ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३४ [ चौथी पञ्चिका रात के लिये नहीं तो दोनों के लिए १५ स्तोत्र कैसे हो गये ? और दोनों के समभाग कैसे हुये ? इसका उत्तर यह है 'अपिशर्वराणि' में १२ स्तोत्र होते हैं। इसके अतिरिक्त रथंतर स्वर में सन्धि स्तोत्र-पढ़ा जाता है जो तीन देवों के प्रति है। इस प्रकार रात के १५ स्तोत्र हो जाते हैं। इस प्रकार रात दिन के १५ स्तोत्र हो जाते हैं और वे सम- भाग भी हो जाते हैं। स्तोत्र परिमित हैं परन्तु पाठ (अनुशंसन) अपरिमित है। मानो भूतकाल परिमित है, भविष्य अपरिमित है। भविष्य के लिये ही अन्य मंत्र पढ़ता है। स्तोत्र से जो बढ़ा वह प्रजा है, जो अपने से बढ़ा वह पशु। इसमें अधिक मंत्रों के जाप से होता को उस सबकी प्राप्ति हो जाती है जो अपने से अधिक है (अर्थात् प्रजा, पशु, धन आदि)। (६) ऐतरेय ब्राह्मण की चौथी पंचिका का पहला अध्याय समाप्त हुआ।