भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri १४५ [ दूसरी पञ्चिका उत नो ब्रह्मन्नविष उक्थेषु देवहूतमः । शं नः शोचा मरुद् वृधोऽग्ने सहस्रसातमः ॥६॥ नू नो रास्व सहस्रवत् तोकवत् पुष्टिमद् वसु । द्युमदग्ने सुवीर्यं वर्षिष्ठमनुपक्षितम् ॥७॥ (ऋ० ३।१३।१-७) 'प्र' का अर्थ है प्राण। सब जीव प्राण पाकर ही चलते फिरते हैं। इस प्रकार होता ( यजमान में ) प्राण धारण कराता है और प्राणों को सुसंस्कृत करता है। वह कहता है “दीदि- वांसमपूर्व्यं” (३।१३।५) क्योंकि मन ही चमकने वाला है। मन से पहले कुछ नहीं। इस प्रकार वह मन को उत्पन्न करता है और मन का सस्कार करता है। वह कहता है “स नः शर्माणि वीतये” (३।१३।४)। वाणी ही ही शर्म है। जो दूसरों की बात को दुहराता है, उसके लिये कहते हैं कि हमने इस को चुप कर दिया। इसको पढ़कर वह वाणी को उत्पन्न करता है और वाणी का संस्कार करता है। कहता है “उत नो ब्रह्मन्नविषः” (३।१३।६)। श्रोत्र ब्रह्म है। श्रोत्र से ही ब्रह्म को सुनता है। श्रोत्र में ब्रह्म प्रतिष्ठित है। इस प्रकार वह श्रोत्र को उत्पन्न करता है और श्रोत्र का संस्कार करता है। वह कहता है “स यन्ता विप्र एषां” ( ३।१३।३ ) अपान यंता (नियंता) है। क्योंकि प्राण अपान के द्वारा नियंत्रित होता है और पीछे नहीं लौट सकता। इस प्रकार वह अपान को उत्पन्न करता और अपान का संस्कार करता है। वह कहता है “ऋतवा यत्य रोदसी” ( ३।१३।२ ) । चक्षु ऋत है। अगर दो आदमियों में से एक कहे “मैंने स्वयं अपनी आँख से देखा है” तो उसका विश्वास कर लेते हैं। इस प्रकार चक्षु को उत्पन्न करता और चक्षु का संस्कार करता है। CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.