ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ
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दूसरा अध्याय ] ३१ अब वह सोम के लिये अनुवाक्य* और याज्य मंत्रों को बोलता है। इसी लिये बहुत सी नदियाँ पश्चिम की ओर बहती है। जल सोम के हैं। सविता के लिये अनुवाक्य† और याज्य मंत्रों को बोलता है । इसीलिये वायु अधिकतर उत्तर और पश्चिम की दिशाय्र से बहता है । वह सविता की प्रेरणा से ही चलता है। वह अदिति के लिये‡ अनुवाक्य और याज्य मंत्रों को
- सोम के अनुवाक्य और याज्य मंत्र यह हैं:— १ त्वं सोम प्रचिकितो मनीषा त्वं रजिष्ठमनु नेषि पन्थाम् । तव प्रणीती पितरो न इन्दों देवेषु रत्नमभजन्त धीराः ॥ ( ऋ० १।६१।१ ) २ या ते धामानि दिवि या पृथिव्यां या पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु । तेभिर्नो विश्वैः सुमना अहेलन् राजन्त्सोम प्रति हव्या गृभाय ॥ ( ऋ० १।६१।४ ) † सविता के अनुवाक्य और याज्य मंत्र यह हैं:— १ आ विश्वदेवं सत्पतिं सूक्तैरद्या वृणीमहे । सत्य सवं सवितारम् ॥ ( ऋ० ५।८२।७ ) २ य इमा विश्वा जातान्याश्रावयति श्लोकेन । प्र च सुवाति सविता ॥ ( ऋ० ५।८२।६ ) ‡ अदिति के अनुवाक्य और याज्य मंत्र हैं:— १ सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये । ( ऋ १०।६३।१० ) २ महीम् षु मातरं सुव्रतानामृतस्य पत्नीमवसे हवा महे । तुविक्षत्रामजरन्तीमुरूचीं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् ॥ ( अथर्ववेद ७।६।२ )