भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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८ [ ऐतरेय-ब्राह्मण बध । पशु-बध न तो वेदों में विहित ही है और न उन मंत्रों में उनका उल्लेख है जो ब्राह्मण ग्रन्थों में पशु-बध में विनियुक्त हैं । कुछ लोगों का ऐसा कहना है कि ब्राह्मण ग्रन्थों में भी पशु- बध नहीं है केवल टीकाकारों ने 'आलभन' शब्द का भूल से 'बध' अर्थ लेकर ऐसा भ्रम उत्पन्न कर दिया है । यह ठीक है कि 'लभ' धातु का अर्थ 'प्राप्ति' है और 'आ' उपसर्ग लगने से 'आलभ' का अर्थ बध नहीं हो सकता । पारस्कर गृह्य सूत्र में विवाह के सम्बन्ध में यह वाक्य आता है :— अथास्यै दक्षिणा ꣳ समधि हृदयमालभते ममव्रते इत्यादि ( प्रथम-काण्ड अष्टमी कण्डिका ) अर्थात् वर वधू के हृदय पर हाथ रख कर 'आलभन' करे । यहाँ 'आलभते' का अर्थ है स्पर्श, न कि काटना या बध करना । परन्तु ब्राह्मण ग्रन्थों में पूर्वापर के देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि अत्यन्त खींचातानी करके भी ब्राह्मण ग्रन्थों के माथे से पशु-बध के कलंक का टीका मिटाया नहीं जा सकता । यदि एक स्थान पर 'आलभन' शब्द आता तो इसकी कुछ व्याख्या की जा सकती थी । परन्तु कई स्थलों पर पशु के काटने का इतना स्पष्ट विधान है कि 'आलभन' का अर्थ भी वही लेना पड़ता है । कहीं कहीं 'आ + लभ' का प्रयोग न करके 'हन्' धातु का प्रयोग किया गया है जैसे 'तं यत्र निहनिष्यन्तो भवन्ति' ( ऐतरेय २।२।१ ) “अर्थात् जहाँ पशु का बध करने वाले हैं” इत्यादि । इससे हम तो यह मानने पर मजबूर हो जाते हैं कि वेद के अध्वर नाम हिंसा-रहित यज्ञों में किसी ने किसी अवस्था में कहीं पर किसी प्रकार पशुबध की प्रथा प्रविष्ट कर दी । सम्भव है, तांत्रिक काल में इसका आरम्भ हुआ हो । आश्चर्य की बात यह है कि समस्त आर्य जाति में आरम्भ काल से ही गौओं को

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