भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 263

तीसरा अध्याय ] २४६ गायों ने एक बार खुर और सींगों की अभिलाषा से सत्र किया । दस महीनों में उनके खुर और सींग निकल आये । उन्होंने कहा "जिस अभिलाषा से हम दीक्षित हुये वह पूरी होगी, अब उठें" । जब वे उठे, उस समय उनके सींग थे । लेकिन उन्होंने सोचा कि "वर्ष को समाप्त कर दें"। इसलिये फिर सत्र जारी रक्खा । उनकी अश्रद्धा के कारण उनके सींग जाते रहे और वे तूपर (डुंडे) रह गये । उन्होंने ऊर्ज प्राप्त किया । इसके बाद सब ऋतुओं को समाप्त करके वे उठे । चूँकि उन्होंने ऊर्ज पैदा किया इसलिये गायों को सब प्यार करते हैं और उनको सुन्दर (चारु) बनाते हैं । जो इस रहस्य को समझता है वह सब का प्यारा होता है और सौंदर्य को प्राप्त करता है । आदित्य और अंगिरा लड़ पड़े कि कौन स्वर्ग लोक में पहले पहुँचे । हर एक ने कहा, "हम पहले पहुँचेंगे । हम पहले पहुँचेंगे" । आदित्य पहले स्वर्गलोक में पहुँच गये । फिर साठ वर्ष पीछे अंगिरा । (गंवामयन और आदित्य-अयन में कई बातों में समानता है ) । पहले अतिरात्र होता है । फिर चौबीसवें दिन उक्थ्य । सब अभिप्लव षडह इसमें आ जाते हैं । दिनों का क्रम बदल जाता है । यह आदित्यों का अयन है । अतिरात्र पहले । चौबीसवें दिन उक्थ्य । पृष्ठियों के साथ अभिप्लव षडह । दिनों में कुछ अदल बदल । यह है अंगिरसों का अयन । यह जो अभिप्लव षडह है वह स्वर्ग लोक का सीधा मार्ग है । पृष्ठियों का षडह स्वर्ग लोक का महापथ है । जो अभिप्लव षडह और पृष्टि-षडह दोनों मार्गों का अवलम्बन करते हैं उनकी सभी कामनायें पूरी हो जाती हैं । और इनको कोई हानि नहीं पहुँचती । ( ३ ) १८—इक्कीसवीं करते हैं । इक्कीसवीं संवत्सर के बीच की