भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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प्राक्कथन ] १३ और गौरवान्वित पुरुषों का उल्लेख आता है उनमें से प्रायः बहुतों के जन्म के साथ ऐसी गाथायें क्यों जोड़ दी गईं ? क्या वैदिक साहित्य में उच्चकुल के पुरुषों का कुछ भी भाग नहीं या अत्यन्त न्यून भाग है ? सम्भव है कि बहुत सी गाथाओं का आधार वेद विरोधी मत हुये हों । निश्चयात्मक होना कठिन है । ऐतरेय ऋग्वेदी ब्राह्मण है । 'ब्राह्मण' का क्या अर्थ है ? यह शब्द 'ब्रह्म' में 'अण्' प्रत्यय करने से बनता है । ब्रह्म का अर्थ यहाँ यज्ञ समझना चाहिये । यज्ञ के ऋत्विजों में ब्रह्मा का पद मुख्य है क्योंकि वह यज्ञ के सब कृत्यों को जानता और होता, अध्वर्यु तथा उद्गाता आदि का पथ प्रदर्शन करता है । इसलिये यज्ञ के विशेषज्ञ यज्ञ के सम्बन्ध में जो विवेचना करते हैं उनका नाम है ब्राह्मण । इन ब्राह्मणों में ऋग्वेदीय, यजुर्वेदीय आदि की भेदक- भित्ति कैसे खड़ी हुई यह कहना कठिन है । ऐसा भेद उपनिषदों के सम्बन्ध में भी पाया जाता है । आदि काल में ऐसा भेद न था । लोगों को चारों वेद पढ़ने पढ़ाने की प्रथा थी । वेद यदि जीवन से सम्बन्ध रखते हैं तो यह भेद क्यों हो ? यज्ञों में भी यह भेद क्यों हो ? ऐसा प्रतीत होता है कि आगे चल कर किसी कारण से वेदज्ञ ब्राह्मणों ने एक एक वेद अपने परिवार के लिये चुन लिया । कोई ऋग्वेदी हो गये, कोई यजुर्वेदी और कोई सामवेदी । पीछे से यह सामान्य भेद गहरा भेद हो गया । उनकी शाखायें अलग-अलग हो गईं । यज्ञ करने की प्रणाली भी अलग अलग हो गई । आदि में सुसंगठित आर्यों की आगे आने वाली भयानक विभिन्नता का यह एक सूत्रपात था । आज कल भिन्न-भिन्न प्रकार के भेद मनुष्य जाति को विभक्त कर रहे हैं । एक वेद मत के अनुयायी और वेद को ही अपना धर्म ग्रन्थ मानने वाले लोगों में तो यह भेद होना दुर्भाग्य की ही बात है। अस्तु । ऐतरेय ऋग्वेदीय ब्राह्मण है । इसमें होता द्वारा पढ़े जाने