भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पांचवाँ अध्याय ] १५१ “भूरग्निज्योतिरग्निर्इन्द्रो ज्योतिर्भुवो ज्योतिरिन्द्रः सूर्योज्योतिर्ज्योतिः स्वः सूर्यः” । (५) ३८—होता का जप रेत या वीर्य है । वीर्य सिंचन चुपचाप होता है । इसी प्रकार जप भी चुपचाप होता है । यह भी वीर्य- सिंचन ही है । 'आहाव' से पहले जप होता है । आहाव से पीछे जो कुछ होता है वह शस्त्र है । होता 'आहाव' को अध्वर्यु के प्रति उस समय कहता है जब अध्वर्यु चारों पैरों पर ( पशु के समान ) भूमि पर पड़ा होता है । और उसका मुँह दूसरो ओर होता है । चौपाये मुँह को फेर कर वीर्यसिंचन करते हैं । अब अध्वर्यु दो पैरों पर खड़ा हो जाता है और सामने मुँह कर लेता है क्योंकि मनुष्य (दुपाये) सामने मुँह करके वीर्य सिंचन करते हैं । जप के भिन्न-भिन्न भाग यह हैं :— “पिता मातरिश्वा” प्राण पिता है । प्राण मातरिश्वा है । प्राण वीर्य है । इन शब्दों को कहकर मानो वीर्यसिंचन करता है । “अच्छिद्रा पदाद्या” वीर्य छिद्र-रहित है । इस लिये इस छिद्ररहित या पूर्ण का जन्म होता है । “अच्छिद्रोक्थाकवयः शंसन” जो पढ़े हुये हैं वह कवि हैं । उन्होंने इस पूर्ण वीर्य को उत्पन्न किया । अब कहता है :— “सोमो विश्वविन् नीथानिनेषदू बृहस्पतिरुक्था मदानि शंसिषदू ।” बृहस्पति ब्राह्मण है । स्तुति किया गया सोम क्षत्रिय है । “नीथानि” और “उक्था मदानि” शस्त्र हैं । दैवी ब्राह्मण और