भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 592 में से

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दूसरा अध्याय ] ३११ तत्सवितुर्वरेण्यम् ( ३।६२।१०-११ ) दोषो अगात् यहाँ 'अगात्' जाने के अर्थ में 'अन्त' वाला है । यह छठे दिन का रूप है । सविता का निविद् सूक्त यह है :— उदुष्य देवः सविता सवाय ( ऋ० २।३८ ) इसमें 'शश्वत्तमं तदपावह्निरस्थात्' में 'स्थ' अन्त वाला है । द्यावापृथिवी का निविद् सूक्त यह है :— कतरा पूर्वा कतरापरायोः••••••( ऋ० १।१८५।१ ) यह समानोदर्क है । यह छठे दिन का रूप है । किमुश्रेष्ठः किं यविष्ठो न आजगन्••••••( ऋ० १।१६१ ) उपनोवाजा अध्वरमुमुक्षा••••••( ऋ० ४।३७ ) यह ऋतुओं का नाराशंसी सूक्त है । इसमें 'त्रि' शब्द है । यह छठे दिन का रूप है । नीचे के दो सूक्त वैश्वदेव (नाभानेदिष्ठ) के हैं :— इदमित्थारौद्रं गूर्तवचा••••••( ऋ० १०।६१ ) ये यज्ञेन दक्षिणाया समक्ता••••••( ऋ० १०।६२ ) ( ८ ) १४—अब नाभानेदिष्ठ पढ़ता है । नाभानेदिष्ठ मनु का पुत्र था जो ब्रह्मचर्य आश्रम में था । उसके भाइयों ने उसको घर की सम्पत्ति से अलग कर दिया । उसने भाइयों के पास आकर कहा, "मेरा कितना भाग है ?" उन्होंने कहा, "फैसला करने वाले के पास जा" । इससे उनका आशय पिता से था । इसलिये पिता को पुत्रों के झगड़ों का फैसला करने वाला कहते हैं । वह पिता के पास आया और बोला, "यह मेरा भाग बाँट कर खा गये ।"

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