भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 385

तीसरा अध्याय ] ३७१ इन मंत्रों में वृषन्, पीत, सुत, मद् आते हैं। इस लिये इनमें रूप-समृद्धता है। यह इन्द्र के मंत्र हैं। (यज्ञ इन्द्र का है। छन्द त्रिष्टुभ् है। त्रिष्टुभ् मध्यसवन का छन्द है। इस पर प्रश्न करते हैं कि 'मद्' तो तीसरे सवन का रूप हैं'फिर मध्य सवन के अनुवाक्यों और याज्यों में ऐसे मन्त्र क्यों पढ़ते हैं। इसका उत्तर यह है कि मध्य सवन में देवते मद युक्त हो जाते हैं और सायंकाल तक और अधिक मद हो जाता है। इस लिये मध्य सवन के अनुवाक्यों और याज्यों में ऐसे मंत्र बोले जाते हैं। सब लोग मध्य सवन में प्रस्थित सोम के लिये प्रत्यक्ष रूप से ऐसे याज्य मंत्र बोलते हैं जो इन्द्र के हों। कुछ लोग ( होता, मैत्रावरुण और ब्राह्मणाच्छंसी ) ऐसे मंत्र बोलते हैं जिनमें 'अभितृण्' शब्द भी होते हैं। होता का याज्य मंत्र है :- पिबा सोममभि यमुग्र तर्द......( ऋ० ६।१७।१ ) मैत्रावरुण का :- स ईं पाहि य ऋजीषी तरुत्रो......( ऋ० ६।१७।२ ) और ब्राह्मणाच्छंसी का... एवा पाहि प्रत्नथा मंदतु त्वा......( ऋ० ६।१७।३ ) पोता का याज्य यह है :- अर्वाङेहि सोमकामं त्वाहूः ( ऋ० १।१०४।६ ) नेष्टा का याज्य यह है :- तवायं सोमस्त्वमेह्यर्वाङ् । ( ऋ० ३।३५।६ ) अच्छावाक् का याज्य यह है :- इन्द्राय सोमाः प्रदिवो विदाना......( ऋ० ३।३६।२ ) अग्नीध्र का है :- आपूणो अस्य कलशः स्वाहा......( ऋ० ३।३२।१५ )