भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 592 में से

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१२२ [ दूसरी पञ्चिका तैंतीस देवता सोमपा हैं। ३३ असोमपा । सोमपा यह हैं। आठ वसु, ११ रुद्र, बारह आदित्य, प्रजा- पति, और वषट्कार । असोमपा यह हैं, ११ प्रयाज, ११ अनुयाज, ११ उपयाज ॥ यह पशु में भाग रखते हैं। सोम से सोमपा देवताओं को संतुष्ट करता है और पशु से असोमपा देवताओं को । इस प्रकार जो इस रहस्य को समझता है वह दोनों प्रकार के देवों को सन्तुष्ट कर देता है। वह इस मंत्र से समाप्त करता है :- अभूदुषा रुशत् पशुरग्निरधाय्यृत्वियः। अयोजि वां वृषण्वसू रथो दस्रावमर्त्यो माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥ ( ऋ० ५।७५।६ ) ( श्वेत पशु वाली उषा आ गई । ऋतु के अनुकूल अग्नि रख दी गई। हे विचित्र वीरो ( दोनों अश्विनो ) तुम्हारा न मरने वाला रथ जोता जा चुका । हे मधु को प्रिय रखने वाले, तुम दोनों हमारे बुलाने को सुनो ) । इस पर प्रश्न होता है कि यदि अग्नि के, उषा के और अश्विन की तीन ऋचाओं को बोलता है तो यह एक ऋचा बोलने का क्या प्रयोजन है ? इसका उत्तर यह है कि इस ऋचा में तीनों देवों का वर्णन है। "अभूदुषा रुशत् पशुः" यह 'उषा' के लिये । "अग्निरधाय्यृत्वियः" यह अग्नि के लिए । "अयोजि वां वृषण्वसू रथो दस्रावमर्त्यो माध्वी मम श्रुतं हवम् ।” दोनों अश्विनों के लिये । इस प्रकार एक ऋचा से समाप्त करने से तीनों देवों की स्तुति शामिल हो जाती है। (८)

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