ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 334, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ें३२४] [पाँचवीं पञ्चिका वाहक होता है उसी में निविद् रक्खा जाता है। इसलिये इसमें निविद् रक्खा गया है। अब मिथुन सम्बन्धी सूक्त पढ़े जाते हैं। यह त्रिष्टुभ् और जगती में हैं, पशु मिथुन हैं। और छन्दोम पशु हैं। यह पशुओं की बढ़ती के लिये किया जाता है। वैश्वदेव शस्त्र के प्रतिपद् और अनुचर यह हैं:— तत् सवितुर्वृणीमहे (ऋ० ५।८२।१-३) अद्या नो देव सवितः (ऋ० ५।८२।४-५) यह रथन्तर है। यह सातवें दिन के रूप हैं। अभि त्वा देव सवितः (ऋ० १।२४।३) यह सविता का निविद् सूक्त है। इसमें 'अभि' 'अ' का स्थानीय है। यह सातवें दिन का रूप है। द्यावापृथिवी का निविद् सूक्त यह है:— प्रेतां यज्ञस्य (ऋ० २।४१।१६) इसमें 'प्र' है यह सातवें दिन का रूप है। ऋभुओं का निविद् सूक्त यह है:— अयं देवाय जन्मने (ऋ० १।२०) इसमें 'जन्म' आया है। यह सातवें दिन का रूप है। आ याहि वनसा सह गावः सचन्त वर्तनिं यदूधभिः ॥१॥ आ याहि वस्व्या धिया मंहिष्ठो जारयन् मखः सुदानुभिः ॥२॥ (ऋ० १०।१७२) इत्यादि दो पदों वाले मंत्रों का पाठ करता है। पुरुष दो- पाया है। पशु चौपाये हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की बढ़ती के लिए यह किया जाता है। एभिरग्ने दुवोगिरः (ऋ० १।१४) विश्वेदेवों का निविद् सूक्त है। इसमें 'आ' है यह सातवें दिन का रूप है। यह गायत्री छन्द में है। इस त्र्यह के तृतीय