बढ़ता है॥ २२-२८॥
जैसे-जैसे रातें घटती हैं, वैसे-वैसे मनुष्योंका बल क्रमशः घटता है। रातमें, दिनमें तथा भोजनके बाद, आयुके आदि, मध्य और अवसान-कालमें कफ, पित्त एवं वायु प्रकुपित होते हैं। प्रकोपके आदिकालमें इनका संचय होता है तथा प्रकोपके बाद इनका शमन कहा गया है। विप्रवर! अधिक भोजन और अधिक उपवाससे तथा मल-मूत्र आदिके वेगोंको रोकनेसे सभी रोग उत्पन्न होते हैं। इसलिये पेटके दो भागोंको अन्नसे तथा एक भागको जलसे पूरा करे। अवशिष्ट एक भागको वायु आदिके संचरणके लिये रिक्त रखे। व्याधिका निदान तथा विपरीत औषध करना चाहिये, इन सबका सार यही है, जो मैंने बतलाया है॥ २९-३३ $\frac{१}{२}$॥
नाभिके ऊपर पित्तका स्थान है तथा नीचे श्रोणी एवं गुदाको वातका स्थान कहा गया है। तथापि ये सभी समस्त शरीरमें घूमते हैं। उनमें भी वायु विशेषरूपसे सम्पूर्ण शरीरमें संचरण करती है। (इस विषयका सुस्पष्ट वर्णन सुश्रुतमें इस प्रकार है-दोषस्थानान्यत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः। तत्र समासेन वातः श्रोणिगुदसंश्रयः, तदुपर्यधो नाभेः पक्वाशयः, पक्वामाशयमध्यं पित्तस्य, आमाशयः श्लेष्मणः। (सुश्रुत, सूत्र-स्थान अध्याय २१, सूत्र) 'इसके बाद दोषोंके स्थानोंका वर्णन करूँगा-उनमें संक्षेपसे (रहस्य यह है कि) वायुका स्थान श्रोणि एवं गुदा है, उसके ऊपर एवं नाभि (ग्रहणी)-के नीचे पक्वाशय है, पक्वाशय एवं आमाशयके मध्यमें पित्तका स्थान है। श्लेष्माका स्थान आमाशय है')॥ ३४-३५॥
देहके मध्यमें हृदय है, जो मनका स्थान है। जो स्वभावतः दुर्बल, थोड़े बालवाला, चञ्चल, अधिक बोलनेवाला तथा विषमानल है-जिसकी जठराग्नि कभी ठीकसे पाचनक्रिया करती है, कभी नहीं करती तथा जो स्वप्नमें आकाशमें उड़नेवाला है, वह वात प्रकृतिका मनुष्य है। समय (अवस्था)-से पूर्व ही जिसके बाल पकने-झरने लगे, जो क्रोधी हो, जिसे पसीना अधिक होता हो, जो मीठी वस्तुएँ खाना पसंद करता हो और स्वप्नमें अग्निको देखनेवाला हो, वह पित्त प्रकृतिका है। जो दृढ़ अङ्गोंवाला, स्थिरचित्त, सुन्दर, कान्तियुक्त, चिकने केश तथा स्वप्नमें स्वच्छ जलको देखनेवाला है, वह कफ प्रकृतिवाला मनुष्य कहा जाता है। इसी प्रकार तामस, राजस तथा सात्त्विक-तीन प्रकारके मनुष्य होते हैं॥ ३६-३९॥
मुनिश्रेष्ठ! सभी मनुष्य वात, पित्त और कफवाले हैं। मैथुनसे और भारी काममें लगे रहनेसे रक्तपित्त होता है। कदन्नके भोजनसे तथा शोकसे वायु कुपित होती है। द्विजोत्तम! जलन पैदा करनेवाले पदार्थों तथा कटु, तिक्त, कषायरससे युक्त पदार्थोंके सेवनसे, मार्गमें चलनेसे तथा भयसे पित्त प्रकुपित होता है। अधिक जल पीनेवालों, भारी अन्न भोजन करनेवालों, खाकर तुरंत सो जानेवालों तथा आलसियोंका कफ प्रकुपित होता है। उत्पन्न हुए वातादि रोगोंको लक्षणोंसे जानकर उनका शमन करे॥ ४०-४३॥
अस्थिभङ्ग (हड्डियोंका टूटना या व्यथित होना), मुखका कसैला स्वाद होना, मुँह सूखना,
* अध्याय २८१ *
५६७
जँभाई आना तथा रोएँ खड़े हो जाना—ये वायुजनित रोगके लक्षण हैं। नाखून, आँखें एवं नस-नाड़ियोंका पीला हो जाना, मुखमें कड़वापन प्रतीत होना, प्यास लगना तथा शरीरमें दाह या गर्मी मालूम होना—ये पित्तव्याधिके लक्षण हैं॥ ४४-४५॥
