भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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३८८ [छठी पञ्चिका है जो उसका शत्रु हो चुका है तो उसका राष्ट्र क्षीण हो जाता है। (६) २३—अहीन 'यज्ञ की युक्ति भी है और विमुक्ति भी। ( जोड़ना और अलग करना )। अहीन इन ब्राह्मणाच्छंसीय मंत्रों से युक्त होता है ;— व्यंतरिक्षमतिरद्...( ऋ० ८।१४।७-६ ) और इन मंत्रों से विमुक्त होता है:— एवेदिंद्रम्...( ऋ० ७।२३।६ ) अच्छावाक् के इस मंत्र से युक्त होता है :— आहं सरस्वती वतोः...( ऋ० ८।३८।१० ) इस मंत्र से विमुक्त होता है :— नूनं सा ते...( ऋ० २।११।२१ ) मैत्रावरुण इस मंत्र से जोड़ता है :— ते स्याम देववरुण...( ऋ० ७।६६।६ ) और इससे विमुक्त करता है :— नू ष्टुत... ऋ० ४।१६।२१ ) जो अहीनों को युक्त करना और विमुक्त करना जानता है। वह अहीन यज्ञ के सिलसिले को कायम रख सकता है। चौबीसवें दिन जोड़ते हैं वह युक्ति है और अन्तिम अति- रात्र के दिन अलग करते हैं यह विमुक्ति है। अगर एकाह के मंत्रों से समाप्त करते हैं तो अहीन यज्ञ का कृत्य नहीं हो सकता। अगर अहीन का कृत्य करके समाप्त करते हैं तो जैसे थके बैल को अलग कर देते हैं, ऐसे ही यज- मान भी यज्ञ से अलग हो जाता है। इसलिये एकाह और अहीन कृत्यों से समाप्त करना चाहिये जैसे दूर की यात्रा करने वाले मंजिल पर बैल बदल देते हैं। इस प्रकार यज्ञ सिलसिलेवार हो जाता है और यजमान विश्राम ले लेते हैं।