ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय ] ३९७ जगती और अतिजंगती है । यह जो कुछ संसार में हैं वह या तो जगत् ( जंगम ) है या अति जगत् ( या स्थावर ) । यह सूक्त मरुत का है । मरुत जल हैं । जल अन्न हैं जो भरे जाने चाहियें । इस प्रकार वह यजमान को अन्न से युक्त करता है । यह जो नाभानेदिष्ठ, बालखिल्य, वृषाकपि और एवयामरुत सूक्त हैं यह सहचर कहलाते हैं । उनको दूसरों के साथ साथ पढ़े । अगर दूसरों के साथ न पढ़ना चाहे तो न पढ़े । इनको अलग पढ़ना ऐसा ही है जैसे किसी पुरुष को उसके वीर्य से अलग करना । इस लिये या तो इनको दूसरे सूक्तों के साथ पढ़े या न पढ़े । अश्व के पुत्र अश्वतर के पुत्र बुलिल ने विश्वजित यज्ञ में होता बनते हुये इन शिल्पों के विषय में ऐसा विचार किया था :- “संवत्सर के विश्वजित् यज्ञ में मध्यसवन में दो शस्त्र ( मैत्रावरुण और ब्राह्मणाच्छंसी ) बढ़ाने के बाद मैं 'एवया- मरुत' सूक्त पढूँगा ।” उसने ऐसा ही किया । जब वह पढ़ रहा था तो गौशल आया । और कहने लगा “होता, यह तेरा शस्त्र बिना पहियों के जैसा क्यों घसिट रहा है ? यह दशा कैसे हो गई ? एवयामरुत तो उत्तर की ओर पढ़ा जाता है” । फिर उसने कहा, 'मध्य सवन इंद्र का है । तू इन्द्र को इसमें से क्यों निकालना चाहता है ?” उसने उत्तर दिया, “मैं इंद्र को इससे निकालना नहीं चाहता” । उसने कहा, “तुम चाहते हो । क्योंकि यह जगती और अतिजगती छन्द मध्यसवन का नहीं हैं। यह सूक्त मरुतों का है । इसलिये यहाँ इसका पाठ नहीं होना चाहिये ।” उसने कहा, “अच्छावाक, ठहर जाओ । मैं इनके अनुशासन को पूरा करूँ गा” । गौशल ने कहा, “इंद्र का सूक्त पढ़ो जिसमें विष्णु की छाप पड़ी हो” । इसलिये हे होता, अपने शस्त्र में से 'एवयामरुत' छोड़ दो जो रुद्र