ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 391, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ] ३७७ मैत्रावरुण का अन्त का मंत्र यह है :— इयमिन्द्रं वरु॑णमष्ट मे॒ गीः ( ऋ० ७।८४।५ ) ब्राह्मणाच्छंसी का :--- वृहस्पतिर्नः परि॑ पातु प॒श्चात् (ऋ० १०।४२।११) अच्छावाक् का :— उभा जिग्यथुः (ऋ० ६।६९।८) वे दोनों ही जीते थे । कोई पराजित नहीं हुआ । अर्थात् उन्होंने हार नहीं मानी । उनमें से कोई नहीं हारा । “इंद्रश्च विष्णो यद॑ पस्पृधेथां त्रे॑धा सह॑स्रं वितदै॑रयेथाम्” से तात्पर्य है कि इन्द्र और विष्णु दोनों ही असुरों से लड़े । और उनको जीत कर कहा, “लाओ, बाँट लें ।” असुरों ने कहा, “अच्छा” । इन्द्र ने कहा, “यह विष्णु तीन पैर में जितना नाप ले वह हमारा, शेष तुम्हारा” । वह इन लोकों में चला, फिर वेदों में, फिर वाणी में । इस पर शंका करते हैं कि सहस्र का क्या अर्थ है । इसका उत्तर देना चाहिये कि “यह लोक, वेद और वाक्” । अच्छावाक उक्थ्य के अन्त में कहता है:— “ऐरयेथां, ऐरयेथां” ( तुम दोनों ने जीता ) । अच्छावाक् का काम अन्त का है । अग्निष्टोम और अति- रात्र में होता अन्त के भाग को पढ़ता है । ‘षोडशी’ में सन्देह है कि अन्त के चार अक्षर पढ़े जायें या न पढ़े जायें । कुछ कहते हैं कि अवश्य पढ़े जायें । जब अन्य कृत्यों में पढ़े जाते हैं तो इसमें क्यों न पढ़ा जाय ।” (७) १६—अब प्रश्न है कि जब तीसरा सवन नाराशंसी का है तो अच्छावाक् शिल्पों में उन मंत्रों को क्यों पढ़ता है जो नारा- शंसी के नहीं होते ? इसका उत्तर यह है कि नाराशंसी विकार