ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 353, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ] ३३९ को पृथ्वी में बाँटा तो उदुम्बर वृक्ष उत्पन्न हुआ। इसलिये उदुम्बर साल में तीन वार फल लाता है। उदुम्बर की शाखा लेते हैं तो मानो अन्न और रस लेते हैं। वाणी को रोकते हैं। वाणी ही यज्ञ है। यज्ञ को रोकने से मानों दिन को रोकते हैं। दिन स्वर्गलोक है इसलिये मानो स्वर्गलोक को लेते हैं। दिन में वाणी न बोलें। अगर वह दिन में वाणी बोलेंगे तो दिन को शत्रुओं के हवाले कर देंगे। रात में वाणी न बोलें। यदि रात में वाणी बोलेंगे तो रात को शत्रुओं के हवाले कर देंगे। केवल जब सूर्य्य अध-छिपा हो वाणी बोलें। तब वे शत्रु के लिये केवल इतना समय छोड़ते हैं (जितना रात और दिन के बीच का है)। या उस समय बोलें जब सूर्य्य बिल्कुल डूब जाय। इससे वे शत्रु को अँधेरे का हिस्सेदार कर लेते हैं। आहवनीय अग्नि के चारों ओर घूम कर बोलते हैं। आहवनीय यज्ञ है। आहवनीय स्वर्गलोक है। यज्ञ रूपी स्वर्गलोक से स्वर्गलोक को जाते हैं। वे यह कह कर बोलते हैं:—“यदि होनमकर्मयदत्यरीरिचाम, प्रजापतिं तत् पितरमप्येतु”। (जो कुछ हमसे छूट गया हो या अधिक हो गया हो वह हमारे पिता प्रजापति को पहुँच जावे)। सब प्रजा प्रजापति के पीछे उत्पन्न होती है। इसलिये प्रजापति कम बढ़ के दोष का रक्षक है। और कमी या बढ़ती यजमान को हानि नहीं पहुँचाने पाती। जो इस रहस्य को समझ कर वाणी बोलता है उसकी कमी या बढ़ती प्रजापति को पहुँचती है। इसलिये इस मंत्र को पढ़कर ही वाणी बोलनी चाहिये। (४)