भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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९८ [ दूसरी पञ्चिका ( १ ) अग्नि॒र्होता॑ नो अध्व॒रे वा॒जी सन् परिणीयते । दे॒वो दे॒वेषु॑ य॒ज्ञियः॑ ॥ ( ऋ० ४।१५।१ ) ( २ ) परि॑ त्रि॒विष्ट्य॑ध्व॒रं यात्य॒ग्नी र॑थी॒रिव॑ । आ दे॒वेषु॒ प्रयो॒ दध॑त् ॥ ( ऋ० ४।१५।२ ) ( ३ ) परि॒ वाज॑पतिः क॒विर॒ग्निर्ह॒व्यान्य॑क्रमीत् । दध॒द्रत्ना॑नि दा॒शुषे॑ ॥ ( ऋ० ४।१५।३ ) ( अग्नि होता हमारे यज्ञ में घोड़े के समान बन जाता है । यह देवों में यज्ञ सम्बन्धी देव है ॥१॥ रथी के समान अग्नि यज्ञ के चारों ओर तीन बार जाता है । वह देवों के लिये आहुति को धारण करता है ॥२॥ अन्न का पति, कवि (वस्तुओं का प्रकाश) अग्नि, हवियों की परिक्रमा करता है । वह यजमान को धन देता है ॥३॥ ) इस लाई हुई अग्नि को इस प्रकार इसी के देवता और उसी के छन्दों द्वारा बढ़ाता है । "वाजी सन् परिणीयते" का अर्थ है कि घोड़े के समान उसको चारों ओर फिराते हैं । "परि त्रिविष्ट्यध्वरं यात्यग्नी रथीरिव" का अर्थ है कि यह अग्नि रथी के समान यज्ञ के चारों ओर फिरता है । "परिवाजपतिः कविः" का अर्थ है कि वह वाज अर्थात् अन्नों का पति है । अब अध्वर्यु कहता है, "हे होता, देवों के हव्य के लिये आदेश कर" । अब मैत्रावरुण आदेश करता है, "अग्नि की विजय हो । अग्नि हव्य का खाना दे ।" यहाँ प्रश्न होता है कि जब अध्वर्यु ने आदेश देने के लिये होता को कहा तो मैत्रावरुण ने क्यों आदेश दिया ? इसका उत्तर यह है कि मैत्रावरुण तो यज्ञ का मन है । होता यज्ञ की वाणी है । मन से ही प्रेरित होकर वाणी बोलती है । जो बिना मन के बोलता है, वह आसुरी वाणी है और देव उसको ग्रहण नहीं

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