ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०८ [ छठी पंचिका पहुँच नहीं है। स्वर्ग लोक में विरले ही जाते हैं। यदि पढ़ेगा तो सबको बराबर कर देगा । न पढ़ना ही स्वर्ग लोक का रूप है। इस लिये न पढ़े । इसलिये नहीं पढ़ता । उक्थ यह हैं— नाभानेदिष्ठ, बालखिल्य, वृषाकपि, एवयामरुत् । इनको यदि पढ़ेगा तो इनमें इच्छा की पूर्त्ति न होगी । वृषाकपि इन्द्र का है । एतशप्रलाप सब छन्दों में होता है। जो इन्द्र का जगती छन्द का मन्त्र है उससे कामना पूरी होती है । इंद्र-बृहस्पति के सूक्त को इन्द्र बृहस्पति के मन्त्र से समाप्त करता है । इसलिये शस्त्रों के साथ इन मन्त्रों को न पढ़े । (९) ऐतरेय ब्राह्मण की छठी पंचिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ । ऐतरेय ब्राह्मण की छठी पंचिका समाप्त हुई ।