भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 184

१७० [ तीसरी पञ्चिका जो निविद् हैं वह ‘उक्थों’ के पेश (किनारे की बेल) हैं। यह प्रातः सवन में उक्थों के पहले रक्खे जाते हैं जैसे जुलाहा कपड़े के सिरे पर बेल बनाता है। दोपहर के सवन में बीच में रक्खे जाते हैं जैसे जुलाहा कपड़े के बीच में बेल बनाता है। सायंकाल के सवन में यह पीछे रक्खे जाते हैं जैसे जुलाहा कपड़े के पीछे बेल बनाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह यज्ञ के बेल बूटों से अपने को सजा लेता है। (१०) ११—यह जो निविद् हैं वह सूर्य्य के हैं। ये जो प्रातः सवन में उक्थों से पहले रक्खे जाते हैं, दोपहर के सवन में बीच में और तीसरे सवन में पीछे। ये सूर्य्य के ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। देवों ने यज्ञ को थोड़ा थोड़ा करके (पच्छः) पाया। इस- लिये निविद् भी टुकड़े टुकड़े कर के पढ़े जाते हैं। जब देवों ने यज्ञ को पाया तो उसमें से एक अश्व निकला। इसलिये कहते हैं कि यजमान निविद् पढ़ने वालों को एक अश्व दे। यह वर बहुत अच्छा समझा जाता है। निविद् पढ़ने वाला किसी पद को न छोड़े। क्योंकि पद छोड़ने से मानों यज्ञ में छेद करता है। यज्ञ में छिद्र हो जाने से यजमान बड़ा पापी हो जाता है। इसलिये निविद् में कोई पद न छोड़े। निविद् के दो पदों को उलट पलट न करे। यदि उलट पलट करेगा तो यज्ञ उलट पलट हो जायगा और यजमान भी उलट पलट हो जायगा। इसलिये निविद् के दो पदों को उलट पलट न करे। निविद् के दो पदों को मिलाना भी न चाहिये। यदि निविद् के दो पदों को मिला देगा तो यज्ञ की आयु को बिगाड़ देगा