ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ
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१७२ [ तीसरी पञ्चिका “यो यज्ञस्य प्रसाधनस्तन्तुर्देवेष्वाततः। तमाहुतं निशीमहि” इसमें 'तन्तु' का अर्थ है सन्तान । क्योंकि इसको पढ़कर होता यजमान की सन्तान को फैलाता है (संतनोति) । (ऋ० १०।५७।३) “मनो न्वाहुवामहे नाराशंसेन सोमेन” । (ऋ० १०।५७।३) यह मन्त्र पढ़ता है क्योंकि मन से ही यज्ञ ताना जाता है । मन से ही किया जाता है। यही उसका (निविद् के सूक्त से आगे निकल जाने में जो भूल हुई उसका) प्रायश्चित्त है। (११) ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका का पहला अध्याय समाप्त