ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय ] १६७ मान के शत्रु हों उसके लिये वह वषट्कार रूपी इस वज्र का प्रयोग करे। यह धामच्छद् इसलिये हैं कि जिस ऋचा के साथ बोला जाता है उसी का भाग हो जाता है बिना कुछ भाग छोड़े हुये। प्रजा और पशु उसके पास होते हैं। इसलिये प्रजा और पशु की कामना वाले को यह वषट्कार करना चाहिये। जिसमें 'षट्' धीरे से कहा जाता है वह रिक्त है। इस प्रकार वह आत्मा और यजमान दोनों को रिक्त (शून्य) कर देता है। जो ऐसा वषट्कार करता है, वह स्वयं भी पापी है और वह भी जिसके लिये यह वषट्कार किया जाय। इसलिये उसको यह वषट्कार न करना चाहिये। यहां प्रश्न होता है कि क्या होता यजमान को पापी या भद्र बना सकता है? इसका उत्तर यह है कि हां, यदि वह किसी का होता है तो ऐसा कर सकता है। इस समय होता यजमान के लिये जो चाहे कर सकता है। यदि वह चाहे कि यजमान को यज्ञ का फल न मिले तो ऋचा और वषट्कार दोनों को एक स्वर से पढ़े। वह उसको यज्ञ के फल से वंचित कर देगा। अगर वह यजमान को बहुत पापी बनाना चाहे तो याज्य को जोर से पढ़े और वषट्कार को धीरे से। इससे यजमान पापी हो जायगा ! यदि वह यजमान को प्रसन्न करना चाहे तो याज्य मंत्र को धीरे से पढ़ कर वषट्कार को जोर से पढ़े। यह श्री के लिये किया जाता है। इससे वह यजमान को कल्याण युक्त कर देता है। मंत्र और वषट् को मिला देना चाहिये। बीच में रुकना* *विषय यह है कि मंत्र को बोलकर पीछे से 'ओ३म्' लगा देते हैं। और सबसे पिछला स्वर छोड़ देते हैं। जैसे अगर मंत्र के अंत में 'य' आया तो 'य' और 'ओ३म्' मिलकर 'योम्' बोलेंगे।