भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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चौथा अध्याय ] १३७ दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि प्राण हैं। इससे उन्हीं को बुलाता है। नीचे के मंत्र से अश्वि के ग्रहों से पान करता है :— “एष वसुः संयद् वसुरिहवसुः संयद् वसुर्मयि वसुः संयद् वसुः श्रोत्रपाः श्रोत्रं मे पाहि”। “यह वसु है, सदा रहने वाला वसु है। यहाँ वसु है, सदा रहने वाला वसु है। हे कान के रक्षक, मेरे कान की रक्षा कर”। अब वह कहता है:— उपहूतं श्रोत्रं सहात्मनोपमां श्रोत्रं सहात्मनाह्वयतामुपहूता ऋषयो दैव्यास्तनूपावानस्तन्वस्तपोजां उपमामृषयो दैव्यासोह्वयंतां तनूपावानस्तन्व- स्तपोजा”। “कान आत्मा के साथ बुलाया गया। कान आत्मा के साथ मुझे बुलावे। दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि बुलाये गये। दिव्यतनूपा और तपोजा ऋषि मुझे बुलायें”। यह दिव्य तनूपा, तपोजा ऋषि प्राण हैं, इससे इन्हीं को बुलाता है। ऐन्द्रवायव्य ग्रह से पीते समय होता ग्रह (घड़े या प्याले) के मुँह को अपनी ओर करके उसमें से पीता है। क्योंकि प्राण और अपान उसके सामने है। इसी प्रकार मित्र-वरुण के ग्रह में से पीता है क्योंकि दोनों आँखें उसके सामने हैं, अश्विनों के ग्रह से पीते समय अपने मुख को पीछे फेर लेता है क्योंकि मनुष्य और पशु चारों ओर से शब्द सुनते हैं। (३) २८—दो देवताओं के सोम पात्र प्राण हैं। इसलिये प्राणों को जारी रखने और उनको टूटने न देने के लिये याज्य मन्त्रों को निरन्तर पढ़ना चाहिये। दो देवताओं के सोम पात्र प्राण हैं। अतएव होता अनुवषट्कार न पढ़े। इससे प्राणों का क्रम टूट जायगा। क्योंकि अनुवषट्कार क्रम के टूटने का द्योतक है। यदि