ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०० [ दूसरी पत्रिका "माँ, बाप, भाई, बहिन, मित्र और साथी इस पशु को दे दें।" (ऐसा कहकर) वह पशु को लेते हैं मानों माँ बाप ने उसे हवाले कर दिया। 'इसके पैर उत्तर को करो। इसकी आँखें सूर्य की ओर करो। इसके प्राण वायु के लिये छोड़ो। जीवन को अन्तरिक्ष के लिये, कानों को दिशाओं के लिये, शरीर को पृथिवी के लिये।" इस प्रकार वह उन-उन शरीर के भागों को उन-उन लोकों के हवाले करता है। "पूरा चमड़ा उतार लो। नाभि काटने से पूर्व वपा अर्थात् अंतड़ियों (Omentum) को काट लो। इसको सांस को (मुँह बन्द करके) भीतर ही रोक दो।" इस प्रकार होता पशु को प्राण धारण कराता है। 'इसकी छाती को श्येन (गरुड) की आकृति का कर दो। बाहुओं को प्रशस (hatchets) की आकृति का। भुजाओं के अगले भागों को भालों के समान, कन्धों को दो कछुओं की आकृति का, कमर को न तोड़ो, जांघों को ढालों के समान, दोनों घुटनों को स्रेकवृक्ष के पत्तों के समान। इसकी छब्बीस पसलियों को क्रम- पूर्वक निकाल लो। इसके अंग अंग को पूरा रक्खो।" इस प्रकार यह शरीर के अङ्गों को लाभ पहुँचाता है। "इसके मल मूत्र के छिपाने के लिये भूमि में गड्ढा खोदो।" मलमूत्र 'ओषध' अर्थात् वनस्पति का होता है। पृथिवी वनस्पति की प्रतिष्ठा है। इस प्रकार होता इस मल मूत्र को उसी की ठीक जगह में रख देता है। (६) ७—"रुधिर राक्षसों को दे दो।" देवों ने राक्षसों को यज्ञ की हवियों से वंचित कर दिया और उन को भूसी तथा छोटे दाने दिये। और यज्ञ से निकाल कर उनको रुधिर अर्पण किया। इसलिये होता कहता है, "रुधिर राक्षसों को दे दो।" राक्षसों को रुधिर देकर वह उनको यज्ञ के अन्य भाग से वंचित