ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय
प्रायणीय-इष्टि
७—जो प्रायणीय इष्टि करते हैं वह इसके द्वारा स्वर्गलोक को जाते हैं (प्रयंति) । इसीलिये इस इष्टि को प्रायणीय कहते हैं । प्रायणीय प्राण है और उदयनीय उदान है। होता समान होता है। प्राण और उदान समान होते हैं। प्राणों के बनाने और प्राणों के जानने के लिये ( प्रायणीय और उदयनीय दोनों इष्टियों की आवश्यकता है।—ले०)† यज्ञ देवों के पास से भाग गया। वे देव कुछ कृत्य न कर सके। और न जान सके (कि वह यज्ञ कहाँ चला गया—ले०)। उन्होंने अदिति से कहा, “तेरे द्वारा हम इस यज्ञ को जानें”। उसने † 'प्रायणीय' का अर्थ है 'आरंभ की'। 'उदयनीय' का अर्थ है 'अन्त की'। यज्ञ में सब से पहले 'दीक्षणीय इष्टि' का उल्लेख पिछले अध्याय में किया गया। यह तो केवल तैय्यारी थी। जब यज्ञ आरंभ हुआ तो आरंभ की इष्टि हुई प्रायणीय और अन्त की उदयनीय। दोनों मिलकर ही यज्ञ को पूरा करती हैं। ( २६ )