आलस्य, प्रसेक (मुँहमें पानी आना), भारीपन, मुँहका मीठा होना, उष्णकी अभिलाषा (धूपमें या आगके पास बैठनेकी इच्छा होना या उष्णपदार्थोंको ही खानेकी कामना)—ये कफज व्याधिके लक्षण हैं। स्निग्ध और गरम-गरम भोजन करनेसे, तेलकी मालिशसे तथा तैल-पान आदिसे वातरोगका निवारण होता है। घी, दूध, मिश्री आदि एवं चन्द्रमाकी किरण आदि पित्तको दूर करता है। शहदके साथ त्रिफलाका तैल लेने तथा व्यायाम आदिसे कफका शमन होता है। सब रोगोंकी शान्तिके लिये भगवान् विष्णुका ध्यान एवं पूजन सर्वोत्तम औषध है॥ ४६-४८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सर्वरोगहर ओषधियोंका वर्णन' नामक दो सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८०॥
दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय
रस आदिके लक्षण*
भगवान् धन्वन्तरिने कहा—सुश्रुत! अब मैं ओषधियोंके रस आदिके लक्षणों और गुणोंका वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो। जो ओषधियोंके रस, वीर्य और विपाकको जानता है, वही चिकित्सक राजा आदिकी रक्षा कर सकता है॥ १॥
महाबाहो! मधुर, अम्ल और लवण रस चन्द्रमासे उत्पन्न कहे गये हैं। कटु, तिक्त एवं कषाय रस अग्निसे उत्पन्न माने गये हैं। द्रव्यका विपाक तीन प्रकारका होता है—कटु, अम्ल और लवणरूप। वीर्य दो प्रकारके कहे गये हैं—शीत और उष्ण। द्विजोत्तम! ओषधियोंका प्रभाव अकथनीय है। मधुर, तिक्त और कषायरस 'शीतवीर्य' कहे गये हैं एवं शेष रस 'उष्णवीर्य' माने गये हैं; किंतु गुडूची (गिलोय) तिक्तरसवाली होनेपर भी अत्यन्त वीर्यप्रद होनेसे उष्ण है॥ २-५॥
मानद! इसी प्रकार हरड़ कषायरससे युक्त होनेपर भी 'उष्णवीर्य' होती है तथा मांस (जटामांसी) मधुररससे युक्त होनेपर भी 'उष्णवीर्य' ही कहा गया है। लवण और मधुर—ये दोनों रस विपाकमें मधुर माने गये हैं। अम्लोष्णका विपाक भी मधुर होता है। शेष रस विपाकमें कटु हैं। इसमें संशय नहीं है कि विशेष वीर्ययुक्त द्रव्यके विपाकमें उसके प्रभावके कारण विपरीतता भी हो जाती है; क्योंकि शहद मधुर होनेपर भी विपाकमें कटु माना गया है॥ ६-८॥
द्रव्यसे सोलहगुना जल लेकर क्वाथ करे। प्रक्षिप्त द्रव्यसे चारगुना जल शेष रहनेपर (क्वाथको) छानकर पीवे। यह क्वाथके निर्माणकी विधि है। जहाँ क्वाथकी विधि न बतलायी गयी हो, वहाँ इसीको प्रमाण जानना चाहिये॥ ९॥
स्नेह (तैल या घृत) पाककी विधिमें स्नेहसे
* दो सौ इक्यासीवें अध्यायमें कथित 'रस, वीर्य, विपाक एवं प्रभावका वर्णन' विस्तारपूर्वक 'सुश्रुतसंहिता'के सूत्रस्थानके ४० एवं ४२ वें अध्यायोंमें तथा 'चरकसंहिता'के सूत्रस्थानके २६ वें अध्यायमें है। तदनुसार ही यहाँका वर्णन है।
| ५६८ | * अग्निपुराण * |
