ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३० [चौथी पञ्चिका क्योंकि मनुष्य पाप से मिला है, षोडशी का विहृत पाठ करने से यजमान पाप से छूट जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह इस पाप से छूट जाता है। नीचे के मंत्र से समाप्त करता है :— उद्यद् ब्रध्नस्य विष्टपम् । (ऋ० ८।६६।७) 'ब्रध्नस्य विष्टप' स्वर्ग है। इस प्रकार वह यजमान को स्वर्ग लोक में पहुँचाता है। वह नीचे के याज्य मंत्र को बोलता है :— अपाः पूर्वेषां हरिवः सुतानामथो इदं सवनं केवलं ते। ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र सत्रा वृषम् जठर आ वृषस्व ॥ (ऋ० १०।६६।१३) इस याज्य मंत्र को पढ़ने से षोडशी में सभी सवन सम्मिलित हो जाते हैं। "अपाः" (तूने पिया है) से प्रातः सवन का तात्पर्य है। इस प्रकार षोडशी में प्रातः सवन आ गया। "अथो इदं सवनं केवलं ते" (अब यह सवन केवल तेरा ही है) इससे दोपहर का सवन आ गया। इससे षोडशी में दोपहर का सवन सम्मिलित हो गया। "ममद्धि सोम" (सोम को पी या सोम से आनन्द उठा) इससे सायंकाल का सवन आ गया। इससे षोडशी में तीसरा सवन सम्मिलित आ गया। "वृषन्" (बलवान) षोडशी का रूप है। इस याज्य मंत्र को पढ़ने से षोडशी सब सवनों से बन जाती है। इस प्रकार यह सब सवनों की हो जाती है। जो इस रहस्य को समझता है वह सब सवनों से बनी हुई षोडशी के द्वारा फूलता फलता है। याज्य मंत्र पढ़ने में हर ११ अक्षर के पद में महानाम्नियों में से पांच अक्षर का एक उपसर्ग* जोड़ देते हैं। इस प्रकार *यह उपसर्ग ये हैं:—(१) एवाह्ये व (२) एवहीन्द्र (३) एवाहि शक्रो (४) वशोहि शक्र ।