ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११८ [ दूसरी पञ्चिका करता है। और होता भी वाणी से ही पाठ करता है। वाणी ही ब्रह्म है इसलिये वाणी या ब्रह्म से जो कामना सिद्ध हो सकती है वह सब सिद्ध हो जाती है । (५) १६—जब प्रजापति स्वयं होता था और वह प्रातरनुवाक बोलने को था तो सब देवता उत्सुक थे कि “वह सबसे पहले मेरा नाम लेगा। मेरा नाम लेगा।” उसने इधर-उधर देखकर सोचा कि यदि एक ही देवता को लक्ष्य करके पढ़ता हूँ तो अन्य देवता किस प्रकार तृप्त हो सकेंगे । तब उसने नीचे की ऋचा को देखा :— आपो रेवतीः क्षयथा हि वस्वः क्रतुं च भद्रं बिभृथामृतं च । रायश्च स्थ स्वपत्यस्य पत्नीः सरस्वती तद् गृणते वयो धात् ॥ ( ऋ० १०।३०।१२ ) ( हे धनयुक्त “आपः” तुम सब कोशों के ऊपर शासन करते हो । यज्ञ, कल्याण और अमृत को देने वाले हो । तुम स्वतंत्र धनों की पत्नी (स्वामिनी) हो । सरस्वती देवी गान करने वाले को चिरायु करे । ) “आप” सब देवता हैं। और “रेवती” भी सब देवता हैं। इस प्रकार उसने ऐसे मंत्र से अनुवाक पढ़ा कि सब देवता सन्तुष्ट हो गये । सबने सोचा, “यह मेरे लिये कहता है। यह मेरे लिये कहता है।” जब वह अनुवाक पढ़ रहा था तो सब प्रसन्न हुये । जो इस रहस्य को समझकर इस मंत्र से अपना अनुवाक पढ़ता है वह सब देवताओं को लक्ष्य में रखकर पढ़ता है और सब देवता उससे प्रसन्न होते हैं । देवों को भय हुआ कि इस प्रातर्यज्ञ को असुर ले लेंगे क्यों- कि वह बड़े हैं, बलिष्ठ हैं। परन्तु इन्द्र ने उनसे कहा, “मत डरो । मैं अपने प्रातःकाल के वज्र की तीन गुनी शक्ति से उनको मार दूंगा ।” तब उसने ऊपर की ऋचा पढ़ी । यह ऋचा वज्र है