भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ४०२ [ छठी पञ्चिका ऐतशप्रलाप के पाठ से छन्दों में रस आ जाता है। उसका यज्ञ रस युक्त छन्दों वाला हो जाता है। वह सरस छन्दों से अपना यज्ञ करता है, जो इस रहस्य को समझता है। ऐतशप्रलाप का यह भी अर्थ है :—यह यज्ञ की त्रुटियों को दूर करने और यज्ञ को पूर्ण करने के लिये भी है। यह ऐतश- प्रलाप अक्षिति ( न क्षय होने वाली चीज ) है। इनका पाठ करने में कहते हैं :—"मेरे यज्ञ में कोई त्रुटि न रहे। मेरा यज्ञ अक्षय हो।" यह ऐतशप्रलाप हर पद पर ठहर ठहर कर पढा जाता है, जैसे निविद पढा जाता है। अन्त के पद में 'ओ३म्' कहते हैं जैसे निविद् में। अब वह प्रवह्लिका मन्त्रों ( अथर्ववेद २०।१३३।१-६ ) को पढ़ता है :—देवों ने असुरों को प्रवह्लिका मन्त्रों से ठंडा करके हरा दिया ( प्रव हृत्य )। इसी प्रकार यजमान लोग प्रवह्लिका मंत्रों से शत्रु को ठंडा करके हरा देते हैं। यह आधा आधा मंत्र करके पढ़ा जाता है, प्रतिष्ठा के लिये। वह आजिज्ञासेन्या मंत्रों ( अथर्ववेद २०।१३४।१-४ ) को पढ़ता है। आजिज्ञासेन्या मंत्रों से देवों ने असुरों को पहचान कर ( आशाय ) पछाड़ लिया लिया। इसी प्रकार यजमान भी आजिज्ञासेन्या मंत्रों से शत्रुओं को पहचान कर पछाड़ डालते हैं। वह इनको आधा आधा मंत्र करके पढ़ता है, प्रतिष्ठा के लिये। प्रतिराघ ( अथर्ववेद २०।१३५।१-३ ) मंत्रों को पढ़ता है। प्रतिराघ मंत्रों से देवों ने असुरों में विघ्न डाल कर ( प्रतिराध्य ) उनको हरा दिया। इसी प्रकार यजमान लोग भी प्रतिराध मंत्रों से शत्रुओं में विघ्न डाल कर उनको परास्त कर देते हैं। CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.