ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३८ [ चौथी पञ्चिका, प्रकार का वीर्य होता है (द्विरेता) (एक घोड़ी में खच्चर उत्पन्न करने के लिए। दूसरा गधी में गधा उत्पन्न करने के लिये)। कुछ लोग कहते हैं कि "जैसे अग्नि, उषा और अश्विन के लिये होता मंत्र पढ़ता है उसी प्रकार सूर्य्या के लिये भी सात छंदों में मंत्र पढ़ने चाहिये। देवों के सात लोक हैं। वह सब लोकों में फूले फलेगा।" ऐसा माननीय नहीं है। तीन ही छंदों में पढ़ना चाहिये। तीन ही लोक हैं जो त्रिवृत हैं। इन लोकों के जीतने के लिये। कुछ लोग कहते हैं कि— उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्य्यम्॥" (ऋ० १।५०।१) से आरम्भ करे। यह भी माननीय नहीं है। मानो दौड़ने में उद्दिष्ट सीमा को ही भूल जाय। उसको इस मंत्र से आरम्भ करना चाहिये:— सूर्य्यो न दिवस्पातु वातो अन्तरिक्षात्। अग्निनः पार्थिवेभ्यः॥ (ऋ १०।१५८।१) मानो इससे वह उद्दिष्ट सीमा को पहुँच गया। अब दूसरा मंत्र "उदुत्यं" (१।५०।१) बोले। "चित्रंदेवानामुदगादनीकं" (१।११५) यह सूक्त त्रिष्टुभ् है। यह सूर्य्य "देवों में चित्र" है। इस लिये यह बोला जाता है। "नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसेः" (ऋ० १०।३७।१) यह जगती सूक्त है। इसमें एक आशीर्वाद का पद है। इससे होता अपने लिये और यजमान के लिये आशीर्वाद कहता है। (३) १०—इस सम्बन्ध में कहते हैं कि सूर्य्य को न छोड़ जाय। बृहती को न छोड़ जाय। सूर्य्य को छोड़ जायगा तो ब्रह्मवर्चस्