ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ] ४२३ तं तुं तन्वन् रजसो...( ऋ० १०।५३।६ ) उसका अनुवाक्य यह है :— अन्नानद्दो नद्यतनोत सोमा...( ऋ० १०।५३।७ ) या "अग्नये तन्तुमते स्वाहा" से ही आह्वनीय में घी की आहुति दे दे । इसका यही प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न यह है कि यदि कोई अग्निहोत्री अपने जीवन- काल में किसी को सुने कि वह उसे मरा बताता है तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि सुरभिमत्' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश देवे । उसका याज्य मंत्र है :— अग्निर्होतान्यसीदत्...( ऋ० ५।१।६ ) और अनुवाक्य यह है :— ऊर्ध्वामकृद्देववीतिं नो अद्य ( ऋ० १०।५३।३ ) या 'अग्नये सुरभिमते स्वाहा' से आहवनीय अग्नि में आहुति देवे । यही इसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि यदि किसी अग्निहोत्री की स्त्री या गाय जुड़वाँ बच्चे दे तो इसका क्या प्रायश्चित्त है । वह 'अग्नि मरुत्वत्' के लिये तेरह कपालों का पुरोडाश बनावे । उसका याज्य मंत्र यह है :— मरुतो यस्य हि क्षये...( ऋ० १।८६।१ ) और अनुवाक्य यह है :— अरा इवेदचरमा अहेव...( ऋ० ५।५८।५ ) या केवल 'अग्नये मरुत्वते स्वाहा' से आहवनीय में घी की आहुति देवे । यही इसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि अपत्नीक ( जिसकी स्त्री मर गई हो ) अग्निहोत्री आहुतियाँ दे या न दे । उसे देना चाहिये । अगर न देगा तो 'अनद्धा' कहलायेगा । अनद्धा कौन है ? जो न देवों