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चौगुना$^१$ कषाय (क्वथित द्रव्य) अथवा बराबर-बराबर तैल एवं विभिन्न द्रव्योंके क्वाथ लेने चाहिये। तैलका परिपाक तब समझना चाहिये, जब कि उसमें डाली हुई ओषधियाँ उफनते हुए तैलमें गलकर ऐसी हो जायँ, कि उन्हें ठंडा करके यदि हाथपर रगड़ा जाय तो उनकी बत्ती-सी बन जाय। विशेष बात यह है कि उस बत्तीका सम्बन्ध अग्निसे किया जाय तो चिड़चिड़ाहटकी प्रतीति न हो, तब सिद्धतैल मानना चाहिये॥ १०-११$\frac{१}{२}$॥
सुश्रुत! लेह्य (चाटनेयोग्य) औषधद्रव्योंमें भी इसीके समान प्रक्षेप आदि होते हैं। निर्मल तथा उचित औषध-प्रक्षेपद्वारा निर्मित क्वाथ उत्तम होता है (तथा उसका प्रयोग लेह्य आदिमें करना चाहिये)। चूर्णकी मात्रा एक अक्ष (तोला) और क्वाथकी मात्रा चार पल$^२$ है। यह मध्यम मात्रा (साधारण मात्रा) बतलायी गयी है। वैसे मात्राका परिमाण कोई निश्चित परिमाण नहीं है। महाभाग! रोगीकी अवस्था, बल, अग्नि, देश, काल, द्रव्य और रोगका विचार करके मात्राकी कल्पना होती है। उसमें सौम्य रसोंको प्रायः धातुवर्द्धक जानना चाहिये॥ १२-१५॥
मधुर रस तो विशेषतया शरीरके धातुओंकी वृद्धिके लिये जानना चाहिये। दोष, धातु और द्रव्य$^३$ समानगुणयुक्त होनेपर शरीरकी वृद्धि करते हैं और इसके विपरीत होनेपर क्षयकारक होते हैं। नरश्रेष्ठ! इस शरीरमें तीन प्रकारके उपस्तम्भ (खंभे) कहे गये हैं—आहार, मैथुन और निद्रा। मनुष्य इनके प्रति सदा सावधानी रखे। इनके पूर्णतया परित्याग या अत्यन्त सेवनसे शरीर क्षयको प्राप्त होता है। कृश शरीरका 'बृंहण' (पोषण), स्थूल शरीरका 'कर्षण' और मध्यम शरीरका 'रक्षण' करना चाहिये। ये शरीरके तीन भेद माने गये हैं। 'तर्पण' और 'अतर्पण'—इस प्रकार आहारादि उपक्रमोंके दो भेद होते हैं। मनुष्यको सदा 'हिताशी' होना चाहिये (हितकारी पदार्थोंको ही खाना चाहिये) और 'मिताशी' बनना चाहिये (परिमित भोजन करना चाहिये) तथा 'जीर्णाशी' होना चाहिये (पूर्वभुक्त अन्नका परिपाक हो जानेपर ही पुनः भोजन करना चाहिये)॥ १६-२०॥
नरश्रेष्ठ! ओषधियोंकी निर्माण-विधि पाँच प्रकारकी मानी गयी है—रस, कल्क, क्वाथ, शीतकषाय तथा फाण्ट। औषधोंको निचोड़नेसे 'रस' होता है, मन्थनसे 'कल्क' बनता है, औटानेसे 'क्वाथ' होता है, रात्रिभर रखनेसे 'शीत' और तत्काल जलमें कुछ गरम करके छान लेनेसे 'फाण्ट' होता है॥ २१-२२$\frac{१}{२}$॥
१. २८१ अध्यायके १० वें श्लोकमें दो प्रकारकी युक्तियाँ मिल रही हैं—(१) तैल-निर्माणमें तैलसे चौगुना कषाय, (२) तैलके समान। इसमें संशयकी कोई बात नहीं है, यदि एक ही प्रकारका कषाय मिलाना हो तो चौगुना चाहिये एवं यदि अनेक प्रकारके कषायोंका सम्मिश्रण करना हो तो तैलके बराबर-बराबर भी ले सकते हैं, किंतु एक बात ध्यानमें रहे कि योगमें कषाय तैलसे चतुर्गुण अवश्य होना चाहिये।
२. कलिङ्गमानसे एक 'पल' चार तोलेका होता है।
३. २८१ वें अध्यायके १६-१७ श्लोकोंपर विमर्श—
(१) सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्। (२) ह्रासहेतुर्विशेषश्च प्रवृत्तिरुभयस्य तु। (३) तुल्यार्थता हि सामान्यं विशेषस्तु विपर्ययः।
उक्त तीनों सूत्र 'चरकसंहिता', सूत्र-स्थानके हैं। तथा—'अष्टाङ्ग-हृदय'कार लिखते हैं—'वृद्धिः समानैः सर्वेषां विपरीतेर्विपर्ययः।'
