ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय अग्निष्टोम का आरंभ दीक्षणीय-इष्टि १—देवों में अग्नि का सबसे आदि का और विष्णु का सबसे अन्त का पद है । इनके बीच में और सब देव हैं । दीक्ष- णीय इष्टि❀ में ग्यारह कपालों (प्यालों) वाला अग्नि-विष्णु का पुरोडाश अर्पण करना चाहिये† । बिना किसी को छोड़े । इस दृष्टि से सभी देवताओं के लिए अर्पण करते हैं । क्योंकि अग्नि ही सब देवता है । विष्णु ही सब देवता है । यह दोनों शरीर धारी (तन्वौ अर्थात् शरीर धारी या स्थूल रूप अर्थात् वास्तविक सत्ता वाले) अग्नि और विष्णु यज्ञ के किनारे हैं । यह जो अग्नि और ❀सोमयाग में गोष्टोम, आयुष्टोम, आदि कई विभाग हैं । उनमें सबसे पहला ज्योतिष्टोम है । इस ज्योतिष्टोम की चार संस्थायें हैं । ( १ ) अग्निष्टोम ( २ ) उक्थ्य ( ३ ) षोडशी ( ४ ) अतिरात्र । ऐतरेय ब्राह्मण का आरंभ अग्निष्टोम से होता है । †यहाँ वर्तमान विधि-अर्थ में है, लिङर्थे लेट् (पाणिनि ३।४।७ ) ( १७ ) २