भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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२८८ [ पाँचवीं पञ्चिका जातवेद मंत्र वही है :- जातवेदसे सुनवाम ( ऋ० १।९९।१ ) जातवेद का निविद् सूक्त यह है :- त्वमग्ने प्रथमो अं गिरा ( ऋ० १।३१ ) यहाँ हर मंत्र के पहले 'त्वमग्ने' आता है । यह उदर्कं है । यह तीसरे दिन का रूप है । 'त्वं त्वं' बार बार कहने से अगले तीन दिनों ( चौथा, पाँचवाँ, छठा ) से तात्पर्य है । जो इस रहस्य को समझ कर यह पाठ करते हैं उनके त्र्यह बिना किसी विघ्न के निरन्तर समाप्त हो जाते हैं । ( २ ) ३-तीसरे दिन सब स्तोम खतम हो जाते हैं और सब छन्द । केवल एक चीज़ बच रहती है अर्थात् 'वाक्' । वाक् एक अक्षर है । इसमें तीन अक्षर सम्मिलित हैं । एक अक्षर में तीन अक्षर हैं । अगले त्र्यह में तीन दिन होते हैं । यह तीन अक्षर तीन के अगले दिनों को बताते हैं । यह अक्षर तीन यह हैं एक वाक्, एक गौ, एक द्यौ । इसलिये चौथे दिन का देवता 'वाग्' ही है । चौथे दिन इसी अक्षर का न्यूंख बनाते हैं । इसके स्वर को कुछ घटा बढ़ा कर । यह चौथे दिन को उठाने के लिये । न्यूंख अन्न है । अन्न के लिये गायक लोक इधर-उधर फिरते हैं और अन्न उत्पन्न होता है । चौथे दिन न्यूंख करके अन्न उत्पन्न करते हैं । क्योंकि यह कृत्य अन्न के लिये ही किया जाता है । इसलिये चौथा दिन जातवद् ( उपजाऊ-fertile ) होता है । कुछ लोग कहते हैं कि चार अक्षर का न्यूंख करना चाहिये क्योंकि पशुओं के चार पैर होते हैं और यह सब पशुओं की वृद्धि के लिये किया जाता है ।