उक्त पङ्क्तियोंका निष्कर्ष यही है कि समान द्रव्य, गुण या कर्मवाली वस्तुओंसे समान गुण-धर्मवाले रस-रक्तादिकी वृद्धि होती है तथा विपरीतसे इनका ह्रास होता है।
* अध्याय २८२ * ५६९
(इस प्रकार) चिकित्साके एक सौ आठ साधन हैं। जो वैद्य उनको जानता है, वह अजेय होता है। अर्थात् वह चिकित्सामें कहीं असफल नहीं होता है। वह ‘बाहुशौण्डिक’ कहा जाता है। आहार-शुद्धि अग्निके संरक्षण, संवर्द्धन एवं संशुद्धि आदिके लिये आवश्यक है; क्योंकि मनुष्योंके बलका अग्नि ही मूल आधार है। बलके लिये सैन्धव लवणसे युक्त त्रिफला, कान्तिप्रद उत्तम पेय, जाङ्गल-रस, सैन्धवयुक्त दही और दुग्ध तथा पिप्पली (पीपल)-का सेवन करना चाहिये॥ २३—२५॥
मनुष्यको चाहिये कि जो रस (या धातु आदि) अधिक हो गये, अर्थात् बढ़ गये हैं, उन्हें सम करे—साम्यावस्थामें लावे। वातप्रधान प्रकृतिके मनुष्यको अपनी परिस्थितिके अनुसार ग्रीष्म-ऋतुमें अङ्गमर्दन करना चाहिये। शिशिर-ऋतुमें साधारण या अधिक, वसन्त-ऋतुमें मध्यम और ग्रीष्म-ऋतुमें विशेषरूपसे अङ्गोंका मर्दन करे। पहले त्वचाका, उसके बाद मर्दन करनेयोग्य अङ्गका मर्दन करे॥ २६-२७॥
स्नायु एवं रुधिरसे परिपूर्ण शरीरमें अस्थिसमूह अत्यन्त मांसल-सा प्रतीत होता है। इसी प्रकार कंधे, बाहु, जानुद्वय तथा जङ्घाद्वय भी मांसल प्रतीत होते हैं। बुद्धिमान् मनुष्य शत्रुके समान इनका मर्दन करे। जत्रु (हँसलीका भाग), वक्षःस्थल (छाती) इन्हें पूर्ववत् साधारण प्रकारसे मले तथा समस्त अङ्ग-संधियोंको खूब मलकर उन्हें (अङ्ग-संधियोंको) फैला दे। किंतु उनका प्रसारण हठात् एवं क्रमविरुद्ध न करे। मनुष्य अजीर्णमें, भोजनोपरान्त और तत्काल जल पीकर परिश्रम न करे॥ २८—३०॥
दिनके चार भाग (प्रहर) होते हैं। प्रथम प्रहरार्धके व्यतीत हो जानेपर व्यायाम न करे। शीतल जलसे एक बार स्नान करे। उष्ण जल थकावटको दूर करता है। हृदयके श्वासको अवरुद्ध न करे। व्यायाम कफको नष्ट करता है तथा मर्दन वायुका नाश करता है। स्नान पित्ताधिक्यका शमन करता है। स्नानके पश्चात् धूपका सेवन प्रिय है। व्यायामका सेवन करनेवाले मनुष्य धूप और परिश्रमयुक्त कार्यको सहन करनेमें समर्थ होते हैं॥ ३१—३३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘रसादि लक्षणोंका वर्णन’ नामक दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८१॥
दो सौ बयासीवाँ अध्याय
आयुर्वेदोक्त वृक्ष-विज्ञान
धन्वन्तरि कहते हैं—सुश्रुत! अब मैं वृक्षायुर्वेदका वर्णन करूँगा। क्रमशः गृहके उत्तर दिशामें प्लक्ष (पाकड़), पूर्वमें वट (बरगद), दक्षिणमें आम्र और पश्चिममें अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष मङ्गल माना गया है। घरके समीप दक्षिण दिशामें उत्पन्न हुए काँटेदार वृक्ष भी शुभ हैं। आवास-स्थानके आसपास उद्यानका निर्माण करे अथवा सब ओरका भाग पुष्पित तिलोंसे सुशोभित करे॥ १-२॥
ब्राह्मण और चन्द्रमाका पूजन करके वृक्षोंका आरोपण करे। वृक्षारोपणके लिये तीनों उत्तरा, स्वाती, हस्त, रोहिणी, श्रवण और मूल—ये नक्षत्र अत्यन्त प्रशस्त हैं। उद्यानमें पुष्करिणी (बावली)-का निर्माण करावे और उसमें नदीके प्रवाहका प्रवेश करावे। जलाशयारम्भके लिये हस्त, मघा, अनुराधा, पुष्य, ज्येष्ठा, शतभिषा,
