ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 414, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ें४०० [छठी पञ्चिका रहस्य को समझता है वह संवत्सर की सायुज्यता, सारूपता और सालोक्यता प्राप्त करता है । इन मंत्रों को प्रग्राह विधि से पढ़ना चाहिये । जैसे वृषा- कपि । क्योंकि इनका भी वृषाकपि का सा रूप है । जो नियम वृषाकपि के पढ़ने में होना चाहिये वह इसमें भी । इनमें न्यूंख नहीं होना चाहिये । निनाद होना चाहिये । यही उनका न्यूंख है । यह “कारव्या मंत्रों” (अथर्व० २०।१२७।११-१४) को पढ़ता है । देवों ने जो कोई कल्याण कर्म किया वह कारव्या के द्वारा किया । इसी प्रकार यजमान भी जो कुछ कल्याण कर्म करते हैं वह व्याख्या के द्वारा करते हैं । इनको भी प्रग्राह की विधि से पढ़ना चाहिये । जैसे वृषा- कपि मंत्र पढ़े जाते हैं । जो वृषाकपि का रूप है । वह इनका रूप है । इसलिये जो नियम वृषाकपि के हैं वही इनके भी होने चाहिये । इनमें न्यूंख नहीं होता, निनाद होता है । यही इनका न्यूंख है । अब वह “दिशांकॢप्ती” (अथर्व २०।१२८।१-५) मंत्रों को पढ़ता है । क्योंकि वह इस प्रकार दिशाओं को बनाता है । ऐसे पाँच मंत्र पढ़ता है । पाँच दिशाएँ हैं । चार पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, और एक उनके ऊपर । इनमें न न्यूंख होता है, न निनाद । वह सोच कर कि मैं इन दिशाओं को बिगाड़ूँ नहीं (न्यूंख यानि) वह आधा आधा मंत्र करके पढ़ता है । प्रतिष्ठा के लिये 'जनकल्प' मंत्रों (अथर्व० २०।१२८।६ ११) को पढ़ता है । प्रजा जनकल्प है । ऊपर की रीति से दिशा बना कर वह उनमें प्रजा को रखता है । इनमें न्यूंख नहीं होता, न निनाद होता है । यह सोच कर कि मैं प्रजा को न बिगाड़ूँ, वह आधी आधी ऋचा करके पढ़ता है ।