ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ] ४२५ कुहू । चाँद अस्त होकर फिर उदय हो इस बीच को तिथि कहते हैं । 'पूर्णमासी के पहले भाग में उपवास करे' इस बात को न मान कर अमावस्या के पिछले भाग में जब चाँद निकले तब यज्ञ करता है । उस दिन सोम को खरीदता है । इसलिये पिछले-पिछले भाग में ही उपवास करे । पिछले भाग सोम के हैं । सोम को देवता मानकर यज्ञ करता है । यह जो चन्द्रमा है वह देव सोम है । इसलिये पिछले भाग में उपवास करे । (१०) १२—अब प्रश्न है कि सूर्य के उदय या अस्त से पहले यदि अग्नि को ( गार्हपत्य से आहवनीय तक ) न ला सकें या लावे और हवन करने से पूर्व अग्नि बुझ जाय तो इसका क्या प्रायश्चित्त है । सायंकाल को ( सूर्यास्त के पश्चात् ) स्वर्ण को सामने रखकर अग्नि को ले आवे । ज्योति शुक्र है । स्वर्ण ज्योति है । सूर्य शुक्र है । मानो उसी शुक्र ज्योति को देखता हुआ अग्नि निकालता है । प्रातःकाल ( सूर्योदय के पीछे ) नीचे चाँदी रखकर अग्नि निकाल ले । क्योंकि चाँदी रात का रूप है । आहवनीय को ( गार्हपत्य से ) उस समय तक निकाल लेना चाहिये जब तक अंधेरा न हो जाय । यह जो अंधेरा या छाया है वह मृत्यु है । इस ( चाँदी की ) ज्योति से वह मृत्यु रूपी अन्धकार या छाया को तरता है । यही उसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि जिसकी आहवनीय या गार्हपत्य अग्नियों पर होकर गाड़ी या रथ या घोड़ा गुज़र जाय उसका क्या प्रायश्चित्त है ? कुछ की राय है कि इसकी परवाह न करे क्योंकि यह तो उसकी आत्मा में ही रक्खी हुई होती हैं । यदि परवाह करे तो गार्हपत्य से आहवनीय तक लगातार पानी की धार इस मंत्र को बोलकर डाले :— तंतुं तन्वन् रजसो भानुमन्विहि... (ऋ० १०।५३।६)