भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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२३२ [ चौथी पञ्चिका रात के अंधकार से डरता था वहाँ से निकाल लाये। इसीलिये इनको अपिशर्वराणि कहते हैं। (५) ६—होता ( अतिरात्र के जापक ) नीचे के अनुष्टुभ् छन्द के मंत्र से आरंभ करता है:— पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्रगायत। विश्वासाहं शतक्रतुं मंहिष्ठं चर्षणीनाम्॥ (ऋ० ८।६२।१) इसमें 'अन्धस' (अंधेरा) शब्द पड़ा है। अनुष्टुभ् रात का है। रात्रि आनुष्टभी होती है। इन पर्यायों के याज्यों※ में 'अन्ध', (अंधेरा) 'पा' (पीना) और 'मद' (आनन्द करना) यह तीन शब्द अवश्य होते हैं। ※यह याज्य मंत्र यह हैं :— (१) अध्वर्यवो भरतेन्द्राय सोममामत्रेभिः सिञ्चता मद्यमन्धः। कामी हि वीरः सदमस्य पीतिं जुहोत वृष्णे तदिदेष वष्टि॥ (ऋ० २।१४।१) (२) अस्य मदे पुरु वर्षांसि विद्वांन्निन्द्रो वृत्रायप्रती चघान। तमु प्र ह षि मधुमन्तमस्मै सोमं वीराय शिप्रिणे पिबध्यै। (ऋ० ६।४४।१४) (३) अप्सु धूतस्य हरिवः पिबेह नृभिः सुतस्य जठरं पृणस्व। मिमिक्षुर्यमद्रय इन्द्र तुभ्यं तेभिर्वर्धस्व मदमुक्थवाहः। (ऋ० १०।१०४।२) (४) इन्द्र पिब तुभ्यं सुतो मदायांऽवस्य हरी वि मुचा सखाया। उत प्र गाय गणा आ निषद्याऽथा यज्ञाय गृणते वयो धाः॥ (ऋ० ६।४०।१) (५) अपाय्यस्यान्धसो मदाय मनीषिणः सुवानस्य प्रयसः। यस्मिन्निन्द्रः प्रदिवि वावृधान ओको दधे ब्रह्मरण्यन्तश्चनरः। (ऋ० २।१६।१)