५७० * अग्निपुराण *
उत्तराषाढ़ा, उत्तरा-भाद्रपदा और उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र उपयुक्त हैं॥ ३–५॥
वरुण, विष्णु और इन्द्रका पूजन करके इस कर्मको आरम्भ करे। नीम, अशोक, पुन्नाग (नागकेसर), शिरीष, प्रियङ्गु, अशोक$^१$, कदली (केला), जम्बू (जामुन), वकुल (मौलसिरी) और अनार वृक्षोंका आरोपण करके ग्रीष्म-ऋतुमें प्रातःकाल और सायंकाल, शीत-ऋतुमें दिनके समय एवं वर्षा-ऋतुमें रात्रिके समय भूमिके सूख जानेपर वृक्षोंको सींचे। वृक्षोंके मध्यमें बीस हाथका अन्तर 'उत्तम', सोलह हाथका अन्तर 'मध्यम' और बारह हाथका अन्तर 'अधम' कहा गया है। बारह हाथ अन्तरवाले वृक्षोंको स्थानान्तरित कर देना चाहिये। घने वृक्ष फलहीन होते हैं। पहले उन्हें काट-छाँटकर शुद्ध करे॥ ६–९॥
फिर विडङ्ग, घृत और पङ्क-मिश्रित शीतल जलसे उनको सींचे। वृक्षोंके फलोंका नाश होनेपर कुलथी, उड़द, मूँग, जौ, तिल और घृतसे मिश्रित शीतल जलके द्वारा यदि सेचन किया जाय तो वृक्षोंमें सदा फलों एवं पुष्पोंकी वृद्धि होती है। भेड़ और बकरीकी विष्ठाका चूर्ण, जौका चूर्ण, तिल और जल—इनको एकत्र करके सात दिनतक एक स्थानपर रखे। उसके बाद इससे सींचना सभी वृक्षोंके फल और पुष्पोंको बढ़ानेवाला है॥ १०–१२॥
मछलीके जल (जिसमें मछली रहती हों)-से सींचनेपर वृक्षोंकी वृद्धि होती है। विडंगचावलके साथ यह जल वृक्षोंका दोहद (अभिलषित-पदार्थ) है। इसका सेचन साधारणतया सभी वृक्ष-रोगोंका विनाश करनेवाला है॥ १३–१४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘वृक्षायुर्वेदका वर्णन’ नामक दो सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८२॥
दो सौ तिरासीवाँ अध्याय
नाना रोगनाशक ओषधियोंका वर्णन
भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं—अडूसा, मुलहठी या कचूर$^२$, दोनों प्रकारकी हल्दी और इन्द्रयव—इनका क्वाथ बालकोंके सभी प्रकारके अतिसारमें तथा स्तन्य (माताके दूधके) दोषोंमें प्रशस्त है। पीपल और अतीसके सहित काकड़ाशृंगीका अथवा केवल एक अतीसका चूर्ण करके बालकोंको मधुके साथ चटावे। इससे खाँसी, वमन और ज्वर नष्ट होता है। बालकोंको दुग्ध, घृत अथवा तैलके साथ वचका सेवन करावे अथवा मुलहठी और शङ्खपुष्पीको दूधके साथ बालक पिये। इससे बालकोंकी वाक्शक्ति एवं रूपसम्पत्तिके साथ-साथ आयु, बुद्धि और कान्तिकी भी वृद्धि होती है। वच, कलिहारी, अडूसा, सोंठ, पीपल, हल्दी, कूट, मुलहठी और सैन्धव—इनका चूर्ण बालकोंको प्रातःकाल पिलावे। इसका सेवन बुद्धिवर्द्धक है। देवदारु, बड़ा सहजन, त्रिफला और नागरमोथा—इनका
१. २८२ वें अध्यायमें ६-७ दोनों श्लोकोंमें अशोक वृक्षका नाम है, पुनरुक्ति-दोष नहीं है। कारण यह है कि अशोक 'श्वेत' तथा 'रक्त' दो प्रकारका होता है। दोनों भवनके पास प्रशस्त हैं।
२. प्रथम श्लोकमें 'सिंही शटी' तथा 'सिंही यष्टी' दोनों पाठ हैं, जो युक्तियुक्त हैं। 'शटी'का अर्थ 'कचूर' है तथा 'यष्टी'का अर्थ 'मुलहठी' है।