भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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२४६ [ पाँचवीं पञ्चिका बर्हि पर रक्खा मिलेगा । जो इस रहस्य को समझकर अग्निहोत्र करता है उसे यह सब कुछ मिल जाता है । देव और मनुष्य दोनों को और सब को ( एक के प्रति दूसरे को ) दक्षिणा में देता है । जो कुछ शाम को आहुति दी जाती है । उससे देवों के लिये मनुष्यों तथा और सब चीज़ की दक्षिणा देता है । ये जो मनुष्य बिना रक्षा के सोते हैं वे मानों देवताओं के लिये दक्षिणा हैं। जो कुछ प्रातःकाल हवन किया जाता है वह मानों मनुष्यों के लिये देवताओं की तथा अन्य चीज़ों की दक्षिणा देता है । देवता ( मन की बात ) जान जाते हैं और कहते हैं कि “मैं करूँगा”, “मैं जाऊँगा ।” जो लोक सब कुछ देवताओं को देकर प्राप्त होता है वही लोक उसको मिलता है जो इस रहस्य को समझ कर अग्निहोत्र करता है । शाम की आहुति देकर अश्विन-शस्त्र का आरम्भ करता है । ‘वाक्’ ‘वाक्’ कह कर वाणी का प्रतिगार ( response ) करता है । जो इस रहस्य को समझ कर अग्निहोत्र करता है उसके अग्नि रात को अश्विन-शस्त्र का पाठ करता है । प्रातःकाल आदित्य के लिये आहुति देकर महाव्रत करता है । ‘अन्न’ ‘अन्न’ कह कर वह ‘प्राण’ का प्रतिगार करता है । जो इस रहस्य को समझ कर अग्निहोत्र करता है, उसके लिये आदित्य दिन में महाव्रत के शस्त्र का पाठ करता है । अग्निहोत्री वर्ष में ७२० आहुतियाँ शाम को देता है और ७२० सबेरे । इतनी ही ‘गवां अयन’ में ईंटें होती हैं । जो इस रहस्य को समझ कर अग्नि होत्र करता है वह अग्नि चिति द्वारा साल भर तक यज्ञ करता है । (३) २९—‘जातूकर्ण’ के पुत्र ‘वतवत’ के पुत्र ‘वृषशुष्म’ ने कहा,